इंसानियत से बड़ा धर्म नहीं

नफ़रत जिससे की जाती है, उसके साथ-साथ उसे भी जलाकर ख़ाक कर देती है, जो नफ़रत करता है। यह ठीक वैसे ही है, जैसे दूसरे का घर जलाने के लिए अपने घर में चिंगारी रखना। लेकिन अपने सीने में नफ़रत की चिंगारी रखने वाले यह नहीं समझते कि वे जिनसे नफ़रत करते हैं, उन्हें ख़ाक कर देने की स्थिति आने तक ख़ुद भी तिल-तिल जलकर मरते हैं। एक बहुत छोटी बात बहुत मोटे तौर पर सभी को समझनी चाहिए कि अगर हम दूसरे से लडऩे के लिए उतरेंगे, तो मारे हम भी जा सकते हैं। मारे नहीं गये, तो ज़ख़्म तो मिलेंगे ही। लेकिन इतनी सीधी बात बहुत-से लोगों को समझ नहीं आती और वे मज़हबी दीवारों को और उठाने की कोशिश में दूसरे मज़हब के लोगों को हर वक़्त मारने को तैयार रहते हैं। इतनी नफ़रत अगर लोग बुरे कर्मों से करें, तो ख़ुद को इतना निर्मल, अच्छा और ऊँचा बना सकते हैं कि उनके आगे हर कोई नतमस्तक हो जाए। सभी जानते हैं कि वास्तविक सन्तों, पीरों के क़दमों में हर कोई सिर झुका देता है और हर मज़हब के लोग उनसे आशीर्वाद प्राप्त करने की चेष्टा बिना किसी भेदभाव के करते हैं।

सोचने की बात यही है कि जिन सन्तों-पीरों के पास कोई हथियार नहीं होता, उनके आगे लोग सिर झुका लेते हैं और श्रद्धापूर्वक उनका आदर करते हैं। वहीं गुण्डे-मवालियों से लोग डरते भले ही हों; लेकिन न तो सम्मान से उनके आगे सिर झुकाते हैं और न ही उनका आदर करते हैं। यहाँ केवल इतना ही फ़र्क़ है कि सन्त-पीर सर्वशक्तिमान ईश्वर की शरण में चले जाते हैं और ख़ुद को निर्बल, असहाय, भिखारी स्वीकार करके सभी को एक नज़र से देखते हैं। हिंसा से दूर हो जाते हैं। वहीं गुण्डे-मवाली ख़ुद को सर्वशक्तिमान बनाने की कोशिश में लगे रहते हैं और निर्बलों, असहायों पर अत्याचार करके सबको भिखारी समझते हैं और हिंसा करते हैं। आज कितने ही लोग नेता, सन्त-पीर और दयालु रूप में फिर रहे हैं। लेकिन वे स्वकल्याण और पर-विनाश की कोशिशों में लगे हैं। अपने इसी उद्देश्य के लिए वे विनाश के सबसे घातक हथियार नफ़रत का इस्तेमाल करते हैं। लेकिन समझ नहीं आता कि जिस जीभ में मिठास लाने से दिलों पर शासन किया जा सकता है, उस जीभ को लोग विषैला बनाकर विषाक्त शब्द-बाणों के ज़रिये दुनिया को तहस-नहस क्यों करना चाहते हैं? ऐसे लोगों को सोचना चाहिए कि क्या वे अपने घर में अशान्ति चाहते हैं? अगर नहीं, तो दुनिया में अशान्ति क्यों चाहते हैं? कुछ समय से देश में दो मज़हबों के लोगों में जिस तरीक़े से नफ़रत फैलायी जा रही है; क्या उससे देश का भला होगा? यह सवाल उन लोगों से पूछा जाना चाहिए, जो लगातार नफ़रत फैलाते जा रहे हैं। वह भी तब, जब दुनिया भर के देश परस्पर युद्ध और गृहयुद्ध की तरफ़ बढ़ रहे हैं। इस समय तो केवल भारत को ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया को शान्ति और सौहार्द का पाठ पढ़ाये जाने की ज़रूरत है। भले ही इसके लिए चीन जैसे आततायी देशों को कुचलना पड़े। लेकिन इससे पहले हमें अपने देश को मज़बूत करने की ज़रूरत है, जिसके लिए हमें आज आपसी प्यार, भाईचारे तथा सौहार्द को बचाना और बढ़ाना पड़ेगा। इसके लिए नफ़रत फैलाने वालों से भी प्यार से ही पेश आकर, उनके सामने इंसानियात का उदाहरण पेश करके उन्हें निरुत्तर करना चाहिए। मेरी नज़र में ऐसे दो उदाहरण हैं; एक नफ़रत फैलाने का और एक उस नफ़रत पर मोहब्बत की पट्टी बाँधने का।

2017 में जैन मुनि तरुण सागर ने कहा कि मुसलमानों की आबादी पर रोक नहीं लगती है, तो देश में विस्फोटक स्थिति हो जाएगी। कुछ मुसलमान भारत विरोधी हैं और भारत विरोधी मुसलमानों की आबादी बढऩे से देश में गम्भीर संकट पैदा हो जाएगा और हिन्दू असुरक्षित हो जाएँगे। मुझे एक सन्त की यह भाषा अच्छी नहीं लगी। यह एक सन्त का तरीक़ा नहीं हो सकता। सन्त नफ़रत भरी भाषा नहीं बोलते। वे मोहब्बत की भाषा से नफ़रत को शान्त करते हैं। अगर कोई सन्त, पीर, पादरी, पण्डित, मुल्ला नफ़रत फैलाता है, तो वह भी उतना ही गुनहगार है, जितना कि दंगा करने वाला कोई गुण्डा-मवाली। अगर शरीर में कहीं जख़्म हो जाए, तो उस पर विष नहीं डालना चाहिए; वरना शरीर ही मर जाएगा। मैं मानता हूँ भारत में नफ़रत के कई गहरे घाव हैं। लेकिन अगर उन पर नफ़रत रूपी विष डाला जाएगा, तो यह भारत को ही नष्ट करने जैसा अपराध होगा। उस पर मोहब्बत का मरहम लगाने की ज़रूरत है।