अटल मृत्यु से हारे वाजपेयी

एम्स का बुलेटिन - पूर्व प्रधानमंत्री ने 5.05 पर नश्वर संसार को विदा कही

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ठन गई!
मौत से ठन गई!
जूझने का मेरा इरादा न था, मोड़ पर मिलेंगे इसका वादा न था, रास्ता रोक कर वह खड़ी हो गई, यों लगा ज़िन्दगी से बड़ी हो गई।, मौत की उमर क्या है? दो पल भी नहीं, ज़िन्दगी सिलसिला, आज कल की नहीं।, मैं जी भर जिया, मैं मन से मरूँ, लौटकर आऊँगा, कूच से क्यों डरूँ?, तू दबे पाँव, चोरी-छिपे से न आ, सामने वार कर फिर मुझे आज़मा।, मौत से बेख़बर, ज़िन्दगी का सफ़र, शाम हर सुरमई, रात बंसी का स्वर।, बात ऐसी नहीं कि कोई ग़म ही नहीं, दर्द अपने-पराए कुछ कम भी नहीं।, प्यार इतना परायों से मुझको मिला, न अपनों से बाक़ी हैं कोई गिला।, हर चुनौती से दो हाथ मैंने किये, आंधियों में जलाए हैं बुझते दिए, आज झकझोरता तेज़ तूफ़ान है, नाव भँवरों की बाँहों में मेहमान है, पार पाने का क़ायम मगर हौसला, देख तेवर तूफ़ाँ का, तेवरी तन गई, मौत से ठन गई।
यह अटल बिहारी वाजपेयी जी की कविता है। वीर रस के कवि की मौत के सामने हार न मानने की कविता। लेकिन आज वे मौत से हार गए –  एक वीर की तरह। वे उसके सामने डटे रहे। लेकिन मौत अटल है और वाजपेयी भी उससे हार गए। ९३ साल की ज़िंदगी के बाद। यह देश की राजनीति के एक सबसे बड़े दिग्गज और अजातशत्रु की मौत का मातम मनाने की घड़ी है।
वाजपेयी भाजपा के अब तक – आडवाणी से लेकर मोदी तक – के सबसे बड़ा सर्वमान्य और सेकुलर चेहरा थे। गुजरात में २००२ के दंगों के वक्त अटल ही ऐसे नेता थे जो अपने ही मुख्यमंत्री (नरेंद्र मोदी) को राजधर्म का निर्वहन करने का सबक देकर आये थे। यहाँ तक कि 1992 में आडवाणी की रथ यात्रा के भी वे विरोध मे थे। और प्रधानमंत्री रहते जब उनकी सरकार पर ”भारतीय पेट्रोल पंप पार्टी” होने का आरोप लगा तो उन्होंने अपने मंत्री से इस्तीफा लिया। जवाहर लाल नेहरू ने उनका भाषण सुनकर कहा था कि यह शख्स एक दिन देश का प्रधानमंत्री बनेगा। और वाजपयी बने।
वे लाहौर दोस्ती की बस लेकर गए तो श्रीनगर जाकर पाकिस्तान से दोस्ती का हाथ बढ़ाने की बात की। पोखरण (दो) परमाणु विस्फोट के बाद अटल ने कहा था – देश की ज़रुरत सबसे बड़ी है और उसकी ताकत दुनिया में दिखनी भी चाहिए। वाजपेयी प्रकृति प्रेमी थे और हिमाचल के मनाली (प्रीणी) में उनका घर है जहाँ वे अक्सर जाया करते थे। माना जाता है कि वाजपेयी ने अपनी कुछ कवितायेँ प्रीणी के अपने घर में ही लिखीं।
यही अटल आज चले गए। वे विनम्र राजनीति के शिखर पुरुष थे। विपक्ष के लिए भी वे सम्मानित नेता थे। आज के नेताओं की तरह उन्होंने कभी किसी विपक्षी नेता  का नाम लेकर निंदा नहीं की। देश के तमाम बड़े नेताओं ने उनके अवसान पर अफ़सोस जताया है। राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद, लाल कृष्ण आडवाणी, पीएम नरेंद्र मोदी, कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी, सोनिया गांधी, सुषमा स्वराज, राजनाथ सिंह, फ़ारूक़ अब्दुल्ला, भाजपा अध्यक्ष अमित शाह, मायावती, ममता बनर्जी, शरद पवार सब ने।
वाजपेयी का जन्म 25 दिसम्बर 1924 को ग्वालियर में हुआ। उनके पिता का नाम कृष्णा बिहारी वाजपेयी और माता का नाम कृष्णा देवी था। पिता कृष्णा बिहारी वाजपेयी अपने गाँव के कवि और  अध्यापक थे। वाजपेयी ने ग्वालियर के बारा गोरखी के गोरखी ग्राम स्कूल से शिक्षा ग्रहण की थी। बाद में वे शिक्षा प्राप्त करने ग्वालियर विक्टोरिया कॉलेज (अभी लक्ष्मी बाई कॉलेज) गये और हिंदी, इंग्लिश और संस्कृत में डिस्टिंक्शन से पास हुए। उन्होंने कानपुर के दयानंद एंग्लो-वैदिक कॉलेज से राजनीतिक शास्त्र में पोस्ट ग्रेजुएशन की। इसके लिये उन्हें फर्स्ट क्लास डिग्री से भी सम्मानित किया गया था।
ग्वालियर के आर्य कुमार सभा से उन्होंने राजनैतिक काम करना शुरू किये, वे उस समय आर्य समाज की युवा शक्ति माने जाते थे और 1944 में वे उसके महासचिव बने। १९३९ में एक स्वयंसेवक की तरह वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) में शामिल हो गये। वहां बाबासाहेब आप्टे से प्रभावित होकर उन्होंने 1940-44 के दर्मियान आरएसएस प्रशिक्षण कैंप में प्रशिक्षण लिया और 1947 में आरएसएस के फुल टाइम कार्यकर्ता बन गये।
विभाजन के बीज फैलने की वजह से उन्होंने लॉ की पढ़ाई बीच में छोड़ प्रचारक बन गए। उन्हें उत्तर प्रदेश भेजा गया और जल्द ही वे दीनदयाल उपाध्याय के साथ राष्ट्रधर्म (हिंदी मासिक ), पाञ्चजन्य (हिंदी साप्ताहिक) और दैनिक स्वदेश और वीर अर्जुन जैसे अखबारों के लिये पत्रकारिता करने लगे। वाजपेयी ने शादी नहीं की। वाजपेयी ने नमिता को दत्तक पुत्री बनाया है। प्रकृति प्रेमी वाजपयी हिमाचल प्रदेश के मनाली जाते थे जहाँ उनका एक घर भी है।
वाजपेयी भारतीय जन संघ के संस्थापक सदस्य भी है, वाजपेयी ने भारतीय जन संघ का संचालन भी किया है। मोरारजी देसाई की केविनेट में वे विदेश मंत्री रहे। साल १९८० में जब भारतीय जनता पार्टी बनी तो वे उसके पहले अध्यक्ष बनाये गए। अटल बिहारी वाजपेयी भारत के १०वें प्रधानमंत्री रहे। वे पहले 1996 में 13 दिन तक और फिर 1998 से 2004 तक भारत के प्रधानमंत्री बने रहे। वे किसी गैर कांग्रेसी सरकार को चलने वाले पहले पीएम भी बने। लोकसभा चुनाव में वाजपेयी ने नौ बार जीत हासिल की। उन्होंने स्वास्थय  समस्या के चलते राजनीति से सन्यास ले लिया।
वाजपेयी को २५ दिसम्बर, 2014 को राष्ट्रपति कार्यालय में भारत का सर्वोच्च पुरस्कार “भारत रत्न” की घोषणा हुई जबकि  उन्हें सम्मान देने राष्ट्रपति खुद 27 मार्च, 2015 को उनके घर आये थे। उनका जन्मदिन 25 दिसम्बर ”गुड गवर्नेंस डे” के रूप में मनाया जाता है।
कविता वाजपेयी की पहचान थी। कविताओ के बारे में वे कहते थे – ”मेरी कवितायेँ युद्ध की घोषणा करने जैसी है जिसमें हारने का कोई डर न हो। मेरी कविताओं में सैनिक को हार का डर नहीं बल्कि जीत की चाह होती है। मेरी कविताओं में डर की आवाज नहीं बल्कि जीत की गूंज होगी। वाजपेयी को १९९२ में पद्म विभूषण, १९९३ में डी.लिट (डॉक्टरेट इन लिटरेचर), कानपुर यूनिवर्सिटी, १९९४ में  लोकमान्य तिलक पुरस्कार, १९९४ में बेस्ट संसद व्यक्ति का पुरस्कार, १९९४ में भारत रत्न पंडित गोविन्द वल्लभ पन्त अवार्ड, २०१५ में भारत रत्न और इसी साल  लिबरेशन वॉर अवार्ड (बांग्लादेश मुक्तिजुद्धो संमनोना) मिला।
इस बीच केंद्र सरकार ने वाजपेयी के निधन पर सात दिन के राजकीय शोक की घोषणा की है। वाजपेयी का शुक्रवार शाम ५ बजे के करीब विजय घाट पर अंतिम संस्कार किया जाएगा। इसके लिए वहां १.५ एकड़ ज़मीन उनके स्मारक के लिए चयनित की गयी है। उनका शव एम्स से उनके निवास ६ कृष्णा मेनन मार्ग के लिए ले जाया जा रहा है। कल सुबह ९ बजे से उनकी पार्थिव देह भाजपा मुख्यालय में अंतिम दर्शनों के लिए रखी जाएगी। कई प्रदेश सरकारों ने शुक्रवार को अपने यहाँ छुट्टी का ऐलान किया है। दिल्ली सहित कुछ और प्रदेशों में कल स्कूल भी बंद रहेंगे।