अत्याचार और नहीं अब बेटियों को न्याय कब?

न्याय में देरी के चलते जागी हैवानियत

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तेलंगाना की राजधानी हैदराबाद की पशु चिकित्सक की सामूहिक दुष्कर्म के बाद पेट्रोल छिडक़ जलाकर हत्या करने से देश में उबाल आ गया है। इस वारदात से पूरे देश में गुस्सा है, बलात्कारियों को फाँसी की सज़ा की माँग को लेकर सडक़ से लेकर संसद तक में आक्रोश देखने को मिला।

इस घटना ने सात साल पहले मेडिकल छात्रा के साथ हैवानियत ‘निर्भया कांड’ की याद दिला दी। तब भी सडक़ से लेकर संसद तक कोहराम मचा था। मामले के तूल पकडऩे और युवाओं के ज़ोरदार प्रदर्शन के आगे तब की यूपीए सरकार कड़ा कानून लाने को मजबूर हुई थी। बावजूद इसके बलात्कार के मामलों पर अंकुश नहीं लगाया जा सका है। हैवानियत के वे मामले ही •यादा तूल पकड़ते हैं, जो मीडिया की नज़र में आ रहे हैं; नहीं तो तमाम ऐसे मामले हैं, जिनकी रिपोर्ट तक दर्ज नहीं हो पाती या कहें कि वे थाने तक पहुँच ही नहीं पाते या जाने नहीं दिया जाता। कई मामलों में अप्रोच के सहारे या फिर बड़ी मशक्कत के बाद एफआईआर दर्ज हो पाती है।

देश का मौज़ूदा सिस्टम तमाम खामियों के साथ लोगों को बचाने और फँसाने की जुगत में इस कदर कुशल है कि किसी भी मामले की सच्चाई को उजागर करने में तमाम तौर-तरीकों से दो-चार होता है। इसके बाद वो अपनी बात रख पाता है। ऐसे ही कई मामले आते हैं, जब कोई हाई-प्रोफाइल केस सामने आता है, तब जाकर सिस्टम की पोल खुलती है और लोग पूरे साहस के साथ न्याय की गुहार लगाते हैं, तब उन्हें न्याय मिल पाता है, दिल्ली-एनसीआर में हुए बलात्कार के मामलों की दास्तान कुछ ऐसी ही है कि लोगों ने साहस के साथ बलात्कारियों को सज़ा दिलाने के लिए जद्दोजहद कर एफआईआर दर्ज करवायी है।

राजधानी में जंतर-मंतर से लेकर संसद तक जिस तरीके से आवाज़ उठायी जा रही है, इससे सारा देश यह मान रहा है आज भी हम उस सिस्टम में रहे हैं, जहाँ कानून तो है, पर उसका भय नहीं है। दिल्ली के जंतर-मंतर पर छात्र-छात्राओं और राजघाट पर दिल्ली महिला आयोग की अध्यक्ष स्वाती मालीवाल ने आमरण अनशन कर सरकार से माँग की है कि जब तक बलात्कारियों को छ: महीने के भीतर फाँसी की सज़ा देने का कानून नहीं बन जाता है, तब तक वे अनशन पर बैठी रहेंगी। उनके साथ ही देश-भर के कई संगठनों से जुड़े युवा भी जंतर-मंतर पर तेलंगाना की डॉक्टर के दोषियों को सज़ा दिलाने की माँग को लेकर प्रदर्शन कर रहे हैं।

सारा देश सवाल कर रहा है कि यूँ तो देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ज़ोर-शोर से ‘बेटी बचाओ और बेटी पढ़ाओ’ का नारा बुलंद किये हुए हैं, फिर भी देश में बेटियाँ सुरक्षित नहीं हैं। आिखरकार बेटियों के साथ अमानवीय घटनाएँ क्यों नहीं रुक रही हैं? निर्र्भया काण्ड के बाद देश में ऐसे मामलों से जुड़े कानून में बदलाव के बावजूद पुलिस को संवेदनशील बनाने के प्रयास किये गये और इसके लिए गाइडलाइंस भी बनायी गयी। पुलिस पेट्रोलिंग से एफआईआर दर्ज करने के तौर-तरीके और पारदर्शिता लाने में कई अहम बदलाव किये गये। फिर ऐसी कौन-सी चूक सरकार और प्रशासन से हो रही है कि जब भी कोई ऐसी घटना घटती है, तब हम खुद को वहीं खड़ा पाते हैं, जहाँ दशकों पहले खड़े थे? इतना ज़रूर है कि संवेदनशील समाज के जो जागरूक लोग आवाज़ उठाते हैं, तो उलटे उनको ही पुलिस के क्रोध का शिकार होना पड़ता है। ऐसे कई मामले सामने आये हैं, जिसने आवाज़ उठायी, उसे पुलिसिया कार्रवाई का सामना करना पड़ा।

इसका हालिया उदाहरण हैदराबाद की डॉक्टर से हैवानियत के बाद 30 नवबंर को जब दिल्ली की अनु दुबे नामक युवती ने बलात्कारियों को सज़ा देने की आवाज़ संसद भवन के बाहर उठायी, तो उसके साथ दिल्ली पुलिस ने क्या सलूक किया? वो तो अनु दुबे ही जानती हैं। इस मामले में ‘तहलका’ संवाददाता को अनु दुबे ने बताया कि तब निर्भया थी, आज बेज़ुबानों की डॉक्टर के साथ हैवानियत हुई; अगर ऐसे में दोषियों के िखलाफ कार्रवाई की माँग उन्होंने की, तो क्या गुनाह किया? तीन महिला पुलिसकर्मियों ने मुझे प्रताडऩा दी, पीटा और नाखून गड़ाये। अनु ने बताया कि उसका दिल्ली के राम मनोहर लोहिया अस्पताल में उपचार किया गया। अब भी पुलिस की प्रताडऩा के निशान उसके हाथों में हैं। उसने बताया कि महिलाओं के साथ अन्याय की बात उसे झझकोर देती है। अन्याय कि विरोध में आवाज़ उठाने का साहस उन्हें अपने पिता से आर्मी की सर्विस के दौरान मिला। उनके साथ जंतर-मंतर पर बैठे शिवम वत्स ने बताया कि उनकी माँग बस एक ही है कि ऐसा कानून बने, जो बलात्कारियों को कम समय में सीधे फाँसी की सज़ा दिलाये अन्यथा ऐसी घटनाओं को रोक पाना मुश्किल होगा। उन्होंने बताया कि हम लोग किसी राजनीतिक दल से नहीं हैं, बस अन्याय के विरोध में हैं।

 कानून सिर्फ बने ही न, अमल भी हो

जब 16 दिसंबर, 2012 को द्वारका-मुनिरका रोड पर निर्भया काण्ड हुआ था, तब सारा देश निर्भया के दोषियों को फाँसी की सज़ा की माँग को लेकर सडक़ों पर था। आज उसी तरह का मंज़र जंतर-मंतर पर देखने को मिल रहा है। प्रदर्शनकारी हाथों में काली पट्टी बाँधकर ‘दोषियों को फाँसी दो’, ‘वी वांट जस्टिस’ की माँग को लेकर गगनभेदी नारे लगा रहे हैं। बड़ी तादाद में मौज़ूद छात्राओं और महिलाओं का कहना है कि महिला सुरक्षा को लेकर कड़ा कानून सिर्फ बनना ही नहीं चाहिए, बल्कि उस पर अमल भी किया जाना चाहिए। शहर से लेकर गाँवों तक में महिला पुलिस चौकी बननी चाहिए, ताकि महिलाओं की आवाज़ बिना आनाकानी के सुनी जा सके। अभी तक महिलाओं की शिकायतें दर्ज कराने में खासी मशक्कत करनी होती है, अगर महिला अशिक्षित और सरल स्वभाव की है, तो उसको थाने से दुत्कारकर भगा दिया जाता है।

 भारत में भी फौरन फाँसी हो

सम्पूर्ण मि. की डायरेक्टर व सामाजिक कार्यकर्ता सुजाता गुप्ता का कहना है कि देश में तब तक खुशहाली नहीं आयेगी, जब तक महिलाओं की सुरक्षा को प्राथमिकता न मिले। क्योंकि आज दुनिया के हर विकसित देश में बलात्कारियों के िखलाफ कड़े कानून का प्रावधान है। तमाम देशों में दुष्कर्मियों को फाँसी दी जाती है, पर अभी भारत में ऐसा नहीं हो पा रहा है। इसके कारण आये दिन बलात्कार के मामले सामने आ रहे हैं, जो काफी हैरान करने वाले हैं।

वर्ष 2013 में केन्द्रीय बजट में निर्भया फंड के नाम से 100 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया था; जिसकी राशि अब बढक़र 300 करोड़हो चुकी है। फिर भी सरकार के लचीले रवैया के कारण दोषियों को सज़ा मिलने में वर्षों लग रहे हैं। कुछ गवाहों के मुकरने से तो कुछ धमकी मिलने के कारण बच जाते हैं। दु:खदायी यह है कि दोषियों को फाँसी की सज़ा निर्धारित कर दी जाती है, फिर भी फाँसी देने में देरी की जाती है। असमजंस की स्थिति इसलिए भी पैदा होती है, क्योंकि 16 दिसंबर, 2012 के जब निर्भयाकाण्ड के दोषियों को फाँसी की सज़ा सुनाई जा चुकी है; इसके बावजूद अभी तक उसके दङ्क्षरदों को फाँसी पर नहीं लटकाया गया है।

जंतर-मंतर पर प्रदर्शनकारियों को सम्बोधित करते हुए सुप्रीम कोर्ट की अधिवक्ता सन्ध्या बजाज का कहना है कि बलात्कारियों के विरोध में कानून तो है, पर सज़ा देर से मिलती है और कानून का भय न होने के कारण अपराधियों में डर नहीं है। उन्होंने सरकार से माँग की है कि बलात्कारियों की सज़ा का समय निर्धारित किया जाए, ताकि कम समय में ही दोषियों को फाँसी सज़ा मिले अन्यथा ऐसी घटनाओं को रोक पाना मुश्किल होगा। ऐसे मामले में सभी को दलगत राजनीति से उठकर आगे आना होगा। क्योंकि समाज में जो बलात्कार की घटना बढ़ रही है, वो एक कलंक है। देश और विदेश के कई सर्वे में भी यह सामने आया है कि भारत में आज महिलाएँ सुरक्षित नहीं हैं, जो सबको शर्मसार करते हैं।

दुष्कर्मियों को जनता को सौंपा जाए

समाजवादी पार्टी की सांसद जया बच्चन ने संसद में कहा कि दोषियों के प्रति नरमी नहीं बरतनी चाहिए, बल्कि आरोपियों को जनता को सौंप देना चाहिए। कई देशों में बलात्कारियों को ऐसी सज़ा का प्रावधान है, जहाँ तुरन्त बलात्कारियों को मौत के घाट उतार दिया जाता है। उन्होंने कहा कि जहाँ पर वारदात की घटना हुई है, वहाँ चौकी प्रभारी से सवाल किया जाना चाहिए कि उन्होंने अपनी ड्यूटी में लापरवाही क्यों की है?

कड़े कानून के लिए बदलाव को तैयार

संसद में रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि महिलाओं के साथ अत्याचार को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। उन्होंने कहा कि हम सख्त कानून बनाने के लिए बदलाव को तैयार हैं। सदन में चर्चा को भी तैयार हैं, जैसी भी सहमति बनेगी, वैसे ही कानून बनाने को तैयार हैं। हैदराबाद में डॉक्टर के साथ जो भी अमानवीयता हुई है, उसकी वो कड़े शब्दों में निन्दा करते हैं।

देश की भावना आहत

अपना दल की सांसद अनुप्रिया पटेल ने संसद में कहा कि ऐसी वारदात से देश की भावना आहत होती है। सरकार को कड़े कदम उठाने होंगे, ताकि ऐसी वारदात रोकी जा सकें। पीडि़ता के परिजनों को एफआईआर दर्ज कराने में दिक्कत होती है।

अब कड़े फैसले लेने ही होंगे सर्वधर्म सम्भाव से अहिंसा विश्व भारती के संस्थापक शान्तिदूत आचार्य लोकेश मुनि ने बताया कि डॉक्टर के दोषियों की सज़ा दिलाने के लिए उन्होंने राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के निवास के बाहर प्रदर्शन कर सरकार सेे गुहार लगायी कि अब सरकार को कड़े फैसले लेने ही होंगे अन्यथा ऐसी घटनाएँ रुकने वाली नहीं हैं। उन्होंने कहा कि ये सामाजिक मुद्दे हैं, इसको राजनीतिक रंग न देते हुए सभी को पीडि़ता को न्याय दिलाने के लिए आगे आना चाहिए, लोकेश मुनि ने कहा कि पीडि़ता के आरोपियों को जब सैकड़ों पुलिसकर्मी जनता बचाव के लिए सुरक्षा देते हैं, अगर पुलिस इस तरह पहले से ही मुस्तैद रहे और चौकन्नी होकर ड्यूटी करे, तो अपराध और बलात्कार जैसी घटनाएँ ही न हों।

 राजघाट से अनशन

दिल्ली महिला आयोग की अध्यक्ष स्वाती मालीवाल बलात्कारियों को छ: महीने के भीतर फाँसी की सज़ा दिलाने की माँग को लेकर राजघाट पर अनिश्चितकालीन आमरण अनशन पर बैठ गयी हैं। मालीवाल का कहना है कि संसद एक ऐसा कानून बनाए जिसमें दोषियों को सीधे फाँसी मिले, इससे कम कोई सज़ा मंज़ूर नहीं होनी चाहिए। जिस तरीके से देश में बलात्कारियों के हौसले बुलंद हैं, वे स्वस्थ समाज के लिए कलंक हैं।

महिला अत्याचार समाज पर कलंक

युवा नेता व सामाजिक कार्यकर्ता संजय प्रजापति ने कहा कि वे पशु चिकित्सक को जि़न्दा जलाये जाने वाली घटना से काफी आहत हैं। वे सरकार से अपील करते हैं कि सरकार कोई ऐसा कानून व सिस्टम बनाये, जिससे महिलाएँ अपनी जॉब व घरेलू कामकाज आसानी से कर सकें। क्योंकि जो अत्याचार महिलाओं पर हो रहे हैं, वे समाज पर कलंक हैं।

आखिर कब गम्भीर होंगे

निर्भया काण्ड के बाद से हैदराबाद काण्ड तक देश में तमाम मामले सामने आये, पर वे किसी कारण न तो सुॢखयों में आये, न ही सडक़ से लेकर संसद तक गूँजे। अगर इन मामलों की समय पर आवाज़ उठी होती, तो इसमें संदेह नहीं कि हैदराबाद की डॉक्टर के साथ यह अनहोनी नहीं होती। क्योंकि हमारे देश में क ई मामलों की आवाज़ लोगों द्वारा उठायी गयी है। ऐसा नहीं कि कानून नहीं है; कानून है, पर उसका डर नहीं है।