अरविंद केजरीवाल: नवाचार का नायक

अगर इन चुनावों में आम आदमी पार्टी को अन्ना हजारे का खुला समर्थन मिल जाता तो क्या तब भी इसकी सीटों की संख्या 28 पर रुक जाती? लोगों का साफ मानना है कि अगर अन्ना हजारे आप के पक्ष में वोट करने की एक अपील भी जारी कर देते तो दिल्ली में पार्टी बहुमत हासिल कर सकती थी. इस संदर्भ में एक तथ्य यह भी है कि चुनाव लड़ने का ऐलान करने के बाद अरविंद केजरीवाल से लेकर आप के दूसरे नेताओं ने भी इस बात को स्वीकार किया था कि अन्ना का साथ न होने से उनकी ताकत कमजोर हुई है. आम आदमी पार्टी के प्रमुख रणनीतिकार योगेंद्र यादव भी मानते हैं कि अन्ना हजारे का समर्थन होने की स्थिति में आप बहुमत हासिल कर सकती थी.

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केजरीवाल के प्रशंसकों की एक बड़ी तादाद एक अन्य कारण से भी है. वह कारण है केजरीवाल का पूर्व आईआईटी छात्र और आईआरएस अधिकारी होना. लोगों से बातचीत करने पर पता चलता है कि वे केजरीवाल को इस कारण से भी पसंद करते हैं कि उन्होंने नौकरी छोड़ दी. एक ऐसी नौकरी जिसमें वे चाहते तो खूब पैसे बना सकते थे. आप के एक समर्थक जो बनारस से दिल्ली पार्टी के प्रचार के लिए आए थे कहते हैं,  ‘आम आदमी के लिए ये बात चौंकाने वाली है कि कोई आदमी जो चाहता तो खूब पैसे छाप सकता था, लेकिन उसने देश सेवा के लिए अपनी मलाईदार नौकरी छोड़ दी. अब ऐसे आदमी पर भरोसा नहीं करेंगे तो किस पर करेंगे. आजकल तो लोग चपरासी तक की नौकरी नहीं छोड़ते.’

केजरीवाल के अब तक के इतिहास ने भी उन्हें लोगों के बीच स्वीकार्य और विश्वसनीय बनाया. सूचना के अधिकार से लेकर बिजली, साफ सफाई, राशन तथा अन्य कई क्षेत्रों में अपनी परिवर्तन नामक संस्था के माध्यम से केजरीवाल के काम ने लोगों को उन पर भरोसा करने का आधार दिया. केजरीवाल दिल्ली के लिए नए नहीं थे. इस शहर में वे पिछले 15  सालों से सक्रियतापूर्वक काम कर रहे थे. दिल्ली की उन तमाम झुग्गियों से केजरीवाल का संबंध सालों पुराना है जहां नेता सिर्फ चुनाव के समय जाया करते हैं. केजरीवाल अपनी नींव बहुत पहले से तैयार कर रहे थे जिस पर बनी इमारत पर वे आज खड़े दिखाई दे रहे हैं. केजरीवाल के साथ जुड़े लोगों में एक बड़ा तबका वह है जो उनके साथ अन्ना आंदोलन के समय से नहीं बल्कि तब से जुड़ा है जब से उन्होंने अपनी सामाजिक सक्रियता की शुरुआत की.

हालांकि जिस तरह से पार्टी पूरे देश में अपना विस्तार करने की बात कर रही है उसके लिए जरूरी है कि उसमें सत्ता और प्रतिनिधित्व का और अधिक विकेंद्रीकरण हो. यानी आने वाले समय में पार्टी सिर्फ केजरीवाल के भरोसे न रहे. दिलीप पड़गांवकर कहते हैं, ‘आप को अपने नेतृत्व का दायरा और अधिक बढ़ाना होगा. अगर पार्टी को पूरे देश में जाना है तो वह सिर्फ केजरीवाल के सहारे नहीं हो सकता.’

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