‘अराजक स्वतंत्रता के उपभोग से उपजे चित्र’

0
215
hasen
मकबूल फिदा हुसैन के लिए तथाकथित विवादित चित्र में सीता को हनुमान की पूंछ के बजाय कंधों पर बिठाने की अलग मुश्किलें थीं.

बहरहाल, हुसैन के लिए सीता के उस तथाकथित विवादित चित्र के अभ्यांतर में हनुमान की पूंछ रैखिकता के वितान को रचने में एक सहज आश्रय थी. उन्होंने उसे लंबा करते हुए उसके छोर पर सीता का चित्र बना दिया. कारण यह था कि चित्र में सीता को हनुमान के कंधों पर बिठाने की भी कुछ मुश्किलें थीं. मसलन, यदि वे सीता को कंधे पर अलांग-फलांग बिठाते तब वस्त्र रहित बनाई गई सीता की जांघों पर हनुमान के हाथ होते, तब तो राजनीतिक हिंदुत्व में लंका से भी बड़ा अग्निकांड हो जाता. तो कुल मिलाकर कहना यही है कि ये रेखांकन अलौकिकता को लौकिक युक्ति से उकेरने में हुई त्रुटि से ज्यादा ‘पवित्र में विद्रोह’ का अभीष्ट प्रकट करने का लांछन बन गए. इसके साथ हुआ यह भी कि अबाधित स्वतंत्रता की उपलब्धता ने एक बड़े कलाकार को अपने सृजनकर्म की अंतर्निहित प्रश्नात्मकता पर एकाग्र ही नहीं होने दिया. उन्हें शायद स्वप्न में भी यह प्रतिप्रश्न नहीं आया होगा कि पवित्रता से घिरे मिथकीय चरित्र का रेखांकन परंपरागत चित्रण से अलग और अराजक ढंग से करने पर कुछ प्रश्न भी खड़े हो सकते हैं. फिर उन दिनों सेक्स को पारदर्शी बनाने की कोशिश में तर्कमूलक भाववाद का सहारा लेते हुए, एक मॉडर्न आचार्य संभोग से समाधि की ओर यात्रा पर ले जा रहा था. इसी के चलते, दैहिकता के गोपन के विरुद्ध सामान्य साहसिकता भी दुस्साहस में बदलने के लिए बेचैन हो रही थी.

अत: निर्विवाद रूप से इस तरह का रेखांकन किसी को ठेस पहुंचाने के लिए नहीं, सिर्फ स्वतंत्रता का अराजक होने की सीमा तक किया गया असावधान उपभोग भर है. फिर सहज रूप से एक सामान्य कलाप्रेक्षक यह प्रश्न भी उठा सकता है कि क्या पुरा कथाओं या पवित्र और पूज्य के रूप में परंपरागत रूप से चित्रित पात्रों को आधुनिकता का संस्पर्श देने के लिए क्या यह कोई अपरिहार्य रूढ़ि है कि उन्हें वस्त्रहीन ही बनाया जाए. क्या उससे वे देवाकृतियां अतिदैवी हो जाएंगी या उनका अधिकाधिक मनुष्यवत होना प्रमाणित हो सकेगा? क्या वस्त्रहीन चित्रित न किए जाने पर वे समकालीन या आधुनिक कृति बनने से स्थगित हो जाएंगी या वे आधुनिक दृष्टि से बहिष्कृत हो जाएंगी?

husenचूंकि तब उन्हें रचते हुए स्वयं हुसैन को भी इस बात का स्पष्ट विश्वास था कि उनके नए तथा आधुनिक रचनात्मक प्रयास को राम मनोहर लोहिया जैसा देश का प्रखरतम राजनैतिक बुद्धिजीवी देखने वाला है या कि आक्टोवियाे पाज जैसा विश्वस्तरीय मैक्सिकन कवि देखने वाला है, उनका बौद्धिक समर्थन मिलने वाला है. शायद इसीलिए उन्होंने सामान्य दृष्टि वाले कला रसिक की इरादतन, निर्भयता के साथ अवहेलना की, जो कि निश्चय ही उत्कृष्ट कला के लिए नितांत जरूरी भी होती है. लेकिन मिथकीयता के चित्रण में अतिरिक्त छूट लेने के बारे में आशंकित होकर किसी ईमानदार संदेह के साथ देखा ही नहीं. क्योंकि हिंदू धर्म में देवी-देवताओं की देहाकृति का कोई प्रतिमानीकरण नहीं है. लोक में तो बिना आंख-नाक का एक गोल पत्थर, सिंदूर से पुतने के पश्चात, गणपति, हनुमान या भैरव हो सकता है और आपादमस्तक, कलात्मकता के साथ उत्कीर्ण देवमूर्ति के समकक्ष ही उसकी प्रतिष्ठा होगी. कलात्मकता का अभाव उसके देवत्व में कोई कमी नहीं पैदा करता. दिलचस्प बात है कि चकमक पत्थर, वहां शीतला माता है, वहां कछुआ, सांप, सुअर जैसे डरावने देवता भी हैं और कृष्ण या कामदेव जैसे अत्यंत सुंदर भी. वहां पवित्र में विद्रोह की वैधता प्राप्त है. पंचकन्याएं कुंवारेपन में गर्भवती हो सकती हैं तथा यमी अपने भाई सूर्यपुत्र यम के समक्ष संसर्ग का प्रस्ताव भी रख सकती है. बहरहाल, ऐसे सारे आख्यान साहित्य या कला के सर्जक को खुलकर कर सकने वाले ध्वंस की प्रेरणा के समान लगते हैं. वह संशयमुक्त रहता है कि उसके पास निर्विघ्न स्वतंत्रता है. हुसैन ने इसका बेधड़क होकर उपभोग किया. उन्हें लगा कि एकेश्वरवादियों की सी कट्टरता से यहां भला काहे की मुठभेड़ होनी है, लेकिन उन्हें यह कहां पता था कि आर्थिक उदारता के आगमन के साथ ही सांस्कृतिक उदारता का प्रस्थान शुरू हो जाएगा.

एक सावधान सर्जक को यह नहीं भूलना चाहिए कि ये तमाम अंतर्विरोधी चीजें शास्त्र या पुराकथाओं से उठकर जब सामाजिक जीवन के अतिपरिचय की परिधि में प्रवेश करती हैं तो वे लोक के अनुरूप ही अपनी वैधता का प्रवेश पत्र प्राप्त करती हैं. मसलन ब्रह्मा ने वाणी (सरस्वती) को जन्म दिया और उस प्रलयशून्यता में उस वाणी को सुनने या ग्रहण करने वाला कोई था ही नहीं. अत: उसे पैदा करने के बाद ब्रह्मा ने ही उसे ग्रहण किया. लेकिन सृष्टि कथा में लीला भाव की रूपकात्मकता अर्जित करते हुए वह पिता ही द्वारा पुत्री को भोगने का रूपक बन जाता है. लेकिन क्या आधुनिक कलायुक्ति से सरस्वती को ब्रह्मा से मैथुनरत किया जा सकता है? यह मिथकों का कैसा कलान्वय होगा? इसे इन्सेस्ट (परिवार के भीतर होने वाला व्यभिचार) की तरह मजा लेते हुए पेंट नहीं किया जा सकता. शायद कोई मोटी बुद्धि का व्यक्ति ही ऐसी व्याख्या कर सकता है कि भाइयों, भारतीयों की परंपरा में तो पिता द्वारा पुत्री को भोगना होता रहा है, अत: यह सब स्वीकार्य होना चाहिए. इन्सेस्ट भारतीयता का यथार्थ है. उस पर या उसके चित्रण पर निषेध नहीं खड़े किए जा सकते. फिर हुसैन के पास अपराजेय तर्कों का जखीरा नहीं था न ही वे सारगर्भित लगने वाली वाचालता से तर्कों का कोई स्थापत्य खड़ा करने में समर्थ थे. वैसे जहां भी जीवन है और कल्पना के लिए अवकाश है, कला का प्रवेश वहां वर्जित नहीं किया जा सकता. फिर चाहे किसी को उससे ठेस ही क्यों न लगती हो, कला का तो काम ही ठेस लगाना है. बिना ठेस लगाए वह अपना कोई उद्यम नहीं करती. अत: हुसैन के वे चित्र विवादित ही हुसैन की उस ठेस की वजह से हुए. इसके लिए किसी कलाकार को क्षमा मांगने की भी जरूरत नहीं है लेकिन उसे परिणाम भुगतने के लिए तैयार भी रहना चाहिए. पिकासो महान अराजक माने जाते रहे लेकिन मरियम को लेकर वैसा ‘पवित्र में ध्वंस’ का साहस उन्होंने नहीं किया. हुसैन की उन विवादित कृतियों की श्रेष्ठता सिद्ध करने के लिए हमारी बुद्धिजीवियों की फौज लगातार जो तर्क देती रही वे बहुत हास्यास्पद ही रहे. उस रेखांकन का महान कलात्मकता से कोई रिश्ता नहीं था न है. वे एक बड़े चित्रकार के रोजमर्रा के उत्पाद से अधिक हैसियत ही नहीं रखते.

(यह लेख तहलका के संस्कृति विशेषांक में स्थानाभाव के कारण प्रकाशित नहीं हो सका था)      

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here