अलवर बलात्कार कांड ने उठाए कई सवाल

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अलवर जिले के थानागाजी इलाके में पति को बंधक बनाकर पत्नी से सामूहिक बलात्कार की घटना निश्चित रूप से शर्मनाक थी। सरकार और पुलिस प्र्रशासन के स्त्री सुरक्षा के दावों के लिए भी इसलिए बड़ा सवाल है कि इसने प्रदेश की महिलाओं को बुरी तरह दहला दिया है। अगर आप मानते हैं कि,’इस कहर के पीछे गहलोत सरकार के सुरक्षा बंदोबस्त की कोताही थी या चुनावी माहौल बिगडऩे के अंदेशे में 26 अप्रैल को हुई घटना केा छिपाए रखने की मंशा थी तो इन तथ्यों पर गौर करना होगा। पीडि़ता के पति का कहना था कि,’घटना से हम पति-पत्नी इस कदर डरे-सहमे हुए थे कि,बदनामी के कारण किसी को नहीं बताया । इसके बाद मैं जयपुर चला गया। पति का कहना था,’घटना को अंजाम देने के बाद भी दरिन्दे बेखौफ रहे । उन्होंने मुझे फोन कर इस धमकी के साथ दस हजार रुपए मांगे कि,’नहीं देने पर इस निर्लज्जता का वीडियो वायरल कर दिया जाएगा…।’’ अलवर के पुलिस अधीक्षक राजीव पचार के पास भी पीडि़त दंपत्ति दो मई को तब पहुंचे जब, वारदात का वीडियो वायरल हो चुका था। इस स्थिति ने उन्हें बदहवास कर दिया । इस मामले में गृह विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव राजीव स्वरूप का कहना है कि, ‘पीडि़त दंपत्ति के बताए अनुसार,’आरोपी एक बार उनसेे रकम ऐंठ चुके थे । खून उनके मुंह लग चुका था, इसलिए उन्होंने फिर पैसों का तकाजा किया। इस बार पीडित उनकी मांग पूरी नहीं कर सका। नतीजतन आरोपियों ने वीडियो वायरल कर दिया। यानी वारदात का खुलासा पीडि़त ने नौ दिन बाद दो मई को किया । एसपी राजीव पचार के अनुसार इस संबंध में पति-पत्नी दोनों मेरे पास दो मई को आए थे। मैंने उसी समय रिपोर्ट दर्ज करने के आदेश दे दिए। एक टीम थानागाजी स्तर पर और पुलिस की एक टीम अलवर स्तर पर गठित कर दी। मामला थानेदार ने क्यों दर्ज नहीं किया ? थाना प्रभारी सरदार सिंह का कहना था कि,’मामला एससी (दलित) महिला का था। इसलिए इस पर कार्रवाई के लिए उच्च अधिकारी ही अधिकृत थे ।

यह घिनौनी वारदात थानागाजी कस्बे के गांव लालबाड़ी और तालवृक्ष के रास्ते में 26 अपै्रल को दोपहर तीन बजे उस वक्त हुई जब पीडि़ता अपने पति के साथ बाइक पर दुगार चैगान वाले रास्ते पर थी। वारदात करने वाले पांच गुर्जर युवक थे। बाइक पर सवार युवकों ने पति-पत्नी के आगे बाइक लगाकर उन्हें रोक दिया। बाद में टीलों के पीछे ले जाकर वारदात की । इस मामले में चुनावी राजनीति ने जिस कदर हलचल मचाई, उससे कहीं ज़्यादा दलित उत्पीडऩ की लहरें भी उछली । लेकिन इस हकीकत को किसी ने नहीं टटोला कि,’इस क्षेत्र में यह कोई पहली वारदात नहीं थी, बल्कि लंबी फेहरिश्त में ना जाने कौन से नंबर पर जाकर यह वारदात टिकी होगी ? कहा जाता है कि यह इलाका गुर्जरों के उत्पात और उन्माद से थर्राया हुआ है । गुर्जर बिरदारी के सिरफिरों ने इस हद तक आतंक फैला रखा है कि लोग उनके खिलाफ जुबान खोलने से भी डरते हैं । कहा तो यह भी जाता है कि विधान सभा चुनावों के दौरान इस इलाके के लोग महज इस ख्याल तक से थर्राए हुए थे कि अगर गुर्जर नेता सचिन पायलट मुख्यमंत्री बन गए तो इनका हौसला उनके लिए तबाही ला सकता है । गहलोत सरकार तो महज 6 माह से ही अस्तित्व में आई है, जिसमें आम चुनावों के मद्देनजर सरकार को काम करने का कितना मौका मिला ? कहने की जरूरत नहीं है। इस घटना को लेकर पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे की प्रतिक्रिया चैंकाती है कि ऐसे जघन्य अपराध कांग्रेस सरकार के महिला और बेटियों को सुरक्षित माहौल देने की पोल खोल रहे हैं। जबकि राजस्थान के थानों में दर्ज दुष्कर्म और महिला अपराधों के आंकड़ों को खंगाला जाए तो राजे के पास इस बात का क्या जवाब है कि,’वर्ष 2018 में चुनावों से पहले तक प्रदेश में चार हजार 335 दुष्कर्म के केस दर्ज हुए यानी 12 वारदातें रोज़? और अलवर में तो महिलाएं सबसे ज्यादा असुरक्षित थी।

मुख्यमंत्री गहलोत ने इस मामले के मद्देनजर जो सख्त कदम उठाते हुए एक नई व्यवस्था कायम की कि,’थाने में अगर एफआईआर दर्ज नहीं होती है तो थाना प्रभारी पर तो कार्रवाई होगी ही लेकिन तब एफआईआर पुलिस अधीक्षक दर्ज करेंगे। गहलोत की घोषणा के मुताबिक महिला उत्पीडऩ सरीखे मामलों की जांच के लिए हर जिले में सर्किल आफिसर स्तर का अलग अधिकारी तैनात होगा । यह अधिकारी सिर्फ महिलााओं के अपहरण, दुष्कर्म सरीखे अन्य मामलों की मानीटरिंग करेगा। उन्होंने कहा कि पिछली सरकार ने ऐसे मामलों को संजीदगी से लिया ही नहीं । बहरहाल पुलिस ने पाचों आरोपियों को पकड़ लिया है और मामला जेरे तफ्तीश है । लेकिन चुनावी माहौल में इस आग को हवा देने में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी पीछे नहीं रहे। उन्होने बसपा सुप्रीमों मायावती को उकसाने की कोशिश की कि उन्हें दलितों से प्यार है तो गहलोत सरकार से समर्थन वापस क्यों नहीं ले लेती ? मायावती ने पलटवार करते हुए कहा, ‘पहले मोदी भाजपा शासित राज्यों में दलित अत्याचारों की नैतिक जिम्मेदारी लेकर इस्तीफा दें ? क्या मोदी उत्तर प्रदेश में दलितों को नहीं चाहते ? बहरहाल बताते चलें कि गहलोत सरकार बसपा के समर्थन से नहीं चल रही बल्कि पूर्ण बहुमत से चल रही है ।