आंकड़ों से आत्मविश्वास!

दिग्गज! कांग्रेस के िवि नेता अजीत जोगी. फोटोः विनय शमाि्

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पिछले दिनों सोशल नेटवर्किंग साइटों पर राजनीतिक चुटकलों की श्रंखला में एक और चुटकुला आया. इसका लब्बोलुआब यह था कि भाजपा में चुनाव लड़ने के लिए टिकट मांगनेवालों के बीच मारामारी मची है. आम आदमी पार्टी (आप) की टिकट उम्मीदवार वापस कर रहे हैं. और कांग्रेस में तो जैसे टिकटों की सेल लगी है लेकिन कोई लेनेवाला नहीं. यह चुटकुला कुछ सच्ची घटनाओं से उपजा था, लेकिन छत्तीसगढ़ को छोड़ दें तो देश में बाकी आम जनता की नजर से यह बिल्कुल सटीक था. छत्तीसगढ़ की बात इसलिए कि यहां भाजपा और आप के लिए टिकट चाहने वालों की संख्या में कमी नहीं थी तो कांग्रेस के लिए भी यही हाल था. सबसे हैरानी की बात है कि इस समय जब तकरीबन सभी हिंदीभाषी राज्यों में कांग्रेस का मनोबल टूटा हुआ लग रहा है वहीं छत्तीसगढ़ में कांग्रेस इतनी उत्साहित है कि वह अभी से राज्य की आधे से ज्यादा सीटें अपनी झोली में मानकर चल रही है.

छत्तीसगढ़ कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं का कहना है कि राज्य की कम से कम छह सीटों पर उसकी जीत पक्की है. पार्टी के पास इस दावे के पीछे अपने तर्क भी हैं. कांग्रेस के नेताओं का कहना है कि उसकी स्थिति उन सीटों पर मजबूत है जहां विधानसभा चुनाव में उसके भाजपा से ज्यादा विधायक चुन कर आए हैं या फिर पार्टी के कुल मत प्रतिशत में इजाफा हुआ है. इन सीटों में बस्तर, कांकेर, सरगुजा, कोरबा और बिलासपुर शामिल हैं. पार्टी महासमुंद सीट पर भी जीत तय मान रही है. इसका एक मात्र कारण यहां से पार्टी के उम्मीदवार अजीत जोगी का कुशल चुनाव प्रबंधन है. अब यह कांग्रेस का मुगालता है या सचमुच ही पार्टी इन छह सीटों पर जीत रही है, यह समझने के लिए इन छह सीटों का मिजाज समझना जरूरी है.

प्रदेश में सबसे पहले बस्तर लोकसभा सीट पर मतदान होना है. कांग्रेस इस सीट को लेकर अत्यधिक उत्साहित है. दरअसल 2013 के अंत में संपन्न हुए विधानसभा चुनाव में बस्तर लोकसभा क्षेत्र में भाजपा की स्थिति डावांडोल हो गई है. बस्तर लोकसभा सीट के तहत आने वाली आठ विधानसभा सीटों में से पांच सीटों – कोंडागांव, बस्तर, चित्रकोट, दंतेवाड़ा और कोंटा में कांग्रेस का कब्जा है. जबकि केवल तीन सीटें, नारायणपुर, जगदलपुर और बीजापुर में भाजपा जीत पाई है. इतना ही नहीं बस्तर लोकसभा के तहत आने वाली आठों विधानसभा सीटों के कुल वोट जोड़ें तो कांग्रेस को करीब नौ हजार मतों की बढ़त भी मिली है. यही दो बातें कांग्रेस का उत्साह बढ़ा रही हैं. लेकिन जरूरत से ज्यादा उत्साहित कांग्रेस इस तथ्य की अनदेखी कर रही है कि बस्तर सीट पर उसे केवल भाजपा से ही नहीं, बल्कि ‘आप’ और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) से भी चुनौती मिल रही है. ‘आप’ ने इस सीट से सोनी सोरी को मैदान में उतारा है. वहीं सीपीआई की विमला सोरी भी मैदान में हैं. विमला रिश्ते में सोनी सोरी की बहन लगती हैं. ये दोनों उम्मीदवार भाजपा के किले में कम, कांग्रेस के गढ़ में ज्यादा सेंध लगाएंगे. कांग्रेस ने यहां से झीरम घाटी नक्सल हमले में मारे गए महेंद्र कर्मा के बेटे दीपक कर्मा पर भरोसा जताया है.

दूसरे चरण यानि 17 अप्रैल को महासमुंद और कांकेर लोकसभा सीट पर मतदान होना है. इन दोनों सीटों को लेकर भी कांग्रेस में गजब का आत्मविश्वास है. महासमुंद में पार्टी के कई वरिष्ठ नेताओं के बगावती तेवर में आने के बाद भी कांग्रेस यहां से निश्चिंत है. इस सीट से पार्टी ने पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी को उम्मीदवार बनाया है. लेकिन 2009 में इसी सीट से कांग्रेस की टिकट में चुनाव लड़कर हार चुके मोतीलाल साहू ने नाराज होकर पार्टी छोड़ दी है. साहू कांग्रेस के पिछड़ा वर्ग प्रकोष्ठ के प्रदेश अध्यक्ष भी थे. वहीं दिवंगत नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री विद्याचरण शुक्ल की बेटी प्रतिभा पांडे भी महासमुंद से टिकट की दावेदारी कर रही थीं. उनके समर्थक भी पूरी तरह पार्टी के साथ नहीं िदख रहे हैं.

कांकेर लोकसभा सीट की बात करें तो 2009 में यहां से भाजपा उम्मीदवार सोहन पोटाई चुनाव जीते थे. नक्सलियों के शहरी नेटवर्क को मदद करने के आरोपों का सामना कर रहे पोटाई को बैकफुट पर करते हुए भाजपा ने यहां से विक्रम उसेंडी को टिकट दिया है. उसेंडी पूर्व वन मंत्री तो हैं ही साथ ही अंतागढ़ सीट से विधायक भी हैं. कांग्रेस ने यहां से जोगी समर्थक फूलोदेवी नेताम को टिकट दिया है. कांकेर सीट को लेकर कांग्रेस की निश्चिंतता का कारण हाल के विधानसभा चुनाव में उसे मिला जनसमर्थन है. इस लोकसभा सीट के तहत आने वाली 8 में से 6 विधानसभा सीटों को जीतकर कांग्रेस ने भाजपा के सामने कड़ी चुनौती पेश की है. कांग्रेस को कांकेर लोकसभा क्षेत्र की आठ विधानसभा सीटों में उसे 87 हजार वोट की बढ़त भी मिली है. यही कारण है कि उसे ये सीट आसान नजर आ रही है.

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