अलगाव नहीं, मेल चाहिए पंजाब को

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बचपन में मैंने एक लोक गीत सुना था। इसमें वे गिद्धा नाचते हुए गाती थीं, ‘नचां मैं पटियाला, मेरी धमक जालंधर पैंदी।’ यानी नाचती तो मैं पटियाला में हूं लेकिन मेरे नाचने की गूंज जालंधर तक सुनाई देती है।

लेकिन अब समय के साथ गाने में बदलाव है। पिछले साल ही मैंने सुना, ‘मोगे नाचन जागो/मेरी पैंदी धमक शिकागो विच’ (मैं मोगा की जागो में नाच रही हूं। लेकिन मेरी गूंज शिकागो में भी गूंजती है)

यहां यह एकदम उलटा भी हो सकता है। यानी पंजाबी लड़कियां शिकागो में नाच रही हों और उनके नाचने की गंूज मोगा में सुनाई दे रही हो। आज दुनिया भर में तकरीबन डेढ़ सौ देशों में पंजाबी बसे हैं। वे जहां भी बसते हैं उनके दिल में पंजाब धड़कता है। आधुनिक पंजाबी कविता के जबर्दस्त हस्ताक्षर हैं प्रोफेसर पूरन सिंह। उन्होंने सही कहा कि पंजाब बड़ी-बड़ी बैठकों और बड़े विभाजनों की भूमि है। सीमाई सूबा होने के नाते ढेरों जातियों और संस्कृतियों का आज केंद्र है।

महान सूफी-संतों का यह अनोखा पवित्र मिलन स्थल रहा है जहां अलग-अलग स्थानों, संप्रदायों और जातियों के लोग आए। इनमें मुस्लिम सूफी थे बाबा फरीद जिनके माता-पिता काबुल से आकर बसे थे। बिट्ठल देव के शिष्य बाबा नामदेव, संत कबीर और संत रविदास वाराणसी से यहां आए। कृष्ण भगत जयदेव बंगाल से, राजस्थान से धन्ना भगत और न जाने कितने और। ये सब अलग-अलग क्षेत्रों, धर्मों और जातियों के लोग थे। ये सिख गुरूओं के साथ बैठ कर गाते थे। एक तरह का यह दैनिक आरकेस्ट्रा था। एक भव्य अंतर्जातीय महोत्सव जो दिन-रात खुले आसमान के नीचे रात दिन चलता रहता था। गुरू नानक के ग्रहों के राष्ट्रीय गीत में आता है : गगन में थाल नवी चांद दीपक बने/तारिका मंडल जनक मोती/धूप मलियानों पवन चंवरों करें/सगल बनराई फूलंत ज्योति।

यह बैठक सिर्फ जातियों व धर्मों की नहीं थी बल्कि यह नक्षत्र और रोशनी की भी थी।

सबसे बड़ा अलगाव हुआ 1947 में। सीरिल जॉन रेडक्लिफ ने नक्शे पर एक लाइन खींची जो कश्मीर की सीमाओं से शुरू हुई और रावी के बीच से होती हुई इसने अमृतसर से लाहौर को अलग किया। न जाने कितने गांवों को उनके खेतों से अलगाया। नदियों को नहरों से अलग किया सिखों को उनके पवित्र स्थानों से अलग किया और बहावलपुर की सीमा पर जाकर ठहर गईं।

इस लाइन से न केवल ज़मीन का विभाजन हुआ बल्कि लोगों के दिल भी बंट गए। इस ज़मीन की बेटियों के शरीर भी बंट गए। पांच नदियों का पानी भी 1947 मेें पंजाबियों की विरासत पर लगे धब्बे नहीं धो सका। खून की प्यासी वह लाइन कुछ ही दिनों में साठ लाख पंजाबियों को निगल गई। तकरीबन एक करोड़ बीस लाख पंजाबी अपने घर खो बैठे और उन्हें सीमा पार करनी पड़ी। दस लाख बेटियां अपने परिवारों से बिछड़ गईं।

और फिर आया 1984 का साल।

मातम, हिंसा, खौफ, बेबसी ते अन्याय

एह ने आजकल मेरे पंजा दरियावां दे नाम।

मुझे याद आती है डा. नूर की प्रेम कविता: तेथो विछड़ के/मैं विछड़ता ही चला गया। (तुमसे अलग होकर। मैं बार बार बिछड़ता ही गया।)

यह छोटी सी प्रेम कविता पंजाब के संदर्भ मेें भी बड़ी महत्वपूर्ण है। इसलिए नहीं कि इसके हज़ारों बेटे और बेटियां विदेशी ज़मीनों को जा रहे हैं बल्कि इसलिए क्योंकि हमारी कीमत के रखवाले भले वे धर्म, राजनीति और शिक्षा से जुड़े रहे हों, हमारे साथ उन्होंने नाइंसाफी की। हम तथाकथित बुद्धिजीवी आज पलायन की राहें तलाश रहे हैं पंछी तान उड़ गए ने। रु ख वी सलाहान करन/चलो इत्थो चलिए(चिडिय़ां पहले ही उड़ गई हैं। अब तो पेड़ भी बात कर रहे हैं। चलो हम भी चलें कहीं और)

फिर एक और बड़ा अलगाव उन स्कूलों में हैं जो उस ज़मीन पर बने हैं जहां होता है हमारी भाषा का तिरस्कार। जान-बूझ कर क्योंकि सज़ा होनी नहीं। नौजवान बेटे-बेटियों को हतोत्साहित किया जाता है। उन पर जुर्माना लगा दिया जाता है यदि वे अपनी भाषा में कुछ भी बोलते हैं। यह रवैया बढ़ाता है चिंता, चुप्पी और हमारे बच्चों में हीन भावना। मैं अंग्रेज़ी सीखने के खिलाफ नहीं हूं लेकिन मातृभाषा के अलावा भाषा को सीखने का सही तरीका बताया है भाषाविदों ने मनोवैज्ञानिकों और शिक्षाशास्त्रियों ने। हमें उसी वैज्ञानिक तरीके से मातृभाषा के जरिए सीखनी चाहिए वह भाषा। इससे हमारे बच्चों में सृजनशीलता बढ़ेगी, आत्मविश्वास बढ़ेगा।

सरकार अपने ही स्कूलों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने से गुरेज करती है जिससे गली-मोहल्ले में खुलते जा रहे हैं निजी स्कूल। हाईकोर्ट के न्यायाधीश सुधीर अग्रवाल ने अपने एक आदेश में उत्तरप्रदेश के मुख्य सचिव को 18 अगस्त 2015 को कहा था कि वे एक आदेश निकालें जिसके तहत सभी सरकारी अधिकारी, लोकप्रतिनिधि और न्यायाधिकरण के लोग अपने बच्चों की पढ़ाई सिर्फ सरकारी स्कूलों में कराएं।

इसी साल हम लोग गुरू नानक देव जी की 550वीं जन्मतिथि मना रहे हैं: ‘नीचन अंदर नीच जात/नीची हू अट्ट नीच/ नानक तीन के संग साथ/वाड्या सियो क्या रीस/जित्थे नीच समालियान/तित्थे नाठर तेरी बख्शीश’(नानक नीची जाति से भी और नीच लोगों का साथ चाहता है। वह अमीर लोगों से मुकाबले की कोशिश क्यों करे। जहां लोगों की चिंता होती है। वहीं ईश्वर के आशीर्वाद की बारिश होती है।)

पंजाब जो बड़े-बड़े मिलन और अलगाव की भूमि रही है उसने ढेरों बड़े-बड़े विभाजन देखे हैं। आज इसे फिर एक बड़े मिलन की ज़रूरत है। ‘होवन इक दिन/राग, शायरी, हुस्न, मोहब्बत अते न्याय/मेरे पंज दरियांवां दे नाम’ (हमें उम्मीद करनी चाहिए, प्रार्थना करनी चाहिए और तैयार रहना चाहिए संगीत, कविता, सौदर्य, प्रेम और न्याय को ही अपनी पांच नदियों के नाम करने को)

लेखक पंजाब कला परिषद के अध्यक्ष हैं