अनैतिक राह पर चीन, क्या भारत के साथ युद्ध की तैयारी कर रहा है ड्रैगन?

क्या तीसरी बार और पूरी ताक़त से चीन की सत्ता पर बैठने के बाद शी जिनपिंग राज्य विस्तार और एशिया क्षेत्र में अर्थ-व्यवस्था पर एकाधिकार के अपने मंसूबे पूरे करने में जुट गये हैं? भारत सीमा पर उसकी गतिविधियाँ, ताइवान में उकसावे वाली हरकतें, जापान से तनाव और रूस से गहरी दोस्ती जिनपिंग के इरादों की झलक देती हैं। पाकिस्तान के साथ जिनपिंग पींगे बढ़ा चुके हैं, जिसे भारत के लिए अतिरिक्त ख़तरा माना जा सकता है।

कुछ जानकार तो कोरोना को भी चीन के एक हथियार के रूप में देखते हैं। तवांग में एक महीना पहले भारतीय और चीनी सैनिकों के बीच झड़प महज़ एक झड़प तक सीमित नहीं रखी जा सकती। इस तरह की घटनाओं के बाद भारत ने पिछले एक पखबाड़े के भीतर चीन सीमा पर अपनी स्थिति मज़बूत करने के लिए निगरानी को मज़बूत करने के लिए भारतीय वायुसेना की गरुड़ स्पेशल फोर्स को वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर सक्रिय किया है और लड़ाकू विमानों की उड़ानें बढ़ायी हैं। भारत की सुरक्षा एजेंसियों को ये इनपुट मिला था कि चीन भारत को लद्दाख़, नॉर्थ ईस्ट और नेपाल तीन तरफ़ से घेरना चाहता है। चीन की गतिविधियों की गूँज संसद में भी सुनायी दी है और कांग्रेस सहित विपक्ष का आरोप है कि मोदी सरकार चीन के मामले में चीज़ों को साफ़ करने से कतरा रही है।

इन घटनाओं के बाद भारत ने पिछले एक पखवाड़े के भीतर चीन सीमा पर अपनी स्थिति मज़बूत करने के लिए निगरानी पर फोकस किया है और भारतीय वायुसेना की गरुड़ स्पेशल फोर्स को वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर सक्रिय करते हुए लड़ाकू विमानों की उड़ानें बढ़ायी हैं। लेकिन चीन सिर्फ़ सैनिक स्तर पर ही सक्रिय नहीं है। दिसंबर के आख़िर में भारत के पड़ोसी नेपाल में सत्ता परिवर्तन के पीछे भी चीन को देखा जा रहा है। ऐसे में चीन के समर्थन से नेपाल में सरकार बनने के बाद सीमा क्षेत्र में निर्माण में तेज़ी आ सकती है। इससे सीमा सुरक्षा को लेकर भारत की चिन्ता बढ़ सकती है। पाकिस्तान पहले से ही चीन की गोद में बैठा हुआ है और उससे उसकी दोस्ती बरक़रार है।

वहाँ भारत समर्थक प्रधानमंत्री नेपाली कांग्रेस के प्रमुख शेर बहादुर देउबा, जिनकी पार्टी नेपाली कांग्रेस के संसद में सबसे ज़्यादा 89 सदस्य हैं; सत्ता से बाहर हो गये। जबकि चीन समर्थक पुष्प कमल दहल प्रचंड नये प्रधानमंत्री बन गये, जिनकी 275 सदस्यों वाली नेपाली संसद में महज़ 32 सदस्य हैं। नेपाल के सत्ता परिवर्तन में चीन की भूमिका इस तथ्य से ज़ाहिर हो जाती है कि माओवाद सेंट्रल के सुप्रीमो प्रचंड के प्रधानमंत्री बनने से महज़ एक हफ़्ते पहले चीन के एक वरिष्ठ अधिकारी वांग शिन की उनसे और पूर्व प्रधानमंत्री सीपीएन (यूएमएल) के सुप्रीमो के.पी. शर्मा ओली (संसद में 78 सदस्य हैं) से हुई थी। ओली भी चीन के क़रीबी हैं।

भारत की तैयारी

भारत का मानना है कि चीन वास्तविक सीमा रेखा (एलएसी) पर तनाव कम नहीं करना चाहता। लिहाज़ा वहाँ भारतीय सेना रहेगी। इसके अलावा आईटीबीपी अरुणाचल में चौकियों की संख्या भी बढ़ा रही है। चीन के साथ भारत की सीमा विवाद और तनाव पर दिसंबर के आख़िर तक 17 दौर की बातचीत हो चुकी है और इस बात से यही ज़ाहिर होता है कि उसकी नियत तनाव कम करने की बिलकुल नहीं है। वह सीमा पर लगातार तनाव बनाये रखना चाहता। दोनों देशों की एलएसी पर सीमा 3,488 किलोमीटर की है और इन सर्दियों में वहाँ भारतीय सेना की संख्या बढ़ी है।

इस सीमा पर चीन ने क़रीब 1.80 लाख सैनिक जमा कर रखे हैं। यह सैनिक लगातार वहाँ रहते हैं। यही नहीं चीन ने वहाँ हथियारों का भी भारी भरकम जमाबड़ा कर लिया है और पक्के निर्माण (स्ट्रक्चर) भी किये हैं। भारत इसे ख़तरे के रूप में देखता है, लिहाज़ा उसने इसकी टक्कर के बराबर ही तैयारी की है। वहाँ सेना के अलावा आईटीबीपी भी है। सेटेलाइट की तस्वीरें देखने से ज़ाहिर होता है कि सीमा के दोनों और टैंक और दूसरे हथियारों का ज़ख़ीरा जमा किया गया है, जिनमें रॉकेट लॉन्चर, मल्टी ग्रेनेड और अंडर बैरल लॉन्चर शामिल हैं।

भारत ने चीन की गतिविधियों और घुसपैठ पर नज़र रखने के लिए हाई-रिजॉल्यूशन कैमरे स्थापित करने को अपनी योजना में शामिल किया है। यह कैमरे ख़रीदने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है और इन्हें आईटीबीपी ऊँचाई वाली जगहों पर स्थापित करेगी। बता दें आईटीबीपी वहाँ 18,000 फुट की ऊँचाई तक तैनात है। विवादित सीमा पर दोनों देशों के सैनिकों के बीच की दूरी अब काफ़ी कम है और कई जगह तो यह महज़ 500 फीट ही है; लिहाज़ा तनाव को समझा जा सकता है।

चीन करता जा रहा निर्माण

यह सामने आया है कि चीन भारत सीमा पर लगातार निर्माण कर रहा है और यह तैयारियाँ युद्ध की दृष्टि से की गयी दिखती हैं। चीन एलएसी पर सडक़, रेल और एयर कनेक्टिविटी बढ़ा रहा है। साल 2022 की ही बात करें, तो इस्टर्न कमांड के ऑफिसर कमांडिंग-इन-चीफ लेफ्टिनेंट जनरल आरपी कालिटा ने मई में स्वीकार किया था कि चीन की सेना (पीएलए) अरुणाचल से लगी अंतरराष्ट्रीय सीमा (आईबी) के पास निर्माण कर रही है। उनके मुताबिक, चीन एलएसी के पास बड़े स्तर पर इंफ्रास्ट्रक्चरल डेवलपमेंट कर रहा है। इससे से कुछ समय पहले ही चीन ने अप्रैल में हॉट स्प्रिंग इलाक़े में मोबाइल टॉवर स्थापित किये थे। चीन की तरफ़ से अप्रैल में एलएसी से सटे हॉट स्प्रिंग में तीन मोबाइल टॉवर लगाने की जानकारी लद्दाख़ के चुशुल क्षेत्र के पार्षद कोन्चोक स्तान्जिन ने सोशल मीडिया पर साझा कर चौंका दिया था। इससे चीन की तैयारियों की जानकारी देश के सामने आयी। यही नहीं, कोन्चोक ने यह भी दावा किया कि पैंगोंग झील पर चीन ने पुल बना लिया है। कांग्रेस सहित विपक्ष ने इस पर सरकार से सवाल पूछे थे।

नवीनतम जानकारी के मुताबिक, चीन ने अब वहाँ मोबाइल टॉवर बनाने का काम तेज़ कर दिया है, ताकि भारत के ख़िलाफ़ अपने निगरानी तंत्र को मज़बूत कर सके। विपक्ष का यह भी आरोप है कि चीन पहले ही भारत की ज़मीन पर क़ब्ज़ा करने की कोशिश कर रहा है और वह कई जगह उस जगह पर बैठा है, जहाँ वह पहले नहीं था। रिपोट्र्स के मुताबिक, भारत को घेरने की रणनीति के तहत चीन भूटान में भी घुसपैठ कर चुका है और हाल में यह बात सामने आयी है कि उसने वहाँ भारतीय सीमा के नज़दीक 25,000 एकड़ इलाक़े में जबरदस्ती 4 गाँव बसा लिये हैं।

बढ़ रहा तनाव

दिसंबर के शुरू में तवांग में चीनी घुसपैठ से पहले की बात करें, तो साल 2021 में चीन के कोई 180 सैनिकों ने तवांग इलाक़े में घुसपैठ की कोशिश की थी। हालाँकि भारतीय सेना ने उसे मुहँतोड़ जवाब देते हुए इसे निष्फल कर दिया था। यह मामला पेट्रोलिंग के दौरान उपजे सीमा विवाद पर हुआ था। हालाँकि बाद में यह मसला बातचीत से सुलझा लिया गया था। हाल के वर्षों में दोनों देशों के सैनिकों के बीच सबसे बड़ी टक्कर जून 2020 में को लद्दाख़ के गलवान इलाक़े में हुई थी, जिसमें दोनों ही तरफ़ सैनिकों का नुक़सान हुआ था। अब यह भी सवाल है कि अरुणाचल प्रदेश चीन के लिए क्यों महत्त्वपूर्ण है? चीन इस भारतीय राज्य को दक्षिण तिब्बत का हिस्सा बताता रहा है। तिब्बत, भूटान और म्यांमार के साथ अरुणाचल की सीमाएँ लगती हैं और भारतीय सेना इस राज्य को अपनी सुरक्षा दीवार (सेफ्टी वॉल) मानती है। इसी राज्य में तवांग है, जहाँ हाल में भारतीय और चीनी सैनिकों की झड़प हुई थी। इस राज्य का सामरिक महत्त्व है। सन् 1962 के युद्ध के दौरान चीनी सैनिकों ने भारत पर हमले के लिए बुम ला दर्रे को चुना था, जो तवांग के उत्तर में ही स्थित है। तवांग में ही चार सदी पुराना तवांग मठ है, जहाँ 1959 में चीन के क़ब्ज़े के दौरान भागकर वर्तमान दलाई लामा काफ़ी समय तक रुके थे। इस मठ को चीन तिब्बती विद्रोह का केंद्र मानता है। यही नहीं सन् 1683 में छठे दलाई लामा का जन्म भी इसी क्षेत्र में हुआ बताया जाता है। बहुत-से रक्षा विशेषज्ञ मानते हैं कि चीन की नज़र वास्तव में अरुणाचल प्रदेश पर है, ताकि भूटान के पश्चिम में सामरिक रूप से काफ़ी अहम क्षेत्र को जोडऩे की उसकी योजना का रास्ता सुगम हो जाए।

सरकार रक्षात्मक

विपक्ष का आरोप है कि पाकिस्तान के मामले में हर दूसरे दिन ब्यान देने वाली मोदी सरकार चीन के मामले में चुप्पी साध लेती है। संसद के शीतकालीन सत्र में भी कांग्रेस और विपक्ष चीन के मामले में सरकार को घेर चुका है। अरुणाचल प्रदेश में तवांग सेक्टर के यांगत्से क्षेत्र में वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर 9 दिसंबर को चीन के अकारण आक्रमण पर सरकार को बयान देने में चार दिन लग गये। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के संसद में दिये बयान में अभूतपूर्व नरमी दिखी। उनका बयान बहुत संक्षिप्त रखा, जबकि यह मसला काफ़ी गम्भीर था और विपक्ष इस पर पूरी जानकारी की माँग कर रहा था। तराजनाथ ने कहा- ‘पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) के सैनिकों ने तवांग सेक्टर के यांगत्से क्षेत्र में एलएसी को पार करने और यथास्थिति को एक पक्षीय तरीक़े से बदलने की कोशिश की; लेकिन भारतीय सेना की तीन हथियारबंद यूनिटों ने उन्हें बहादुरी से रोका और उन्हें अपने पोस्ट पर वापस होने को विवश कर दिया। न तो कोई भारतीय जवान शहीद हुआ या गम्भीर रूप से घायल हुआ। मैं सदन को यह भी आश्वस्त करता हूँ कि हमारी सेना देश की क्षेत्रीय अखंडता की रक्षा कर सकती है। भारतीय सेना के स्थानीय कमांडिंग ऑफिसर ने 11 दिसंबर को अपने चीनी समकक्ष के साथ फ्लैग मीटिंग की और चीनी पक्ष से इस तरह के कामों से बचने और सीमा के पास शान्ति और धीरज बनाये रखने को कहा। राजनयिक माध्यमों से भी चीनी पक्ष के साथ यह मुद्दा उठाया गया है।’

याद रहे इस झड़प में भारतीय पक्ष के 20 जवान घायल हुए। छ: को इलाज के लिए एयरलिफ्ट कर गुवाहाटी लाया गया। इससे अधिक संख्या में चीनी सैनिक भी घायल हुए। जून, 2020 में पूर्वी लद्दाख़ की गलवान घाटी में हिंसक संघर्ष, जिसमें 20 भारतीय जवान शहीद हो गये थे; के बाद यह पहली बड़ी झड़प थी। इस झड़प के पाँच दिन बाद 14 दिसंबर को मुंबई में जी-20 की जो बैठक हुई, उसमें चीन के प्रतिनिधि हान्वें तांग भी शामिल हुए। उन्होंने इसमें कहा- ‘जी 20 ऐसे महत्त्वपूर्ण मसलों पर विचार के लिए भारत और चीन को बड़ा मंच उपलब्ध करता है, जिनका असर पूरी दुनिया पर पड़ता है।’

यह संयोग है या कुछ और, तवांग में चीन ने तब घुसपैठ करने की कोशिश की, जब जी-20 की बैठक होने वाली थी। याद करें, लद्दाख़ में डेमचोक और चुमार क्षेत्रों में चीनी सेना तब घुसी थी, जब चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 2014 में अहमदाबाद में बैठक कर रहे थे।

मई, 2020 में जब पीएलए के 50,000 सैनिकों ने एलएसी का उल्लंघन कर भारतीय जवानों के साथ संघर्ष किया था और लद्दाख़ के पूर्वी सेक्टर में बड़े क्षेत्र में अतिक्रमण किया था, तब भी सरकार की तरफ़ से जानकारी बहुत डेरी से और अधूरे तरीक़े से आयी थी। विपक्ष ने तब भी मोदी सरकार को घेरा था। यहाँ तक कि भाजपा के सांसद सुब्रमण्यम स्वामी तक ने इस पर सवाल उठाये थे। इस बार भी स्वामी सवाल उठाने में पीछे नहीं हटे।

चीन और अरब के रिश्ते

चीन की भारत ही नहीं अमेरिका के साथ भी तनातनी बनी हुई है। इसकी काट के लिए चीन सऊदी अरब से सम्बन्ध बढ़ा रहा है। सऊदी अरब के प्रिंस मोहम्‍मद बिन सलमान ने हाल में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के अपने देश पहुँचने पर जिस अंदाज़ में स्वागत किया, वह अमेरिका ही नहीं, भारत के लिए भी चिन्ता का सबब हो सकता है। इस दौरे के दौरान सऊदी अरब और चीन के बीच अरबों डॉलर के समझौतों पर भी दस्तख़त हुए। चीन जिनपिंग की इस यात्रा को बहुत सफल इसलिए भी बता रहा है क्योंकि सऊदी अरब ने राष्ट्रपति जिनपिंग के साथ शिखर बैठक के लिए खाड़ी के कई देशों को भी बुलाया। जिनपिंग की इस यात्रा के बाद भारत के लिए पहले से चिन्ता का कारण रहे चाइना-पाकिस्‍तान आर्थिक कॉरिडोर (सीपीईसी) में अब सऊदी अरब भी निवेश कर सकता है। भारत के लिए यह सीपीईसी इसलिए भी गले की फाँस है, क्योंकि यह पाक अधिकृत कश्मीर (पीओके) से होकर गुज़रता है और भारत इसका कड़ा विरोध करता रहा है। हाल में भारत के कुछ वर्गों की तरफ़ से इक्का-दुक्का यह रिपोट्र्स सामने आयी हैं कि सैन्य कार्रवाई के ज़रिये भारत पीओके को अपने साथ मिला सकता है। सेना के एक बड़े अधिकारी ने भी हाल में कहा था कि सेना पीओके में बड़ी कार्रवाई के लिए हमेशा तैयार है, भले उन्होंने सन्दर्भ पीओके में आतंकियों के लॉन्च पेड का दिया हो। हाल में यह रिपोट्र्स भी आयी थीं कि सऊदी अरब अरबों डॉलर का ऑयल रिफाइनरी पाकिस्तान में लगाने की मंशा रखता है। हालाँकि कुछ ठोस अभी सामने नहीं आया है। चीन की तरह वर्तमान में सऊदी अरब की भी अमेरिका से तनातनी बनी हुई है, जिसके मूल में तेल की कीमतें और उत्पादन है। एक रणनीति के तहत हाल के महीनों में चीन ने सऊदी अरब में निवेश और सऊदी अरब से रक्षा सम्बन्धों पर काफ़ी काम किया है। ईरान की चुनौती से निपटने के लिए चीन ने सऊदी अरब को मिसाइलें सप्लाई की हैं। इस तरह चीन मित्रों की एक कतार खड़ी कर रहा है। पाकिस्तान पहले से ही सऊदी अरब और चीन का क़रीबी है। भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल के वर्षों में सऊदी अरब से सम्बन्धों को नया आयाम देने की कोशिश की है और वहाँ की यात्रा भी की है। इसमें काफ़ी हद तक सफलता भी मिली है। हो सकता है भारत के कारण वह सीपीईसी में निवेश न करे। ऐसा होता है, तो यह भारत की सफलता होगी। हालाँकि चीन और पाकिस्तान इसे पसन्द नहीं करते और वह सऊदी अरब के निवेश की भरपूर कोशिश करेंगे। सऊदी अरब भले तेल के मामले में आत्मनिर्भर हो, हथियारों के मामले में वह फिसड्डी है और उसकी 97 फ़ीसदी रक्षा ज़रूरतें बहार के मुल्कों से पूरी होती हैं। चीन इसे अच्छी तरह समझता है; लिहाज़ा वह वहाँ निवेश के ज़रिये आगे बढ़ रहा है।

भारत की परियोजनाएँ