अवैध खनन का बड़ा घोटाला | Tehelka Hindi

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अवैध खनन का बड़ा घोटाला

यह एक ऐसा घोटाला है जो कि कोयला ब्लाक घोटाले से भी बड़ा नज़र आ रहा है। इसका कारण है दुर्लभ खनिजों की लूट और परमाणु खनिजों जैसे 'लिमोनाइट', 'जि़रकोन', और मोनाज़ाइट' जैसे प्रतिबंधित खनिजों का चीन समेत विभिन्न देशों को निर्यात। फिर भी यह बरसों से चला आ रहा है। 'तहलका' को मिले दस्तावेजों से यह स्पष्ट होता है कि किस तरह परमाणु खनिज जो कि परमाणु ऊर्जा विभाग की निर्धारित सूची में हैं को भी न सिर्फ निकाला जा रहा है बल्कि बिना किसी रोक टोक के चीन जैसे देशों को निर्यात भी किया जा रहा । इसकीजानकारी दे रहे हैं चरणजीत आहुजा

2018-05-01 , Issue 08&09 Volume 10

यह एक घोटला है, कोयला ब्लाक घोटाले से भी कहीं ज़्यादा बड़ा और खतरनाक। इससे देश की खनिज संपदा की सीधी लूट हो रही है। इनमें ’लियोनिट’, ‘टाइटेनियम आकऑक्साइड’ (रंजारिज) तुरसावस (जि़रकोन) और मोनाज़ाइट जैसे खनिज शामिल हैं। मोनाजाइट एक ऐसा खनिज है जिस पर चीन समेत कई देशों में प्रतिबंध है। इसके बावजूद यहां यह पिछले काफी लंबे समय से चल रहा है। ’तहलका’ के पास मौजूद दस्तावेजों से पता चलता है कि परमाणु ताकत में काम आने वाले खनिज भी न केवल गैर कानूनी तरीके से निकाले जा रहे हैं अपितु चीन जैसे देशों को बिना किसी रुकावट के बेचे भी जा रहे हैं।

सरकारें आती जाती रही पर यह लूट लगातार चलती रही है। ’तहलका’ की जांच में पता चला है कि सरकारी अनदेखी और लापरवाही के कारण गैरकानूनी खनन जारी है। इसमें केंद्र व आंध्र प्रदेश के सरकारी विभागों की मिलीभगत भी सामने आती है। इसके अलावा परमाणु ऊर्जा विभाग और केंंद्रीय खनन मंत्रालय भी इसमें शामिल हैं। असल में खनन का यह घोटाला बाकी कई घोटालों से बड़ा है जिसमें नौकरशाही और राजनीति का तालमेल है। लेकिन आज तक यह लोगों की नज़रों से इसलिए छुपा रहा है क्योंकि इसके साथ बड़े-बड़े लोगों के नामों को जोडऩा आसान नहीं था। केंद्र की राय है कि पर्यावरण की इज़ाजत देने की ताकत राज्य सरकारों को दी जाए। पर क्या राज्य सरकारों के पास इतना सब कुछ करने के लिए पूरा साजो-समान है? यह एक बड़ा सवाल है। हम सब जानते हैं कि खनन हमारे पूरे पर्यावरण को तबाह करता है। पर इस मामले में सज़ा का अनुपात बहुत ही कम है। मिसाल के तौर पर 2015-17 में गैर कानूनी खनन के 1,07,609 मामले पूरे देश में दर्ज किए गए लेकिन असली एफआईआर 6,033 मामलों में ही दर्ज हुई। देश की सर्वोच्च अदालत ने अगस्त 2017 में केंद्र सरकार को राष्ट्रीय खनिज नीति में संशोधन करने का निर्देश दिया था। अदालत का कहना था कि मौजूदा नीति केवल कागज़ी है और उसका क्रियान्वयन नहीं होता क्योंकि इसमें कई ताकतवर लोग शामिल होते हैं।

जांच में उन सभी जांच एजेंसियों द्वारा दिया गया ’डाटाÓ शामिल किया गया है जो उन्होंने उनके बारे में दिया है जो समुद्र तल से रेत और परमाणु खनिज गैर कानूनी तरीके से निकालते हैं पर बिना किसी सज़ा के खौफ से।

इस घोटाले के बारे में एक व्यक्ति ने प्रधानमंत्री को एक पत्र लिखा है। इसकी पूरी जानकारी ’तहलकाÓ के पास है। उसके अनुसार अवैध खनन और निर्यात का काम खुले रूप से सरकारी कानूनों और नियमों को धता बताते हुए चलता रहा है। भारतीय खनन ब्यूरो (आईबीएम) और परमाणु खनिज निदेशालय (एएमडी) खनन की योजनाओं को मंजूरी देते हैं। आईबीएस केंद्रीय खनन मंत्रालय के तहत आता है और एएमडी परमाणु ऊर्जा विभाग के अंतर्गत और ये दोनों ही विभाग सीधे प्रधानमंत्री के तहत हैं। राज्य सरकारों के यातायात के परमिटों को इक_ा कर उनकी भी जांच की गई। इन दस्तावेजों के बिना खनन और निर्यात नहीं किया जा सकता। कस्टम विभाग के पास उपलब्ध आंकड़ों को देखने से पता चलता है कि अवैध खनन किस हद तक हो रहा है।

श्रीकाकुलम (आंध्र प्रदेश) का समुद्र तटीय रेत परमाणु खनिजों के साथ ’इल्मेनाइटÓ, ‘रूटीलÓ, ल्यूकॉक्सीन, जिरकोन और ’मोनाज़ाइटÓ जैसे खनिजों का मिश्रण है। इनमें ’मोनाज़ाइटÓ एक ऐसा खनिज है जो परमाणु ईधन ’थोरियमÓ बनाने के काम आता है। ’मोनाज़ाइटÓ के निर्यात और निजी संस्थानों को बेचने पर पूरी रोक है पर हमारी राष्ट्रीय संपदा कुछ अनैतिक कंपनियों और व्यक्तियों द्वारा निर्यात की जा रही है।

राज्यसभा सदस्य रेणुका चौधरी जो ’पब्लिक अकाउंटस कमेटी (पीएसी)Ó की सदस्य भी थीं उन्होंने यह मुद्दा 14 मार्च 2016 को सदन में उठाया था। असल में पीएसी के सदस्य भाजपा के सांसद राजू ने पाया था कि ’ट्राइमेक्सÓ ग्रुप न केवल अवैध खनन में लगा है बल्कि ’मोनाज़ाइटÓ का अवैध निर्यात भी कर रहा है।

प्रवर्तन निदेशालय, सीबीआई, केंद्रीय खान मंत्रालय, पर्यावरण मंत्रालय और आंध्रप्रदेश के सतर्कता व प्रवर्तन विभाग ने इस मामले में कुछ लोगों के नाम उजागर किए थे। इनमें आंध्रप्रदेश का एक राजनेता राजेंद्र प्रसाद कोनेरू और उसके दो बेटों मधु कोनेरू और प्रदीप कोनेरू और ’ट्राइमेक्स सेंडस के नाम प्रमुख थे। इन्हें अवैध खनन में अभियुक्त भी बनाया गया। ’तहलकाÓ ने ट्राइमेक्स ग्रुप के चेन्नई और दुबई के पतों पर प्रश्नों की सूची दो अप्रैल 2018 को भेजी और फिर 13 अप्रैल 2018 को उन्हें स्मरण पत्र भी भेजे।

अंत में कंपनी ने 22 अप्रैल 2018 को ग्रे मैटर कम्युनिकेशनस एंड कंस्लटिंग प्राईवेट लिमिटेड के द्वारा अपना जवाब भेजा। उन्होंने सभी आरोपों का खंडन किया उनका कहना है कि उन्होंने कभी भी मोनाजाइट को न तो निर्यात किया है और न ही किसी निजी कंपनी, व्यक्ति या चीन को बेचा है। उनके अनुसार परमाणु ऊर्जा विभाग के तहत परमाणु ऊर्जा नियामक बोर्ड (एइआरबी) एक वैधानिक संस्था है जो सभी तरह की रेडियो एक्टिव सामग्री के बारे में दिशा निर्देश जारी करती रहती है और उस पर पूरा नियंत्रण रखती है। कंपनी ने परमाणु ऊर्जा (रेडिएशन प्रोटेकशन) नियम 2004 के तहत एइआरबी से लाइसेंस लिया है। कंपनी इस नियामक संस्था के सभी निर्देशों का पालन करती है और समय-समय पर काम का निरीक्षण भी किया जाता है लेकिन आज तक किसी भी निरीक्षण में कंपनी द्वारा कोई उल्लंघन किए जाने की बात नहीं आई है। ट्राईमैक्स जिसके दफ्तर दुबई और चैन्नई में हैं, ने तहलका को चेताया कि उनके स्पष्टीकरण के विरुद्ध प्रत्यक्ष  या परोक्ष कोई खबर न छापें। यदि  ऐसा होता है तो यह मानहानि और अदालत  के आदेश के खिलाफ  होगा।

यहां यह जानना भी उचित होगा कि परमाणु ऊर्जा विभाग ने भी यह स्पष्ट कर दिया है कि ’बीचÓ खनिजों में जो मात्रा ’मोनाज़ाइटÓ की मिलती है वह कम है और उसे निकालना काफी मंहगा पड़ता है। कंपनी का कहना है कि परमाणु ऊर्जा विभाग ने यह भी स्पष्ट किया है कि ’मोनाज़ाइटÓ ऐसा पदार्थ नहीं है जिसे कहीं भी बेचा जा सकता है और आज की परमाणु तकनालोजी में यह इस्तेमाल भी नहीं किया जा सकता।

इन गैरकानूनी कृत्यों का पता उस समय लगा जब 2004 में खान और भूगोल विभाग के सहायक निदेशक ने ट्राइमेक्स की ’लीजÓ को राजस्व व वन विभाग की मंजूरी के बिना लागू कर दिया। जीओ एमएस नंबर31 तिथि 06 फरवरी 2004 के मुताबिक इन दोनों विभागों की मंजूरी इस ’लीजÓ को लागू करने में अनिवार्य थी। यह पता चला कि ट्राइमेक्स ने 1.3 और 2.0 घन मीटर के ’लोडरÓ इस्तेमाल किए और खुदाई के लिए0.9 और 1.5 घन मीटर के उपकरण प्रयोग किए और साथ ही दिन-रात खुदाई की। उसने इसके लिए फ्लड लाइट्स का भी इस्तेमाल किया जो अवैध है और सीआरज़ेड के आदेश जे-19011/11/2003-1। -111 का उल्लंघन है। हालांकि यह पर्यावरण और वन विभाग के निर्देशों का भी उललंघन था पर सरकार ने इस मामले में आज तक कोई कार्रवाई नहीं की है।

दुबई स्थित इस कंपनी ने इन आरोपों का भी खंडन किया है। उन्होंने कहा सीआरजेड की मंजूरी के मामले में कोई किसी तरह का कोई उल्लंघन नहीं हुआ है। कंपनी का कहना है कि यह आरोप मानहानि की श्रेणी में आता है और अदालत ने मीडिया को मानहानि वाले वक्तव्य दिखाने से रोक दिया है।

इस मामले में राज्य सरकार के अधिकारियों ने भी ऐसा ही किया और सालों तक अवैध खनन चलने दिया। छह मार्च 2013 को भारतीय ब्यूरो ऑफ माइंस, वन, राजस्व और निदेशक खनन और भूगर्भशास्त्र ने एक विस्तृत रिपोर्ट सरकार के प्रधान सचिव (उद्योग व वाणिज्य) को भेजी जिसमें बताया गया कि ’ट्राइमेक्स इंडस्ट्रीज ने 387.72 एकड़ ज़मीन पर अवैध खनन किया है। 20 सितंबर 2013 की अपनी रिपोर्ट में आंध्र प्रदेश सरकार के खनन व भूगर्भशास्त्र के निदेशक ने कंपनी के खिलाफ कार्रवाई करने को कहा था, पर आज तक इस पर कोई आदेश पारित नहीं किया गया।

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(Published in Tehelkahindi Magazine, Volume 10 Issue 08&09, Dated 1 May 2018)

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