आस्ट्रेलिया ने जीती ट्रॉफी और भारत ने दिल

0
585

चैंपियन ट्राफी की शुरूआत 1978 में हुई थी। इस टूर्नामेंट के 37 संस्करण हो चुके हैं। जिनमें से 15 बार आस्ट्रेलिया ने यह खिताब जीता। भारत लगातार दूसरी बार इस टूर्नामेंट के फाइनल में पहुंचा। लेकिन चार में से तीन क्र्वाटर तक अपना प्रभुत्व बनाने और दोनों छोरों और मिडफील्ड में अपना दबदबा कायम रखने के बावजूद भारत चैंपियन ट्राफी का फाइनल विश्व चैपियन आस्ट्रेलिया से हार गया। निर्धारित समय तक 1-1 से बराबर रहने के बाद शूट आऊट में 1-3 का स्कोर मैच की सही तस्वीर पेश नहीं करता। यह नहीं दर्शाता कि भारत जीत के कितने करीब पहुंच कर हार गया। उसने कितने मौके गंवाए उसकी पकड़ कितनी मज़बूत थी। यही वजह है कि मैच हारने के बाद भारत के मध्य पंक्ति के खिलाडी मनप्रीत सिंह रो पड़े और 18 साल के विवेक प्रसाद जिसने भारत का एकमात्र गोल किया ने मैच के बाद कहा, ‘यह जख्म हमेशा ताजा रहेगा’। भारतीय कप्तान का कहना था कि, ‘हमने आस्ट्रेलिया को ट्राफी तोहफे में दे दी’। खेल के पंडित कुछ भी कहें पर भारत का प्रदर्शन चारों क्र्वाटर में बिलकुल परिपक्व और तकनीकी तौर पर मज़बूत रहा बस फर्क इधर-उधर का रह गया। अगर यह अंतर न रहता तो शायद ब्रेडा का स्टेडियम पूरी रात जश्न में डूबा रहता।

अंत में जब आस्ट्रेलियाई खिलाडी जीत का जश्न मना रहे थे तब भारतीय खिलाडियों के चेहरे पर निराशा और उदासी थी और वे होटल जाने के लिए बेताव थे। कोच हरेंद्र सिंह ने कहा कि, ‘आज की रात नींद मुश्किल से ही आएगी। यह दर्द कई सप्ताह तक रहेगा’।

हालांकि टीम की सुबह की बैठक में निर्देश स्पष्ट थे कि गलतियां कम की जाएं और रक्षा पंक्ति को बिखरने नहीं देना। लेकिन पहले क्र्वाटर के मध्य में कोच हरेंद्र ने आस्ट्रलियाई खिलाडिय़ों को रक्षात्मक होते हुए देखा। उस समय उन्होंने खिलाडिय़ों से अपना स्वभाविक खेल खेलने के लिए कहा पर यह भी कि गेंद का ‘पोजेशन’ आसानी से विपक्षी टीम के हाथ में नहीं आने देना”।

इसके बाद मैच का मिजाज ही बदल गया। मिडफील्ड ने पूरा मैदान घेर रखा था। डिफेंस उनके और मिडफील्ड के मध्य के अंतर को कम करने के लिए आगे आया। उन्होंने आस्ट्रेलियाई खिलाडिय़ों के लिए कोई खाली स्थान नही छोड़ा था जब भी वे कोई आक्रमण करते तो लगातार सुरेंद्र कुमार, वरूण कुमार, और जर्मनप्रीत सिंह उन्हें रोकने के लिए सामने होते। वीरेंद्र लकड़ा ऐसे खेल रहा था जैसे वे कोच को यह दिखाने की कोशिश कर रहा हो कि वह एक डिफेंडर से बेहतर फारवर्ड हैं। वह बार-बार झुक कर और अपना सिर नीचे करके इस तरह से ड्रिविल कर रहा था कि आस्ट्रेनिया के खिलाडी भौचक्के रह जाते और वह आस्ट्रेलिया की रक्षा पंक्ति को इस तरह काट कर निकलता जैसे गर्म चाकू मक्खन में से निकल जाता है। उसने बार-बार गेंद को विपक्षी खिलाडिय़ों से दूर रखते हुए और गेंद को सिमरनजीत की तरफ धकेल दिया, वह खिलाड़ी जिसका खेल हर मैच के बाद निखरता चला गया।

शुरूआती मिनट में ही अमित रोहिदास ‘रेफरल’ के लिए गए और उन्हें पहला पेनल्टी कार्नर मिला था। फिर दूसरा भी मिला आस्ट्रेलिया हैरान था कि उसने कहां पकड़ ढीली छोड़ी। श्रीजेश के सामने उन्होंने कई बार गेंद मारने का प्रयास किया लेकिन गेंद श्रीजेश के पैड पर सीधी लगी।

इस बीच सुरेन्द्र ने खुद को आस्ट्रेलियाई रक्षकों से बचाया और दिलप्रीत के लिए पास फैंका जिसने गेंद एसवी सुनील के लिए बढ़ा दी। उसके सामने सिर्फ आस्ट्रेलियाई गोलकीपर था लेकिन गेंद रोकते समय सुनील उसे अपने ही पांव पर लगा बैठा।

उधर आस्ट्रेलियाई खिलाडी ब्लैक गोवरस, अरन जलेवेस्की, टॉम क्रेग, डेनियल बेले, भारतीय स्ट्राइकिंग घेरे के आसपास ही मंडराते रहे। जबकि रक्षकों ने गेंद को सावधानी से बचा लिया। श्रीजेश भी जोश में था वह हर शॉट को गोल से दूर करता रहा। दोनों टीमों ने असाधारण खेल का प्रदर्शन किया और फाइनल में श्रीजेश और आस्ट्रलियाई गोलकीपर लवेल टायलर ने अपना सर्वोतम प्रदर्शन किया।

दूसरे क्र्वाटर में सिमरनजीत ने आस्ट्रेलिया के आधे हिस्से में प्रवेश किया, अधिकांश डिफेंस को तोड़कर शानदार ढंग से गेंद सुनील को थमा दी। जो इसे नियंत्रित नही कर सका। इस बीच आस्ट्रेलिया ने दबाव बनाया और 24 वें मिनट में पहला पेनल्टी कार्नर अर्जित किया। एक डमी ‘पुश’ के कारण भारतीय रक्षक पंक्ति थोड़ा विचलित हुई और गोवरस ने फ्लिक से गेंद गोल में पहुंचा दी। यह गेंद श्रीजेश के हाथ से लग कर गई थी। सामान्य स्थिति में यह गेंद रुकनी चाहिए थी। यह एक साधारण आसान गोल था जो श्रीजेश को मैच के बाद भी परेशान करता रहेगा।

अब भारत ने लक्ष्य का पीछा किया। भारत ने तीसरे पेनल्टी कार्नर को भी गंवा दिया था। यहां तक की लकड़ा जो कि गेंद को आस्ट्रेलिया की ‘डी’ में ले गए थे और उनके पास गोल करने का मौका था पर वे चूक गए। मध्यांतर समय तक आस्ट्रेलिया एक गोल की बढ़त के साथ आगे था।

मनप्रीत और दिलप्रीत ने भारत को अपना चौथा पनेल्टी कार्नर दिया। वरूण ने इसे मनप्रीत की तरफ पास किया जोकि शूट के समय अपना संतुलन खो बैठे। दोनों टीमें एक दूसरे के आगे पीछे दौड़ रही थी। तीसरे क्र्वाटर के 8वें मिनट के बाद सुरेंद्र ने गेंद को मनदीप तक भेजा जो आस्ट्रेलियाई खिलाडिय़ों को धोखा देकर गेंद को लक्ष्य तक ले गए और गेंद को गोल की तरफ उछाल दिया। लेकिन गेंद गोल पोस्ट से टकरा कर खेल में वापिस आ गई। दर्शकों की भीड़ चिल्लाई। भारतीय खेमे में बैंच पर बैठे कोच हरेंद्र आश्चर्यचकित थे कि बराबरी कैसे हो। यह मौका चिंगलिंगसाना के छोर से आया जब उसने एक क्रास फैंका और विवेक प्रसाद ने सर्तकता के साथ गेंद को गोल में पहुंचा दिया। 18 साल के इस नवोदित खिलाड़ी का यह शानदार गोल था जो अपना पहला बड़ा फाइनल खेल रहा था। विवेक ने टायलर के दाई तरफ खाली जगह देखी और गेंद को उस तरफ से गोल पोस्ट के अंदर डाल दिया।

अचानक मैंच में दोबारा रोमांच आ गया और भारत के हमले तेज़ होने लगे। तीसरे क्र्वाटर के अन्तिम दो मिनट में तो गेंद भारत के पास ही रही। इस क्र्वाटर में भारत ने 53 फीसद गेंद अपने नियंत्रण में रखी और बार-बार आस्ट्रेलिया की ‘डीÓ में प्रवेश किया और चार शाट्स गोल पर जमाए।

फाइनल क्र्वाटर अत्याधिक उत्तेजित रूप से शुरू हुआ। मनप्रीत आस्ट्रेलियाई स्ट्राइकिंग सर्किल में पूरी तेज़ी से बढ़ा। उसने गेंद दिलप्रीत के लिए बढ़ाई पर टायलर ने दिलप्रीत का शाट बचा लिया इससे पहले एक शाट बाहर भी चला गया था। भारत के जवाबी हमले बहुत तेज थे इसको देखते हुए आस्ट्रेलिया ने अपने ज़्यादा खिलाडिय़ों को आगे नहीं भेजा।

मैच के आखिरी पांच मिनट में सुनील दाहिनी तरफ से आगे आया और उसने एक क्रास फैंका जो आस्ट्रेलियाई खिलाडियों को छकता हुआ मनप्रीत के पास पहुंच गया। मनप्रीत ने उसे सिर्फ रोक कर गोल में डालना था। परन्तु मनप्रीत गलत तरफ चला गया था क्योंकि आस्ट्रेलियाई डिफेंडर ने उसे कवर कर लिया था। मैच को जीतने का अवसर आया और चला गया।

आखिरी मिनट में भारत ने गेंद पर कब्जा कर लिया और आस्ट्रेलिया की टीम को दूर रखा जो शायद अधिक राहत प्राप्त कर रहे थे।

श्रीजेश की आश्चर्यजनक फार्म को देखकर कर सबको यह लग रहा था कि भारत शूट आउट में जीत सकता है। आस्ट्रेलिया ने कप्तान अरन जेलवेस्की के साथ अच्छी शुरूआत की। सरदार ने गोलकीपर के पैड के बीच से बॉल को निकालने की कोशिश की पर गेंद फ्लैप से टकरा कर रुक गई। दूसरी ओर डेनियल बेले ने साफ गोल कर 2-0 की बढ़त बना ली। भारत के हरमनप्रीत सिंह फिर चूक गए और मैथ्यू स्वान और टॉम क्रेग स्कोर नहीं कर पाए और जब मनप्रीत ने गोल किया तो भारत को एक उम्मीद बन गई थी लेकिन जर्मनी एडवर्ड ने गोल कर ट्राफी अपने नाम करवा ली। 36 प्रतियोगिताओं में आस्ट्रेलिया की यह 15वीं जीत थी।

भारत का लगातार यह दूसरा रजत पदक था। राष्ट्रमंडल खेलों में मिली बड़ी हार के बाद वे इस टूर्नामेंट में अपनी खोई हुइ अस्मिता पाने के लिए आए थे। हार के बाद और आस्ट्रेलियाई टीम के खिलाफ क्या हो सकता था उस के बारे में टीम की बैठक हुई। ब्रेडा में जो भी हुआ उस पर वे गर्व से देखेंगे। कोच हरेंद्र ने कहा, ‘मैच खत्म होने के बाद मैंने टीम को गर्व महसूस करने के लिए कहा। उन्होंने विश्व चैंपियन के खिलाफ फाइनल खेला और वे आसानी से मैच को बदल सकते थे। खैर कोई बात नहीं हमारे पास और अवसर आएंगे और आने वाले समय मं कुछ ब्ड़ा हो सकता है।’

सर्वश्रेष्ठ गोलकीपर का पुरस्कार श्रीजेश के जख्मों को भर नहीं सकता। उन्होंने कहा, ‘व्यक्तिगत पुरस्कार ठीक है यह थोड़े समय के लिए रहता है।’ ”जादू चैंपियन ट्राफी जीतने में था तब व्यक्तिगत पुरस्कार का महत्व था। तब इसका महत्व समझ में आता जब टीम जीतती। यह मेरे लिए ठीक है। यह एक उपलब्धि बनता अगर टीम जीतती”।

आस्ट्रेलियाई पेनल्टी कार्नर पर बात करना श्रीजेश को बेहद परेशान कर रहा था। उन्होंने खुद को कोसा, ‘मैंने उस तरह के गोल खाकर टीम को मुसीबत में डाल दिया। एक गोलकीपर के रूप में आप इस तरह गोल नही खा सकते। मुझे पता है कि मैंने टीम का नुकसान किया’।

अभी तक यह श्रीजेश का शानदार प्रदर्शन था जिसने मुश्किल परिस्थितियों में टीम को बचाया। विवेक उत्साहित था कि उसने इतने बड़े फाइनल में स्कोर किया परन्तु बिल्कुल निराशा था कि भारत हार गया। ‘हम यहां जीतने के लिए आए थे और टीम की बैठक में यही हमारी मनोदशा थी’ उन्होंने कहा। ‘हम जानते थे कि वास्तव में क्या करना है और हमने जीत के लिए सब कुछ किया। शायद थोड़ा करना और ज़रूरी था”।

मनप्रीत के आंखों में आसूं थे और उसे दूसरी बार रजत जीतने का उत्साह नही था। ”सब कुछ हमारे पक्ष में था और हम पिच पर सब कुछ सही तरीके से कर रहे थे। हां हमें मौके का लाभ उठाना चाहिए था”। लंबे समय तक उसने अपने सिर को पकडे रखा। उसने अपने आसुंओं को पोंछा। आखिकार उसने देखा और कहा, ”इसमें कुछ समय लगेगा, लेकिन हम आगे आने वाली एशियाई खेलों और विश्व कप की चुनौतियों को देखेंगे”।

कई बाद कौशल भ्रमित हो सकता है। बॉल पर कब्जा और तेज काऊटर हमलों ने भारत को एक नई पहचान दी। इस पल में थोडे समय के लिए भावना से रहित चैंपियनल ट्राफी रजत पदक एक तरफ चिकित्सकीय हो सकता है। जिसे आसपास कुछ बड़ी चुनौतियां हैं।