अलगाव के आगे

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एक नेता हैं भरत मंडल. सहज और सरल स्वभाव के. धनिक लाल मंडल के बेटे हैं. धनिक लाल 60 के दशक में बिहार विधानसभा के अध्यक्ष थे. वीपी सिंह के समय दो राज्यों में राज्यपाल भी रहे. भरत पहले जदयू में थे. एक चुनाव में भाग्य आजमा चुके हैं. अब लालू प्रसाद की पार्टी में हैं. हालिया दिनों में उनसे दो मुलाकातें हुईं. पहली मुलाकात में उन्होंने उंगलियों पर अगड़ों-पिछड़ों-अल्पसंख्यकों का गुणा-गणित लगाते हुए लालू प्रसाद के उभार को समझाया. दूसरी बार, जब भाजपा-जदयू में अलगाव हुआ, तब भी उन्होंने कुछ-कुछ इसी तरह से नीतीश की राजनीति के जातीय-सामाजिक समीकरणों के बारे में बताया.

बीच में सिर्फ यह चर्चा छेड़ने पर कि आप जिस अतिपिछड़े वोट को उंगलियों पर गिनकर कभी लालू प्रसाद तो कभी नीतीश की बात करते हैं, उसी समुदाय के नरेंद्र मोदी भी तो हैं, वे मोदी और भाजपा का कखग भी, जाति-वर्ग के संदर्भ में समझाने लगते हैं.

मंडल से हम सिर्फ जाति जैसी चीजों का गुणा-गणित लगाकर कभी फलां पार्टी को उठाने, कभी फलां नेता को गिराने का औचित्य पूछते हैं. यह भी कि क्या उन्हें लगता है कि बिहार में अब भी सिर्फ इसी आधार पर ही भविष्य की राजनीति तय होगी. वे हंसते हुए कहते हैं, ‘ऐसा मैं ही नहीं कहता, बिहार में हर कोई जानता है. यहां की राजनीति आखिर में जाति के खोल में ही समाती है. बाकी विकास वगैरह तो लटके-झटके हैं.’ भरत के साथ ही मौजूद उनके एक साथी नेता कहते हैं, ‘देख नहीं रहे हैं आप, महाराजगंज में एक चुनाव जीतने के बाद लालू प्रसाद यादव कैसे गदगद भाव से मुस्लिम-यादव के बाद उसमें राजपूतों को भी जोड़ने के नए समीकरण बनाने में ऊर्जा लगाये हुए हैं. और भाजपा भी हर रोज जाति-जाति का जाप शुरू कर दी है.’

मंडल और उनके साथी की बातों को हम नकार नहीं पाते. सच है कि भाजपा-जदयू में अलगाव और उसके पहले महाराजगंज उप चुनाव के बाद से बिहार में जाति की राजनीति को साधने के लिए नए-नये किस्म के दांव चले जाने लगे हैं. भाजपा पिछले दिनों पासवान समाज के बैनर तले कबीर प्रकटोत्सव का आयोजन कर चुकी है. 30 जून को झारखंड के आदिवासियों के बड़े राजनीतिक आयोजन संथाल हूल दिवस को बिहार में नए तरीके से मनाने की भी तैयारी है. सुशील मोदी इन दिनों नरेंद्र मोदी को पिछड़ा-अतिपिछड़ा बताने में मगन हैं. लालू प्रसाद सवर्णों से कई बार माफी मांगने के बाद अब अपने फेसबुक स्टेटस पर लिखने या लिखवाने लगे हैं कि याद रखिए पिछड़ों-दलितों के असली मसीहा वे ही हैं. लेकिन इन तमाम कवायदों के बीच नीतीश इस मसले पर लगभग मौन व्रत में हैं. एक बार उन्होंने बीच में इतना भर कहा कि कोई पिछड़ा या अतिपिछड़ा घर में पैदा होने भर से पिछड़ा या अतिपिछड़ा नहीं हो जाता. नीतीश का निशाना सुशील मोदी द्वारा नरेंद्र मोदी के पक्ष में चलाए जा रहे अभियान के जवाब में था.

बिहार में राजनीतिक पंडितों के विश्लेषणों का दौर एकांगी भाव से लेकिन तेज गति से जारी है. न्यू मीडिया पर, अखबारों में, चौक-चौराहों और चौपालों में. रोजाना दुहराया जा रहा है कि नीतीश मजबूरी में मौन साधे हुए हैं. उन्हें पता है कि भाजपा से अलगाव के बाद वे राजनीतिक तौर पर बेहद कमजोर हो गए हैं और जाति की राजनीति में चारों खाने चित हो जाएंगे. क्योंकि वे जिस जाति के नेता हैं उसकी आबादी तीन-चार प्रतिशत है और इसके अलावा कोई ऐसा आधार वोट नहीं, जिसके जरिए वे आगे की लड़ाई लड़ सकने की स्थिति में हों. इसलिए उन्हें चुप रहना ही पड़ेगा.

ऐसा विश्लेषण एकरसता के साथ-साथ बचकानेपन का भाव भी पैदा करता है. कई जानकार मानते हैं कि बिना ठीक से विचार किए ऐसे परिणाम बताए जा रहे हैं जैसे बिहार के किसी सबसे नासमझ नेता का नाम नीतीश हो, जिसने 17 साल के साथ के बाद सिर्फ भावावेश में आकर भाजपा से अलग होने का फैसला कर लिया है. नीतीश और उनकी राजनीति को जरा भी समझने वालों को पता है कि ऐसा संभव ही नहीं है.

कहा यह भी जा रहा है कि करीब आठ साल पहले विकास के नाम पर राजनीति की शुरुआत की जो कोशिश बिहार में हुई थी, नीतीश भी उसे छोड़कर अंत में जाति की परिधि में चले जाएंगे. अगर वे ऐसा नहीं करेंगे तो अपने दो प्रमुख राजनीतिक दुश्मनों, भाजपा और राजद से पार पाने की राह उनके लिए बेहद मुश्किल होगी. मगर समझने वाली बात वह है जो जदयू अध्यक्ष शरद यादव कहते हैं, ‘हमारा मसला विकास ही रहा है और नीतीश विकास की राजनीति के ही प्रतीक हैं, लेकिन जाति है तो राजनीति में उसका इस्तेमाल होगा ही.’

यानी शरद यादव बिना किसी द्वंद्व-दुविधा के अपनी पार्टी की राजनीति की अगली लाइन साफ-साफ बता रहे हैं कि वे अब आगे की राजनीति विकास को केंद्र में रखकर जाति का इस्तेमाल करते हुए साधेंगे. यह बात राष्ट्रीय जनता दल के साथ-साथ भारतीय जनता पार्टी के नेताओं के सामने जबरदस्त चुनौती पेश करेगी. वे अच्छी तरह जानते हैं कि जाति और विकास का कॉकटेल बनाकर राजनीति करने और फिर उसे अपने पक्ष में करने में नीतीश उस्ताद नेता रहे हैं. इसीलिए भाजपा-राजद नेता किसी तरह बार-बार नीतीश को उकसाकर उनसे भी जाति की बात करवाना-कहलवाना चाहते हैं ताकि राजनीति के केंद्र में जाति जैसी चीजें आ जाएं और लड़ाई आसान हो जाए. लेकिन नीतीश फिलहाल इस मसले पर मौन तोड़ने को तैयार ही नहीं.

[box]यही सब है जो नीतीश कुमार को बिहार में विकास पुरुष कहलवाता है और राष्ट्रीय स्तर पर उम्मीदों का नेता.[/box]

बकौल राजनीतिक विश्लेषक महेंद्र सुमन, ‘यह हर कोई जानता है कि नीतीश कुमार ने राजनीति में अपना एजेंडा खुद सेट कर लिया है-बिहारी अस्मिता, गवर्नेंस-विकास और सामाजिक न्याय. वे अब इससे भटककर राजनीति करेंगे ही नहीं बल्कि इसे ही और मजबूती से आगे बढ़ाने की कोशिश करेंगे.’ एशियन डेवलपमेंट रिसर्च इंस्टीट्यूट के सदस्य सचिव व अर्थशास्त्री शैबाल गुप्ता कहते हैं, ‘नीतीश कुमार ने बिहार में गवर्नेंस और बिहारी उपराष्ट्रीयता के मसले को मजबूती से एक स्थान दिलाया है और बिहार के पिछड़ेपन को राष्ट्रीय स्तर पर एक मसला बनाया है. अब बिहार की राजनीति इसी के इर्द-गिर्द चलेगी क्योंकि यह एक ऐसा मसला है जिसे कोई राजनीतिक दल नकार नहीं सकता.’

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