आमने-सामने

Protesting Farmers gather at Singhu border during the demonstration against newly passed farm bills in Delhi. Thousands of farmers from various states march towards the India capital to protest against newly passed farm bills they say will severely hurt their incomes, according to farmers union

तीन कृषि क़ानून वापस लेने पर भी किसान अन्य मुद्दों पर अडिग

एक साल से जारी आन्दोलन बताता है कि किसान हार मानने को तैयार नहीं हैं। प्रधानमंत्री मोदी की तीन कृषि क़ानून वापस लेने की बड़ी घोषणा के बाद 29 नवंबर, 2021 को संसद के शीतकालीन सत्र में दोनों सदनों में कृषि क़ानून वापसी विधेयक-2021 पारित करने के बावजूद किसान न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) को क़ानून का दर्जा देने सहित अन्य सभी मसले हल करने की माँग को लेकर अडिग हैं। क़ानून वापस लेने की घोषणा से भाजपा जिस राजनीतिक लाभ की उम्मीद कर रही थी, किसानों की रणनीति ने उसे ध्वस्त कर दिया है। किसानों ने आन्दोलन जारी रखने का फ़ैसला किया है। क्योंकि उन्हें मालूम है कि दबाव हटते ही सरकार उन पर हावी हो जाएगी। विधानसभा चुनावों की बेला में किसानों और सरकार के बीच तनातनी भाजपा ख़ेमे की चिन्ता बढ़ा रही है। पूरे घटनाक्रम और सरकार व किसानों के बीच बढ़ रहे तनाव को लेकर बता रहे हैं विशेष संवाददाता राकेश रॉकी :-

सिंघु बॉर्डर पर अजीब-सी ख़ामोशी है। जैसे किसी तूफ़ान से पहले की ख़ामोशी हो। पिछले एक साल में दिल्ली की सीमाओं पर किसानों की एक पूरी बस्ती बस गयी है। अपने हक़ की लड़ाई और देश को अन्न दे सकने की कुव्वत बनी रहे, इसके लिए 700 से अधिक किसान इस आन्दोलन के दौरान अपनी शहादत दे चुके हैं और जो लाखों किसान इस आन्दोलन से अभी भी जुड़े हैं; दिल्ली की सीमाओं और दूसरे कई प्रदेशों में जगह-जगह डटे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तीन कृषि क़ानूनों को वापस लेने की घोषणा के बाद सरकार को लगा था कि किसान अब शायद अपने घर लौट जाएँगे और आन्दोलन ख़त्म हो जाएगा। लेकिन किसान संघर्ष समिति ने साफ़ कह दिया है कि जब तक एमएसपी (न्यूनतम समर्थन मूल्य) सहित उनके दूर मसले हल नहीं होते, आन्दोलन ख़त्म नहीं होगा। 29 नवंबर, 2021 को संसद के शीतकालीन सत्र में दोनों सदनों में कृषि क़ानून वापसी विधेयक-2021 पास हो गया।

मोदी सरकार की तीन कृषि क़ानूनों को वापस लेने की घोषणा जिस तरह गुरु पर्व (कार्तिक पूर्णिमा) के दिन आयी, उससे किसानों और अन्य कई लोगों को लगा है कि एनडीए सरकार, ख़ासकर भाजपा इस पवित्र दिन को राजनीतिक लाभ के लिए इस्तेमाल करना चाहती है। किसान सुखदेव सिंह ने कहा- ‘एक साल में 700 से अधिक किसान मर गये। किसान आन्दोलन स्थल पर सर्दी में ठिठुरते रहे, गर्मी से बेहाल रहे और भारी बारिश में भीगते रहे। किसानों को ख़ालिस्तानी और देशद्रोही कहा गया। अब उपचुनावों के नतीजों में भाजपा की हवा खिसकी है, तो किसानों की याद आ गयी। वो (सरकार और भाजपा) सिर्फ़ राजनीति कर रहे हैं।’

यह सही है कि पंजाब किसान आन्दोलन का अगुआ रहे हैं; लेकिन इसे इस तरह एक धर्म विशेष से जोडऩे की सरकार की कोशिश का लोगों में ग़लत सन्देश गया है। किसान तो हर वर्ग के हैं। फ़िलहाल सिंघु बॉर्डर और आन्दोलन के अन्य ठिकानों में जाने पर कहीं नहीं लगता कि किसान बोरिया-बिस्तर समेटकर अपने-अपने घरों को लौटने वाले हैं।

सिंघु बॉर्डर पर लुधियाना के एक गाँव के किसान गुरबख्श सिंह ने कहा- ‘खेत हमने कोई खिल्ले (ख़ाली) थोड़े ही छोड़ रखे हैं। बारी-बारी से हमारे परिवारों के लोग यहाँ (सिंघु बॉर्डर) पर ड्यूटी निभाते हैं और जो गाँवों में हैं, वे खेतों में करते हैं। फ़ौज में हमारे जो बच्चे हैं, वे भी छुट्टी लेकर आते हैं और यहाँ आन्दोलन स्थल पर ड्यूटी निभाते हैं। यह आन्दोलन किसान अपने लिए थोड़े ही कर रहे हैं; देश के लिए कर रहे हैं। किसान तो नमक के साथ भी रोटी खा लेता है। यह आन्दोलन तो देश के अन्न (लोगों को अन्न उपलब्ध कराने) के लिए है।’

किसान कहते हैं कि कृषि क़ानून किसी भी तरह किसानी और किसान के हक़ में नहीं। एमएसपी को क़ानून के दायरे में लाना भी बड़ा मसला है। तीन क़ानूनों से जुड़े और कई मुद्दे हैं जो किसानों और खेती को प्रभावित करते हैं। किसान संघर्ष समिति के नेता राकेश टिकैत ने कहा- ‘संयुक्त किसान मोर्चा प्रधानमंत्री मोदी के फ़ैसले का स्वागत करता है और संसदीय प्रक्रियाओं के माध्यम से घोषणा के प्रभावी होने की प्रतीक्षा करेगा। आन्दोलन अभी ख़त्म नहीं हो रहा। प्रधानमंत्री यह याद रखें कि किसानों का आन्दोलन न केवल तीन काले क़ानूनों को निरस्त करने के ख़िलाफ़ है, बल्कि सभी कृषि उत्पादों और सभी किसानों के लिए लाभकारी मूल्य की वैधानिक गारंटी के लिए भी है। किसानों की यह अहम माँग अभी बाक़ी है।’ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब गुरु पर्व वाले दिन किसान क़ानून वापस लेने के घोषणा की तो उन्होंने यह भी कहा कि शायद वे किसानों को समझाने में नाकाम रहे तो ऐसा लगा कि वे इतनी बड़ी घोषणा करने के बावजूद किसानों पर ही सब चीजों का ठीकरा फोड़ रहे हैं। उस समय प्रधानमंत्री ने देश को भी सम्बोधित किया और कहा कि किसान अब खेतों में लौट जाएँ। लेकिन इस बड़े ऐलान से किसान आन्दोलन को लेकर जो होने की कल्पना भाजपा या मोदी सरकार ने की थी वैसा कुछ हुआ नहीं। कारण यह था कि किसानों की बड़ी जमात ने इस घोषणा को भाजपा के राजनीतिक एजेंडे के रूप में देखा।

यदि ऐसी कोई घोषणा आज से साथ-आठ महीने पहली होती तो उसमें सरकार की मंशा ईमानदारी के रूप में ली जाती। लेकिन यह वो दौर था, जब भाजपा के बड़े नेता से लेकर छोटे नेता तक किसानों को जी भर-भरकर गालियाँ दे रहे थे। उन्हें ख़ालिस्तानी और देश विरोधी बताया जा रहा था। निश्चित ही सत्तारूढ़ दल की इन राजनातिक कोशिशों से किसान ख़फ़ा थे। उन्हें सरकार के रूप में दोस्त नहीं दुश्मन नज़र आ रहा था। केंद्र और किसान नेताओं के बीच बातचीत की दर्ज़न भर बैठकों के बावजूद यदि कोई ठोस फार्मूला नहीं निकल पाया, तो इसका सबसे बड़ा कारण किसानों को बदनाम करने की यही साज़िश थी; क्योंकि इसने किसानों और सरकार (भाजपा भी) के बीच अविश्वास की गहरी खाई खोद दी थी। अब जबकि तीन कृषि क़ानून वापस लेने जैसा बड़ा ऐलान देश के प्रधानमंत्री की तरफ़ से हुआ है; विश्वास की कमी नासूर बनकर सामने है। किसानों का सरकार पर कोई भरोसा नहीं बचा है। किसान सरकार को एक मित्र और शुभचिन्तक के रूप में देखने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे। किसानों को लगता है कि भाजपा उपचुनावों में हारी है और आने वाले विधानसभा चुनावों में उसे गम्भीर चुनौती दिख रही है। इसलिए उसने तीन कृषि क़ानूनों को वापस लेने का दाँव चला है। किसान समझते हैं कि इसमें शुद्ध राजनीति है, किसानों के प्रति कोई प्यार या सहानुभूति नहीं।

अब यह साफ़ हो गया है कि प्रधानमंत्री मोदी ने क़ानून वापस लेने की जो घोषणा की थी, वह किसानों के तमाम अन्य मसलों के हल होने तक आन्दोलन जारी रखने की घोषणा से राजनीतिक रूप से धारदार नहीं रह गयी। यदि किसानों की समस्याओं को समझते हुए पहले ऐसी घोषणा होती, तो उसके मायने अलग होते; भले ही तब भी भाजपा राजनीतिक लाभ की मंशा रखे होती। उसे एक राजनीतिक दल के रूप में इसका लाभ मिलता; लेकिन अब शायद ऐसा न हो। भाजपा के सामने उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य सहित पाँच राज्यों के विधानसभा चुनाव की बड़ी चुनौती है। यह साफ़ है कि देश में आज की तारीख़ में भाजपा देश में सन् 2014 या सन् 2019 जैसा लोकप्रिय राजनीतिक दल नहीं रह गया है। नवंबर में उसे देश भर में हुए विभिन्न उपचुनावों में बांछित नतीजे नहीं मिले हैं। हिमाचल जैसे भाजपा के मज़बूत गढ़ में पार्टी को करारी हार मिली है। मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर के घर मंडी में भाजपा का उम्मीदवार लोकसभा उपचुनाव हार गया। यही नहीं तीन विधानसभा सीटों में से एक भी भाजपा को नहीं मिली और उसे शर्मनाक हार झेलने पड़ी। अब चर्चा है कि विधानसभा चुनावों से पहले या बाद में मुख्यमंत्री जयराम पर इस हार की गाज गिर सकती है।

देश में भले भाजपा के नेता और भाजपा-संघ-पूँजीपति समर्थक सोशल मीडिया प्रधानमंत्री मोदी की घोषणा को बहुत बड़ी घोषणा के रूप में पेश कर रहा हो, यही वर्ग एक महीने पहले तक किसानों को देशद्रोही ब्रांड करने के लिए रात-दिन एक किये हुए था। इन 12 महीनों में किसानों को क्या-क्या नहीं कहा गया? सैकड़ों की शहादत हुई, वह अलग। प्रधानमंत्री ने जब तीन क़ानून वापस लेने की बात कही और किसानों ने कहा कि वे एमएसपी को क़ानून के दायरे में लाने की भी माँग कर रहे हैं। लिहाज़ आन्दोलन ख़त्म नहीं होगा, अभी तो इस वर्ग ने फिर बन्दूकें किसानों की तरफ़ तान लीं। सौहाद्र्र की कमी इसी से ज़ाहिर हो जाती है; क्योंकि किसानों की माँगें तो साल भर से जनता के सामने हैं।

क्या थे तीन क़ानून?

मोदी सरकार ने पिछले साल तीन कृषि क़ानून बनाये थे, जिनके किसानों के हित में होने का दावा किया गया था। हालाँकि इन क़ानूनों का व्यापक स्तर पर विरोध भी हुआ और इनके ज़रिये किसानों को कार्पोरेट की दया पर छोडऩे के आरोप भी कांग्रेस, अन्य विपक्षी दल और कृषि जानकार लगाते रहे हैं। इनमें पहले क़ानून कृषक उपज, व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सरलीकरण) अधिनियम-2020, दूसरा कृषक (सशक्तिकरण व संरक्षण) क़ीमत आश्वासन और कृषि सेवा पर क़रार अधिनियम-2020 और तीसरा आवश्यक वस्तुएँ संशोधन अधिनियम-2020 शामिल हैं।

कृषक उपज व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सरलीकरण) अधिनियम-2020 : सरकार के दावे के मुताबिक, इन तीन क़ानूनों के तहत देश के किसानों को उनकी उपज बेचने के लिए अधिक विकल्प मुहैया कराना मुख्य उद्देश्य था। ये क़ानून देश के किसानों को अच्छी क़ीमत पर अपनी फ़सल बेचने की स्वतंत्रता देता था।

इसके अलावा यह, राज्य सरकारों को मंडी के बाहर होने वाली उपज की ख़रीद-फ़रोख़्त पर कर (टैक्स) वसूलने से रोक लगाता था। इस क़ानून के तहत किसान अपनी फ़सलों को देश के किसी भी हिस्से में किसी भी व्यक्ति, दुकानदार, संस्था आदि को बेच सकते हैं। इतना ही नहीं, किसान अपनी उपज की क़ीमत भी ख़ुद तय कर सकते हैं।

कृषक (सशक्तिकरण व संरक्षण) क़ीमत आश्वासन और कृषि सेवा पर क़रार अधिनियम-2020 : इस क़ानून के तहत देश भर के किसान बुवाई से पहले ही तय मानकों और तय क़ीमत के हिसाब से अपनी फ़सल को बेच सकते थे। सीधे शब्दों में कहें, तो यह क़ानून ठेके पर खेती (कॉन्ट्रेक्ट फॉर्मिंग) से जुड़ा है। इस क़ानून को लेकर सरकार का कहना था कि इसके ज़रिये किसानों को नुक़सान का जोखिम कम रहेगा। इसके अलावा उन्हें फ़सल तैयार होने के बाद ख़रीदारों को जगह-जगह जाकर ढूँढने की भी ज़रूरत नहीं होगी। इतना ही नहीं, इसके ज़रिये देश का किसान समानता के आधार पर न सिर्फ़ ख़रीदार ढूँढ पाने में सक्षम होगा, बल्कि उसकी पहुँच बड़े कारोबारियों और निर्यातकों तक बढ़ जाएगी।

आवश्यक वस्तुएँ संशोधन अधिनियम-2020 : फ़सलों के भण्डारण और फिर उसकी काला बाज़ारी को रोकने के लिए सरकार ने पहले ज़रूरी वास्तु अधिनियम 1955 बनाया था। इसके तहत व्यापारी एक सीमित मात्रा में ही किसी भी कृषि उपज का भण्डारण कर सकते थे। वे तय सीमा से बढक़र किसी भी फ़सल को स्टॉक में नहीं रख सकते थे। नए कृषि क़ानूनों में आवश्यक वस्तुएँ संशोधन अधिनियम-2020 के तहत अनाज, दाल, तिलहन, खाद्य तेल, प्याज और आलू जैसी कई फ़सलों को आवश्यक वस्तुओं की लिस्ट से बाहर कर दिया। सरकार ने कहा कि राष्ट्रीय आपदा, अकाल या ऐसे ही किसी विपरीत हालात के दौरान इन वस्तुओं के भण्डारण पर कोई सीमा नहीं लगेगी।

एमएसपी पर क़ानून क्यों ज़रूरी?

न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी एमएसपी। किसान इसे क़ानून के दायरे लाने की माँग कर रहे हैं। एमएसपी उत्पाद की वो न्यूनतम क़ीमत है, जिस पर सरकार किसानों से उनकी फ़सल ख़रीदती है। यदि फ़सलों के दाम बहुत ज़्यादा गिर जाएँ, तो भी किसान कम-से-कम अपनी लागत का ख़र्च इसमें निकाल लेता है। उन्हें कुछ-न-कुछ मुनाफ़ा भी हो जाता है। देश में आज की तारीख़ में 23 फ़सलों पर किसानों को एमएसपी सरकार की तरफ़ से मिलता है। इन फ़सलों में गेहूँ-धान जैसी मुख्य फ़सलें शामिल। दिलचस्प यह है कि देश में इस व्यवस्था को संवैधानिक दर्जा नहीं है। देश में अनाज उत्पादन बढ़ाने की पहली कोशिश सन् 1964 में हुई, जब तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने एक समिति बनायी; जिसे गेहूँ और चावल का न्यूनतम मूल्य (एमएसपी) तय करने का ज़िम्मा दिया गया। कृषि मूल्य आयोग का गठन किया गया, जो बाद में कृषि लागत और मूल्य आयोग बन गया और यही आयोग आज देश की 23 फ़सलों का एमएसपी तय करता है। वैसे सन् 2015 में भारत सरकार की एक समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि देश में एमएसपी का महज़ छ: फ़ीसदी किसानों को ही मिल पाता है। यानी 94 फ़ीसदी को कोई लाभ नहीं मिलता। इसके दो कारण हैं। एक तो देश के सभी ज़िलों में सरकारी मंडियाँ नहीं हैं, जिससे किसान अपनी फ़सलें सरकार को आसान से बेच सकें और दूसरा सरकार के पास फ़सलों के स्टॉक के लिए ज़्यादा व्यवस्था नहीं है।

किसान चाहते हैं कि सरकार ऐसा क़ानून बनाये, जिससे कोई भी उनके उत्पाद को एमएसपी से नीचे न ख़रीद सके। उसके लिए दण्ड की व्यवस्था हो। अभी एमएसपी पर ख़रीद दो दर्ज़न फ़सलों तक सीमित है। लेकिन गेहूँ और धान को छोड़ दें, तो अधिकतर फ़सलों की ख़रीद दयनीय दशा में है। ऐसा नहीं है कि मौज़ूदा किसान आन्दोलन में ही न्यूनतम समर्थन मूल्य या एमएसपी पर ख़रीद की चर्चा चल रही है।

लम्बे समय से किसान आन्दोलनों के केंद्र में कृषि मूल्य नीति या वाजिब दाम शामिल रहा है। किसान अरसे से माँग करते आ रहे हैं कि कृषि उत्पादों के मूल्य-1967 को आधार वर्ष तय करके घोषित किये जाएँ। अस्सी के दशक के बाद तो कोई ऐसा किसान आन्दोलन नहीं हुआ, जिसमें फ़सलों का वाजिब दाम न शामिल रहा हो। ख़ुद संसद, संसदीय समितियों और विधान सभाओं में इस पर व्यापक चर्चाएँ हुई हैं। एक दौर में जबकि एमएसपी की व्यवस्था की गयी थी, वह ठीक ठाक थी। उत्पादन बढऩे के साथ अन्य इलाक़ों के किसानों की भी इसके दायरे में आने की चाहत बढ़ी है। किसान संगठन एमएसपी के पैमाने और सरकारी ख़रीद दोनों से असन्तुष्ट रहे हैं। वहीं सरकार भी जानती है कि किसानों को वाजिब दाम मिलने लगे तो उनकी अधिकतर समस्याओं का हल निकल जाएगा। उनका उत्पाद सरकार ख़रीदे या निजी क्षेत्र; लेकिन सही दाम मिलेगा, तभी तो आय बेहतर होगी। इसका उनके जीवन स्तर अनुकूल पर असर पड़ेगा और देश की अर्थ-व्यवस्था पर भी। दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा खाद्यान्न उत्पादक देश भारत ही है। पाँच दशक में हमारा गेहूँ उत्पादन नौ गुने और धान उत्पादन तीन गुने से ज़्यादा बढ़ा है। लेकिन खेती की लागत भी इसी अनुपात में बढ़ी है। अफ़सोस यह है कि कृषि उत्पादों के दाम नहीं। लिहाज़ एमएसपी को क़ानूनी दायरे में लाना किसानों के हित में ही होगा।

किसान और राजनीति

बहुत-से लोग मानते हैं कि उत्तर प्रदेश में आने वाले विधानसभा चुनाव में राजनीतिक घाटे का ख़तरा महसूस करके ही मोदी सरकार को तीन कृषि क़ानून वापस लेने के लिए मजबूर होना पड़ा है। याद रहे मुज़फ़्फ़रनगर की महापंचायत में सितंबर में किसान नेता राकेश टिकैत ने ‘वोट पर चोट’ का नारा दिया था। तब से ही माना गया है कि उत्तर प्रदेश और उत्तराखण्ड में विधानसभा चुनाव में किसानों का गुस्सा असर दिखाएगा। इसमें कोई दो-राय नहीं कि किसानों का आन्दोलन लगातार राजनीतिक चर्चा के केंद्र में रहा है।

हाल के महीनों में उत्तर प्रदेश में किसान आन्दोलन का प्रभाव, ख़ासतौर पर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में काफ़ी दिख रहा है। इसके कई कारण हैं। एक तो इस इलाक़े में ज़्यादातर गन्ना किसान हैं और वो तीन कृषि क़ानून के ख़िलाफ़ चल रहे आन्दोलन में शुरू से ही शामिल रहे हैं। दूसरे, आन्दोलन का नेतृत्व करने वाली भारतीय किसान यूनियन का इस इलाक़े में जबरदस्त प्रभाव है। जिन राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं, किसान संघर्ष मोर्चा वहाँ महापंचायतों के कार्यक्रम कर रहा है। किसान नेता इनमें लगातार भाजपा के ख़िलाफ़ लोगों से वोट करने की अपील करते रहे हैं।

किसान संघर्ष मोर्चा के नेता राकेश टिकैत का कहना रहा है कि पश्चिम उत्तर प्रदेश से ही भाजपा का उत्तर प्रदेश में झंडा बुलंद हुआ था और वहीं से उनकी उल्टी गिनती भी शुरू होगी। किसानों ने केंद्र और उत्तर प्रदेश में भाजपा की सरकार बनवायी; लेकिन अब सरकार इन्हीं किसानों की बात अनसुनी कर रही है। यदि किसान वोट देकर सत्ता दिला सकता है, तो वोट की चोट करके गद्दी से उतार भी सकता है।

भाजपा की चिन्ता का दूसरा बड़ा कारण हाल के महीनों में पंचायत चुनाव में भाजपा को झटका लगना भी है। सीधे मतदाताओं की ओर से चुने जाने वाले ज़िला पंचायत सदस्यों में समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय लोकदल को अच्छी-ख़ासी जीत मिली थी। अब तो राज्य में कांग्रेस नेता प्रियंका गाँधी भी जबतदस्त तरीक़े से सक्रिय हो चुकी हैं।

देखा जाए, तो पिछले तीन चुनावों (सन् 2014 व 2019 के लोकसभा चुनाव और 2017 के विधानसभा चुनाव) में पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भाजपा को बड़ी बढ़त मिली थी। हालाँकि अब किसान आन्दोलन की वजह से स्थितियाँ काफ़ी बदल चुकी हैं। भले भाजपा के नेता ऊपरी तौर पर कहते रहें कि किसान आन्दोलन का कोई नुक़सान भाजपा को नहीं होगा। लेकिन एक भाजपा नेता ने नाम न छापने की शर्त पर स्वीकार किया कि पार्टी को नुक़सान होगा। उनका यह भी मानना है कि भले तीन कृषि क़ानून वापस लेने की घोषणा की गयी है, यह बहुत देरी से किया गया फ़ैसला है। 100 से ज़्यादा विधानसभा सीटों की क्षमता वाले पश्चिमी उत्तर प्रदेश में निश्चित की किसान भाजपा के लिए एक बड़ी चुनौती साबित हो सकते हैं। उत्तराखण्ड में भी किसान किसी पार्टी की हार जीत में बड़ी भूमिका अदा कर सकते हैं।

प्रधानमंत्री का ऐलान

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुरु पर्व जैसे बड़े मौक़े पर केंद्र सरकार द्वारा तीनों कृषि क़ानून वापस लिए जाने का ऐलान किया। निश्चित ही प्रधानमंत्री की घोषणा स्वागत योग्य थी और दिल्ली के ग़ाज़ीपुर बॉर्डर पर जलेबियाँ बाँटी गयीं। लेकिन इसे मोदी सरकार की दरियादिली और मास्टरस्ट्रोक के रूप में पेश करने वाला गोदी मीडिया भूल गया कि यह सरकार का किसानों की दृढ़ता के आगे झुकने और हाल के उपचुनावों में बेहतर नतीजे नहीं आने का असर था। मोदी ने राष्ट्र के नाम अपने सम्बोधन में तीनों कृषि क़ानूनों को वापस लेने का ऐलान किया और कहा कि मैं आपको, पूरे देश को, ये बताने आया हूँ कि हमने तीनों कृषि क़ानूनों को वापस लेने का फ़ैसला किया है। नवंबर के अन्त में होने जा रहे संसद सत्र में हम इन तीनों कृषि क़ानूनों को वापस लेने की संवैधानिक प्रक्रिया को पूरा कर देंगे।

प्रधानमंत्री ने कहा कि सरकार ने कृषि क्षेत्र से जुड़ा एक और अहम फ़ैसला किया है। वो यह कि ज़ीरो बजट खेती यानी प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने के लिए, देश की बदलती ज़रूरतों को ध्यान में रखकर क्रॉप पैटर्न को वैज्ञानिक तरीक़े से बदलने के लिए, एमएसपी को और अधिक प्रभावी और पारदर्शी बनाने के लिए ऐसे सभी विषयों पर भविष्य को ध्यान में रखते हुए निर्णय लेने के लिए एक समिति का गठन किया जाएगा। इस समिति में केंद्र सरकार, राज्य सरकारों के प्रतिनिधि होंगे, किसान होंगे, कृषि वैज्ञानिक होंगे, कृषि अर्थशास्त्री होंगे। संयुक्त किसान मोर्चा ने प्रधानमंत्री मोदी के ऐलान पर कहा कि मोर्चा इस निर्णय का स्वागत करता है और उचित संसदीय प्रक्रियाओं के माध्यम से घोषणा के प्रभावी होने की प्रतीक्षा करेगा। मोर्चा ने कहा कि किसानों की कई अहम माँगें अभी बाक़ी हैं। मोर्चा इन सभी घटनाक्रमों पर ध्यान देगा, जल्द ही अपनी बैठक करेगा, और आगे के निर्णयों की घोषणा करेगा। कृषि क़ानून रद्द होने पर ऑल इंडिया किसान सभा महासचिव हन्नान मोल्लाह ने कहा कि मैं इस घोषणा का स्वागत करता हूँ। जब तक सदन से इस घोषणा पर कार्यवाही नहीं होती है, तब तक यह कोशिश सम्पूर्ण नहीं होगी। इससे हमारे किसानों की समस्या हल नहीं होगी। एमएसपी के लिए हमारा आन्दोलन जारी है और जारी रहेगा।

किसान नेता राकेश टिकैत ने प्रधानमंत्री के ऐलान पर ट्वीट कर कहा कि आन्दोलन तत्काल वापस नहीं होगा। हम उस दिन का इंतज़ार करेंगे, जब कृषि क़ानूनों को संसद में रद्द किया जाएगा। टिकैत ने कहा कि अगर समझने में एक साल लगा तो देश बर्बाद हो जाएगा। आन्दोलन में 700 से अधिक  किसान शहीद हो गये। हम लोग एक साल से आन्दोलन कर रहे हैं। देश की राजधानी को घेर कर रखे हुए हैं। यह सरकार के लिए शर्म की बात है। इसके बाद अगले दिन किसान संगठनों ने महाबैठक की जिसमें सर्वसम्मत फ़ैसला हुआ कि आन्दोलन जारी रखा जाएगा।