आमंत्रित आपदा

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हर पांच मील पर एक चट्टी होती थी जहां आस-पास के गांवों के लोग यात्रियों को राशन और चौका-बर्तन उपलब्ध कराते थे. श्रीनगर, रुद्रप्रयाग, गौचर, चटवापीपल, कर्णप्रयाग, नंदप्रयाग और चमोली सहित तब सारे गांव भले ही अलकनंदा नदी के किनारे थे, लेकिन कोई भी यात्रा-चट्टी नदी किनारे नहीं बनाई गई थी. चमोली, रुद्रप्रयाग और उत्तरकाशी में सड़कों का निर्माण 1950 के बाद हुआ. ये सड़कें नदियों के किनारे बनाई गईं.

नतीजा यह हुआ कि बस्तियां और बाजार नदी के नजदीक बसने लगे. इन बस्तियों में से अधिकांश का दर्जा अभी भी गांव का ही है. उत्तराखंड में गांवों में भवन निर्माण करने के लिए किसी वैधानिक इजाजत की जरूरत नहीं होती है इसलिए नदी किनारे इन गांवों के खेतों में बड़े-बड़े होटल बनने लगे. इनमें से अधिकांश नदी के साथ बह गए हैं. यानी न तो परंपरागत ज्ञान से सबक लिया गया और न ही उनको रोकने वाला कानून ही मौजूद रहा. कस्बों में भवन निर्माण के नियम होने के बावजूद नदियों के तटों पर खूब अवैध निर्माण हुआ है.

पर्यावरणविद चंडी प्रसाद भट्ट बताते हैं, ‘हाल ही में बहे गढ़वाल मंडल विकास निगम के पीपलकोटी, स्यालसौड़ और गबनीगांव स्थित रेजार्ट नदी के तट पर ही बसे थे. जब सरकारी विभाग इस तरह के निर्माण करते हैं तो निजी क्षेत्र के लोग भी उनका अनुकरण करते हैं.’ इस बार की आपदा में मंदाकिनी नदी ने गौरीकुंड से रुद्रप्रयाग तक नदी किनारे बने सैकड़ों मकानों को निगल दिया. यही हाल उत्तरकाशी में रहा.

हेलिकॉप्टर सेवा 
केदारनाथ की ऊंचाई के इलाकों को उत्तराखंड में बुग्याल कहते हैं. बुग्यालों में स्थानीय निवासी गर्मियों में अपनी भेड़ों को चराने जाते हैं या फिर सावन के महीने पूजा के लिए ब्रह्म कमल लेने. बुग्यालों की जीवन पद्धति ही अलग है. इन भेड़ पालकों द्वारा बुग्यालों में चिल्लाने पर पूरी मनाही होती है, यहां तक खांसने से भी परहेज किया जाता है. भेड़पालकों का मानना है कि चिल्लाने से आवाज गूंजती है और हिवालें (ग्लेशियर) टूटते हैं.

लेकिन तबाही से पहले तक हाल यह था कि गुप्तकाशी से केदारनाथ के लिए 10 कंपनियों के 17 हेलिकॉप्टर रोज औसतन 170 बार उड़ान भर रहे थे. लैंडिंग के लिए जगह खाली न होने के कारण ऊपर उड़ने वाला हेलिकॉप्टर केदार पुरी के चक्कर लगाता है. इससे ध्वनि प्रदूषण तो होता ही है इसके पंखों और इंजन से पैदा होने वाली आवाज चारों ओर के पहाड़ों से टकराकर ईको यानी गूंज पैदा करती है. लोकपरंपरा ने अपने अनुभव से इन जगहों के साथ जो व्यवहार विकसित किया था उसके संदर्भ में देखा जाए तो हेलिकॉप्टर  की इन उड़ानों ने केदारनाथ के आसपास के ग्लेशियरों को कितना नुकसान पहुंचाया होगा, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है.

केदारनाथ की तरह गोविंदघाट से भी हेमकुंट साहिब के लिए हेलिकॉप्टर सेवाएं चलती थीं. यह भी एक रहस्य ही है कि पर्यावरण की दृष्टि से संवेदनशील नंदादेवी राष्ट्रीय पार्क और फूलों की घाटी जैसे क्षेत्र होने के बाद भी इन कंपनियों को हेलीकाप्टर सेवा चलाने की इजाजत कैसे मिल गई.

10 हेलिकॉप्टर कंपनियों की केदारनाथ के लिए चल रही सेवा बंद कराने के लिए स्थानीय लोग 14 जून से आंदोलन भी कर रहे थे. लेकिन रसूखदार लोगों की इन कंपनियों को आंदोलन से रोज करोड़ों रुपये का नुकसान न हो इसके लिए गुप्तकाशी के पास स्थित उनके हैलीपैड पर पीएसी तैनात कर दी गई. प्रशासन व पुलिस के बड़े अधिकारी इसी कारण दो दिन से केदारनाथ में डेरा डाले बैठे थे. यह अलग बात है कि ऐसी प्रशासनिक तत्परता आपदा के दौरान दुर्लभ हो गई.

बिजली परियोजनाएं और नदी की बदलती आदत 
बदरीनाथ घाटी में पांडुकेश्वर से लगभग12 किमी ऊपर बदरीनाथ की तरफ 400 मेगावाट की विष्णुप्रयाग परियोजना का बैराज बना है. यहां से अलकनंदा का पानी रोककर उसे सुरंग के जरिए पावर हाउस में पहुंचा दिया जाता है. सर्दियों और गर्मियों में इस बैराज से लेकर विष्णुप्रयाग यानी लगभग 15 किमी तक अलकनंदा में इतना कम पानी रहता है कि इसे बच्चे भी पार कर सकते हैं. पांडुकेश्वर के लोग बताते हैं कि उस दिन अचानक पानी बढ़ने से परियोजना वालों ने सारा पानी नदी में छोड़ दिया. बाद में बढ़ते पानी और उसके साथ आए मलबे ने बैराज भरते हुए उसके पास की सड़क को तोड़कर अपना रास्ता बना लिया.

स्थानीय निवासी बताते हैं कि पहले जब नदी में बारहों महीने पानी रहता था तो वह धीरे-धीरे अपने तट और रास्ते को बना कर कम नुकसान करती थी. लेकिन अब कई सालों से अलकनंदा नदी में पांच महीने पानी नहीं रहता है. बरसात के महीनों के दौरान अचानक भारी पानी बहने से नदी के किनारों को अधिक नुकसान होता है. इस बार भी भारी बारिश और विष्णुप्रयाग परियोजना से छूटे भारी पानी ने नदी से एक किमी ऊपर बसे पांडुकेश्वर गांव का आधा हिस्सा निगल दिया.

यही हाल केदारनाथ घाटी का भी है. मंदाकिनी नदी पर इस समय दो बड़ी और उसकी सहायक नदी कालीगंगा पर दो छोटी बिजली परियोजनाएं निर्माणाधीन हैं. 76 मेगावॉट की फाटा-ब्योंगगाड परियोजना और 99 मेगावॉट की सिंगोली-भटवाड़ी परियोजना. इन परियोजनाओं के लिए बन रही मुख्य और सहायक सुरंगों के निर्माण से जानकारों के मुताबिक 30 लाख घनमीटर मलबा निकला. इस मलबे के लिए कोई उचित डंपिंग ग्राउंड नहीं बनाया गया बल्कि इसे मंदाकिनी किनारे फेंक दिया गया. यह मलबा पानी के विशाल प्रवाह के साथ टूट कर आए पेड़ों के साथ संकरी पहाड़ी नदियों पर जगह-जगह पर छोटे-छोटे अस्थाई बांधों की श्रंखला बनाता है. ये बांध बनते-टूटते रहते हैं और अचानक पानी का प्रवाह बढ़ाते रहते हैं. मंदाकिनी नदी में भी इस बार अनियमित-अनियंत्रित पानी और उसमें बहते मलबे ने गौरीकुंड से लेकर रुद्रप्रयाग के दर्जन भर पुल बहाए और इतनी ही बस्तियों को निगल लिया.

बदरीनाथ के बाद आपदा की सबसे ज्यादा मार उत्तरकाशी इलाके पर पड़ी. यहां पिछले साल भी भारी तबाही हुई थी. उसका सबसे बड़ा कारण असीगंगा से आने वाले पेड़ और मलबा थे. असीगंगा पर बनने वाली जलविद्युत परियोजना के लिए सैकड़ों पेड़ काटे गए थे और टनों मलबा खोदा गया था. यही मलबा पिछले साल आपदा का कारण बना. इस बार भी असीगंगा से आने वाले मलबे ने ही भागीरथी नदी में मिलकर उत्तरकाशी में तबाही मचाई. साफ है कि सबक नहीं सीखा गया.

आपदा में गढ़वाल के सबसे बड़े कस्बे श्रीनगर को बड़ा नुकसान हुआ. श्रीनगर में अकेले एसएसबी अकादमी को 100 करोड़ रु की क्षति हुई है. श्रीनगर से पहले जीवीके परियोजना का बैराज बना है. इस बैराज के पानी से यहां प्रसिद्ध धारी देवी मंदिर को डूबना था. स्थानीय धर्मावलंबी और साधु-संत देवी की मूर्ति को हटाने का विरोध कर रहे थे. श्रीनगर के स्थानीय निवासी बताते हैं कि कंपनी ने बैराज के गेटों को बंद कर के धारी देवी मंदिर तक पानी बढ़ने दिया और उसके बाद धारी देवी की मूर्ति को डूबने का बहाना बना कर शिफ्ट करा दिया गया. जो काम सालों से नहीं हो रहा था कंपनी ने पानी के बढ़ने का बहाना बनाकर कर दिया. धारी देवी की मूर्ति को हटाने के बाद कंपनी ने अपने प्रोजेक्ट और पावर हाउस की सुरक्षा के लिए बैराज के सारे गेट खोल दिए. उसी के बाद श्रीनगर कस्बे के एक हिस्से में तबाही मच गई. स्थानीय लोगों का मानना है कि श्रीनगर में हुई तबाही का कारण एक साथ छोड़ा गया यह पानी भी था.

इस आपदा में नुकसान की एक बड़ी वजह भूस्खलन भी रही है जिसने जगह-जगह सड़कों का एक बड़ा हिस्सा नष्ट हो गया. पहाड़ों में सुरंगें या सड़कें बनाने के लिए विस्फोटकों का व्यापक प्रयोग इन भूस्खलनों में हुई बढ़ोत्तरी का अहम कारण है. बड़े पैमाने पर विस्फोटकों के प्रयोग से पहले से ही कच्चा हिमालय और भी कमजोर हो रहा है. विशेषज्ञों के मुताबिक इन विस्फोटों के कारण धरती में छोटे-छोटे भूकंप पैदा होते हैं. ट्रक या बस जैसी बड़ी गाड़ियों के वहां से गुजरने से भी ऐसे सूक्ष्म भूकंप बनते हैं. रोज लाखों की तादाद में उठने वाले और हिमालय के भीतर पहले से ही मौजूद अनगिनत दरारों को बार-बार-बार कंपाने वाले ये भूकंप पहाड़ों को कमजोर करते जाते हैं. यह कमजोरी भूस्खलन और बर्बादी का कारण बनती है.

बेकाबू गाड़ियां
जब चट्टी व्यवस्था से सड़क यात्रा का जमाना आया तो पहले-पहल पहाड़ों में गेट व्यवस्था लागू की गई. यह एक तरह से नियंत्रित यातायात की व्यवस्था थी. एक निश्चित स्थान से एक निश्चित समय पर गाड़ियों को दूसरे निश्चित स्थान तक भेजा जाता था. बदरीनाथ-केदारनाथ मंदिर समिति के पूर्व मुख्य कार्याधिकारी जगत सिंह बिष्ट बताते हैं,  ‘गेट व्यवस्था के चलते लोग यात्रा मार्ग के बीच बने कस्बों में भी रुकते थे. अब सारे के सारे यात्री ऋषिकेश से एक ही दिन में बदरीनाथ, गौरीकुंड ,रामबाड़ा व केदारनाथ पहुंच जाते हैं जिससे इन जगहों पर अथाह भीड़ हो जाती है.’ इस बार आपदा के बाद बदरीनाथ, केदारनाथ और गौरीकुंड में फंसे यात्रियों की इस बड़ी संख्या को वहां से निकालना भारी चुनौती रही.

[box]बांधों के चलते कई महीने नदियां करीब सूखी रहती हैं और बारिश में अचानक पानी आने से वे किनारों पर ज्यादा कटाव करने लगती हैं[/box]

हाल की आपदा में भले ही बदरीनाथ में कोई नुकसान न हुआ हो, लेकिन पांडुकेश्वर-गोविंदघाट में सड़क खत्म हो जाने से वहां 10 हजार के लगभग यात्री फंस गए. और जगहों पर हो रही मौतों से बदरीनाथ में फंसे यात्रियों, उनके परिजनों और उनके प्रदेशों की सरकारों ने हाय-तौबा मचानी शुरू कर दी. नतीजा यह निकला कि वहां फंसे यात्रियों में से अधिकांश को हवाई मार्ग से जोशीमठ लाना पड़ा. बदरीनाथ में फंसे यात्रियों को लाने में स्थानीय प्रशासन को अतिरिक्त ऊर्जा लगानी पड़ी. यह ऊर्जा केदारनाथ में ज्यादा राहत पहुंचाने में लग सकती थी. इस तबाही में केदारनाथ में सब कुछ खत्म हो गया है. जैसा कि मंदिर के पुजारी कहते हैं, ‘बचा है तो वही जो 1000 साल पहले भी था. यानी सिर्फ मंदिर.’  शायद प्रकृति ने अपना संदेश दे दिया है. क्या हम अब भी उसे समझेंगे?

(महिपाल कुंवर और रॉबिन चौहान के सहयोग के साथ)

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