आख़िर सरकार की आँखों में क्यों खटक रहा किसान आन्दोलन?

महामारी से निपटने में नाकाम केंद्र सरकार किसानों से निपटने के लिए कड़े क़दम उठाने की दे चुकी है चेतावनी
राम प्रताप सिंह

कोरोना वायरस का हौवा लोगों के दिमाग़ में इस क़दर घर कर गया है कि इसके अलावा किसी को कुछ भी दिखायी नहीं दे रहा है। लेकिन दोबारा तेज़ी से बढ़ती इस महामारी की आड़ में कई बड़े आन्दोलनों कोख़त्म करने की कोशिशें की जा रही हैं। बता दें कि सन् 2019 में सीएए के ख़िलाफ़ शाहीन बाग़ के आन्दोलन को भी मौज़ूदा सरकार ने कोरोना का डर दिखाकर हीख़त्म किया था। किसान आन्दोलन इन दिनों का सबसे बड़ा आन्दोलन है, जिसे कुचलने के लिए सरकार हर सम्भव प्रयास करती रही है। लेकिन अब उसने साफ़ कर दिया है कि किसान आन्दोलन कोख़त्म किया जाएगा, जिसके लिए वह कोरोना फैलाने का आरोप भी किसानों के सिर पर मढ़ चुकी है। लेकिन किसान भी पीछे हटने वाले नहीं हैं और साफ़ कर चुके हैं कि जब तक सरकार तीनों नये कृषि क़ानूनों को वापस नहीं ले लेती, तब तक आन्दोलनख़त्म नहीं होगा। बहादुरगढ़ के टीकरी बॉर्डर, सिंघु बॉर्डर और ग़ाज़ीपुर बॉर्डर पर किसानों का धरना जारी है। लॉकडाउन की वजह से अपने घरों को लौट रहे प्रवासी मज़दूरों को भोजन करा रहे हैं। पिछले दिनों टीकरी बॉर्डर पर किसानों ने धन्ना सेठ जाट का जन्मदिवस मनाया और देशवासियों से किसान आन्दोलन में मदद देने की अपील की। सरकार इस बात को अच्छी तरह समझ चुकी है किख़ाली आश्वासनों से किसान आन्दोलन कोख़त्म नहीं किया जा सकता। इधर यूपी गेट पर ग़ाज़ीपुर किसान आन्दोलन कमेटी सरकार को कड़ा सन्देश दे चुकी है कि वह किसानों के ख़िलाफ़ कितने भी षड्यंत्र कर ले, लेकिन आन्दोलनख़त्म नहीं होने वाला। ग़ाज़ीपुर किसान आन्दोलन कमेटी के प्रवक्ता जगतार सिंह बाजवा ने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार दिल्ली की सीमाओं पर चल रहे किसान आन्दोलन को समाप्त करने का षड्यंत्र कर रही है। इस जवाब के लिए आन्दोलन स्थल पर किसानों की संख्या बढ़ायी जा रही है। किसानों का कहना है कि सरकार भले ही हमारा आन्दोलनख़त्म करने की सा•िाश कर रही है, लेकिन हमारा संघर्ष जारी रहेगा। लेकिन सरकार अपनी •िाद छोडक़र पिछले लॉकडाउन में चुपके से बनाये कृषि क़ानूनों कोख़त्म भी नहीं करना चाहती और यही वजह है कि वह किसान आन्दोलन को अब कुचलने की $िफराक़ में है। सरकार ने कई किसानों के ख़िलाफ़ गुपचुप तरीक़े से क़ानूनी कार्रवाई भी की है। लेकिन किसान आन्दोलन गाँवों में फैल चुका एक ऐसा आन्दोलन बन गया है, जैसे कि अंग्रेजों से लड़ाई के ख़िलाफ़ गाँवों में कई जागृति आन्दोलन पनपने लगे थे। किसानों ने साफ़ किया है कि फ़सलों की कटाई के बाद वे एक बार फिर दिल्ली की सीमाओं पर जमा होंगे। भारतीय किसान यूनियन के प्रवक्ता राकेश टिकैत पूरी तरह से किसान आन्दोलन पर ध्यान दे रहे हैं। किसान आन्दोलन की मज़बूती यह है कि इसे किसान परिवारों महिलाओं और समाज के हर वर्ग और हर क्षेत्र से नामचीन लोगों के साथ-साथ आम लोगों का भरपूर समर्थन प्राप्त है, यही वजह है कि मुख्यधारा की मीडिया के इस आन्दोलन को न दिखाने के बावजूद यह बढ़ता ही जा रहा है।

कृषि प्रधान देश की विडम्बना
खेती दुनिया की अर्थ-व्यवस्था का मूल स्रोत है। बिना खेती के न तो जीवन की कल्पना की जा सकती है और नाही व्यापार चल सकता है। क्योंकि हमारा देश एक कृषि प्रधान देश है, इसलिए यहाँ तो इसका महत्त्व और भी बढ़ जाता है। लेकिन फिर भी बहुत-से लोग यहाँ पेट भर खाने, रोज़गार और तमाम तरह की मूलभूत सुविधाओं के लिए तरसते हैं। यहाँ तक किख़ुद हमारे देश के किसान दु:खी रहते हैं। देश की गिरती जीडीपी को पटरी पर लाने का काम खेती करके किसान ही कर सकते हैं और किसानों को ही सरकार कमज़ोर करने में लगी है। अगर खेती ही नहीं रहेगी, तो दूसरे काम-धन्धे कैसे चल सकेंगे? ताज्जुब है कि सन् 1950 के दशक में जीडीपी में कृषि क्षेत्र का योगदान जहाँ 50 फ़ीसदी था, वहीं 2015-16 में यह गिरकर 15.4 फ़ीसदी रह गया। यह तब हो रहा है, जब सन् 1950 से कृषि खाद्य उत्पादन बढक़र तक़रीबन पाँच गुना हो गया है। ऐसा अनुमान है कि साल 2025 तक देश की आबादी का पेट भरने के लिए 300 मिलियन (30 करोड़) टन खाद्यान्न की आवश्यकता होगी। लेकिन अगर खेती को हीख़त्म करने की सा•िाशें की जाएँगी, तो यह लक्ष्य कैसे हासिल हो सकेगा?

क्या दिल्ली को फिर घेरेंगे किसान?
सरकार को इस बात का डर है कि अगर किसानों ने दोबारा दिल्ली को घेरा, तो क्या होगा? शायद यही वजह है कि उसने कोरोना की आड़ लेकर किसान आन्दोलन को ख़त्म करने का मन बना लिया है। लेकिन सवाल यह भी है कि क्या किसान फिर से दिल्ली को उसी तरह घेरेंगे, जिस तरह उन्होंने पिछले साल गर्मी, बारिश और सर्दी भर दिल्ली को घेरे रखा? अगर ऐसा होता है, तो फिर सरकार के लिए इस आन्दोलन कोख़त्म करना नामुमकिन हो जाएगा; लेकिन अगर ऐसा किसान नहीं कर सके, तो इस आन्दोलन कोख़त्म करने में सरकार कामयाब हो सकती है। हालाँकि भारतीय किसान यूनियन (उग्राहां) इस बात का ऐलान कर चुकी है कि किसान आन्दोलनख़त्म नहीं होगा और एक बार फिर से दिल्ली का घेराव किया जाएगा। जल्द ही हज़ारों किसान पंजाब-हरियाणा के खनौरी बॉर्डर पर इकट्ठे होंगे और वहाँ से किसानों का जत्था जींद व रोहतक होते हुए टीकरी बॉर्डर पहुँचेगा।