अंडमान निकोबार द्वीप में जिम्मेदारी के अभाव में जान गई!

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भारत में चूंकि देशवासियों की सुरक्षा व कल्याण का महत्व नहीं है। यही लापरवाही विदेशी पर्यटकों के लिहाज से भी यहां है। विदेशी पर्यटक अपनी जान हथेली पर रख कर भारत की यात्रा करते हैं। इसी कारण भारत स्थित दूतावास उन्हें सतर्क भी करते रहते हैं। अभी-अभी अमेरिकी खोजी पर्यटक जॉन एलेन चाउ (27 वर्ष) अपने घर नहीं लौट सका। अपनी खोजी प्रवृति के कारण अंडमान-निकोबार द्वीप समूह के संरक्षित सेंटिनेल द्वीप में रहने वालों को देखने-जानने की उत्सुकता में उसकी जान चली गई। इसकी एक वजह यह है कि सरकार ने सेंटिनेल समुदाय के लोगों के द्वीप पर लगी पाबंदी हटाई थी। जिससे पर्यटकों में ऊहोपोह रहा।

भारत के विदेश राज्यमंत्री ने इस घटना पर गहरा शोक जताते हुए जांच का आश्वासन ज़रूर दिया है। लेकिन क्या यह पर्याप्त है?

चाउ की लाश तो अब तक नहीं मिली है, लेकिन उसे और उसके सामान को दफनाते हुए देखने की बात सामने आई है। डीजीपी अंडमान निकोबार दीपेंद्र पाठक के अनुसार एक मोटरबोट में चाउ के साथ (14 नवंबर को) गए पांच मल्लाहों को भी हिरासत में ले लिया गया है। चाउ के घरवालों की कोई दिलचस्पी उसकी लाश को देखने या उसके संस्कार की नहीं है। क्या भारत सरकार और उसकी विभिन्न एजेंसियों की कोई जिम्मेदारी नहीं थी कि वे चाउ को वहां जाने से पहले ही रोक लेते।

पुलिस के अनुसार जॉन एलेन चाउ 15 नवंबर की सुबह पहुंचा। वह कुछ उपहार मसलन कई फुटबाल, मछली, नारियल वगैरह लेकर मोटरबोट में बंधी अपनी कैनो नाव से 16 नवंबर की सुबह सेंटिनेल द्वीप में आदिम जनजाति के लोगों से मिलने पहुंचा। उसने मल्लाहों को कहा था कि वे कुछ देर बाद उसे ले लें। वह द्वीप के किनारे पहुंचा। उसके साथ मोटर बोट में गए पांचों मल्लाह उसे द्वीप की ओर जाता देखते रहे और खुद सुरक्षित जगह पर रहे। दो-तीन घंटे बाद वे उसे खाना देने भी कुछ दूर तक ही जाते। दोपहर बाद उससे लौटने का अनुरोध भी उन्होंने किया लेकिन उसने मना कर दिया। उसने खाना लेते हुए उन्हें 13 पेज की एक पुस्तिका ज़रूर दी और द्वीप को चला गया। दूसरी सुबह (17नवंबर) मल्लाहों ने सुबह के झुरमुट में देखा कि लाश और उसकस सामान द्वीप में किनारे पर ही दफनाया जा रहा है।

अमेरिकी काउंसिलेट का कहना था कि एक अमेरिकी पर्यटक जॉन एलेन चाउ (27 वर्ष) कहीं गुम हो गया है। उसकी तलाश जारी है। पुलिस के अनुसार चाउ ने किराए पर एक मोटरबोट ली। कुछ स्थानीय मछुआरों को साथ लिया जिन्होंने उन्हें नार्थ सेंटिनेल आइलैंड पहंचाने का वादा किया था। पुलिस ने इस संबंध में सात लोगों को गिरफ्तार किया है।

पुलिस ने कहा कि लाश दफन हुई है। इसकी जानकारी तो मिल गई है लेकिन लाश को पाने में खासी कठिनाई है, क्योंकि दूरस्थ नार्थ सेंटिनेल आइलैंड संरक्षित द्वीप है और वहां सौ लोगों की आबादी है जो हिंसक आदिम जनसमुदाय है। उनके तौर-तरीकों के बारे में ज़्यादा जानकारी नहीं है। अमेरिकी कौंन्सुलेट जनरल चेन्नई को 19 नवंबर 2018 को एक ई-मेल जॉन एलेन चाउ की मां की ओर से मिला था। उन्होंने अपने बेटे के नार्थ सेंटिनेल द्वीप पर जाने ओर उस पर आदिम जनसमुदाय के हमले की सूचना दी गई थी। इस मेल के आधार पर बतौर ‘लापता’ एक रपट दर्ज की गई। अंडमान-निकोबार पुलिस के डीजीपी दीपेंद्र पाठक के अनुसार छानबीन से पता चला कि चाउ की कथित हत्या सेंटिनेल द्वीप पर हुई जब वह द्वीप पर उन लोगों से संपर्क बनाने की कोशिश कर रहा था। जिनका

इतिहास ही रहा है कि बाहरी दुनिया से वे कोई संपर्क रखने को कभी तैयार नहीं होते और हिंसा पर उतर आते हैं। चाउ ने पहले भी कई बार उस द्वीप पर एक दोस्त के जरिए संपर्क बनाने की कोशिश की थी जो पानी में खेल खेलने का विशेषज्ञ है। चाउ ने उन मल्लाहों को 25,000 रुपए दिए थे जो उसे वहां तक ले गए। मल्लाह वापस पोर्टब्लेयर पहुंचे और चाउ के दोस्तों को जानकारी दी साथ ही उनसे अमेरिका में उसके परिवार को भी सूचित करने को कहा। उन लोगों ने पुलिस या किसी सरकारी अधिकारी को कोई जानकारी नहीं दी।

दूसरी सुबह मल्लाहों ने देखा कि एक लाश द्वीप के किनारे ही दफनाई जा रही है। काफी कम रोशनी में जो नज़र वह यही था कि वे कब्र में जो डाल रहे थे वह चाउ के कपड़े आदि थे। ऐसा लगता है कि बाण की चोट से वह घायल हुआ और मारा गया। जिन्होंने देखा उन्होंने यही बताया कि उसका आधा शरीर तो कब्र में डाला हुआ उन्होंने देखा। पुलिस की टीम ने समुद्री नावों और हेलिकॉप्टर से सेंटिनल द्वीप की ओर अपनी खोज का सिलसिला जारी रखा। लेकिन यह भी वे ज़्यादा इस डर से नहीं कर पाए क्योंकि उन्हें भी सेंटिनेल द्वीप के आदिम निवासियों से हमले का डर था। उत्तर आधुनिक मानवीय चिंतन के अनुसार ऐसे वाकयों पर बेहद संतुलित तरीके से ही कार्रवाई करनी चाहिए। कहीं कोई जल्दबाजी नहीं दिखानी चाहिए। पुलिस इस मामले में अब मानव विज्ञानी, वनकर्मियों, मल्लाहों और आदिम जनजाति विकास समिति के लोगों से बात करके ऐसा प्रयास करना चाहती है कि सेंटिनेल समुदाय के लोगों को परेशानी भी न हो और बात भी बन जाए। हमारी कोशिश है कि चाउ की लाश मिल जाए। उन पांच मल्लाहों को हिरासत में लेकर पूरी घटना का ब्यौरा लिया जा रहा है। उधर चाउ के परिवार के लोगों ने इंस्टाग्राम पर उसकी तस्वीरें वगैरह डालने के साथ ही कहा है कि गिरफ्तार किए गए मल्लाहों को छोड़ दिया जाए। साथ ही उसकी लाश तलाशने का काम भी बंद कर दिया जाए, क्योंकि वह अपनी इच्छा से वहां गया था। उसके स्थानीय संपर्क सूत्रों को तंग न किया जाए। उसके परिवार का कहना है कि चाउ हमारे लिए बेहद प्यारा बच्चा, भाई, चाचा और दोस्त था। हम उसे मारने वालों को माफ करने की अपील करते हैं।

पोर्ट ब्लेयर में बालाजी बेव्यू होटल के कमरा नंबर 121 में अब अमेरिकी खोजी पर्यटक जॉन एलेन चाउ की यादें ही हैं। वह जब भी आता रोज रुपए 800 मात्र की दर पर इसी नॉन एसी कमरे में रहता था। वह 2016 से यहां आता रहा। सात दिन पहले यानी 15 नवंबर को अंडमान निकोबार द्वीप समूह में सेंटिनेल द्वीप के संरक्षित आदिम जनजाति के लोगों ने उसकी जान ले ली। पुलिस को अब तक उसकी लाश नहीं मिली है। हालांकि वे यह बताते हैं कि 17 नवंबर की सुबह उन्होंने किनारे पर सेंटिनेल समूह के लोगों को एक शव किनारे पर दफनाते ज़रूर देखा था।  बालाजी होटल के मालिक निर्मल लाल बताते हैं कि वह कमरा नंबर 121 में ही रहना चाहता क्योंकि उसे वह जगह पसंद थी। हम आपस में काफी बातचीत करते। लेकिन उसने यह नहीं बताया कि वह सेंटिनेल के लोगों से मिलने की इच्छुक है। हमें 19 नवंबर को पुलिस से जानकारी मिली। दूसरे दिन जब मैं सुबह टहल रहा था तो एक स्थानीय अधिकारी ने उसकी मौत की जानकारी दी।

होटल के कर्मचारियों ने बताया कि चाउ पहली बार यहां 19 सितंबर 2016 को दो दिन के लिए आया था। फिर उसी साल वह 29 अक्तूबर को आया। उसने स्टॉफ को बताया कि वह हैवलॉक द्वीप पर जा रहा है। फिर इस साल वह 13 जनवरी को आया और पांच दिन रहा। फिर वह 16 अक्तूबर को आया और दो दिन बाद चला गया।

निर्मल लाल के अनुसार उसने यह बताया था कि आम तौर पर वह इडली -डोसा खाता था। जब भी वह बातचीत करता तो वह उन स्थानों के बारे में बताता जहां वह गया था। वहां की तस्वीरें भी वह दिखाता। वह हमेशा अपने साथ एक नोटबुक, एक डिजिटल कैमरा और सेलफोन रखता। वह रेस्टोरेंट में बैठता और कपनी किताब लिखने की तैयारी में जुटा रहता। उसने निर्मल को 2017-2018 का एक कैलेंडर दिया था। कैलेंडर में पहली तस्वीर में चाउ नार्थ कैस्केड नेशनल पार्क वाशिंगटन में खड़ा है। कैलेंडर के दूसरे पन्नों पर चाउ की अंडमान, मायाबंदर और हैवलॉक की तस्वीरें हैं। वह बहुत देर से जगता। वह सहज और मृदुभाषी था। कभी उसे तेज आवाज़ में बोलते नहीं सुना। यहां से जाते हुए वह अपना सारा सामान भी ले गया था।

मल्लाह जाते हैं डॉलर पाने की चाह में खतरनाक द्वीपों तक!

कहा जाता है कि अमेरिकी खोजी पर्यटक जॉन एलेन चाउ(27) की कथित हत्या संरक्षित सेंटिमेल की आदिम जन जाति ने कर दी। अंडमान निकोबार द्वीप समूह में सेंटिनेल एक द्वीप है। पुलिस और कोस्ट गार्ड अपने तरीके से इस पूरी घटना की छानबीन कर रहे हैं। हालांकि कुछ होता नज़र नहीं आता। चाउ को पांच मल्लाह लेकर सेंटिमेल द्वीप के पास तक पहुंचे थे। उन्हें पुलिस कार्रवाई का डर था। लेकिन वे मछली मारने या विदेश पर्यटकों से अच्छी कमाई की उम्मीद करते हैं। विदेशी प्राय: वहां उन संरक्षित आदिम जन जाति की फोटो लेने जाते। पोर्ट प्लेयर में कतार से नौकाएं जंगलीघाट जेटी पर लगी दिखाई देती हैं।  मछली पकडऩे वाली मोटर नौकाओं को किनारे से छह किलोमीटर दूरी तक मछली पकडऩे के लिए जाने की छूट हैं। लेकिन ये नौकाएं चौदह किलोमीटर तक भी चली जाती हैं क्योंकि द्वीप के आसपास मछलियां नहंी मिलतीं। मछुआरा कल्याण संघ के महासचिव एम राजू के अनुसार इन नौकाओं से विदेशी खोजी पर्यटक उन सरंक्षित द्वीपों तक भी जाते हैं। मछुआरे पैसों की लालच में तैयार हो जाते हैं। एक मल्लाह बा राव ने बताया कि उसका परिवार इस इलाके में पीढ़ी दर पीढ़ी मछलियां ही पकड़ता रहा है। दस साल पहले तक तो यहां छह से नौ सौ किलो वजन की मछली भी मिल जाती थी अब उतने वजन की मछली पकडऩे में दो सप्ताह से ज्य़ादा समय लग जाता है। कुछ मोटर बोट वाले कोस्ट गार्ड और नेवी पेट्रोल से बचते-बचते मछली पकडऩे आते हैं। साथ ही विदेशी पर्यटक भी। जो यहां से द्वीप के लोगों की फोटो खींचते हैं।

नारियल-मछलियों से रिझाया… डॉ. पंडित

देश के एंथ्रापॉलाजिकल सर्वे की ओर से टीएन पंडित ने अंडमान निकोबार द्वीप समूह की कई बार यात्रा की थी। इस समय 83 साल के पंडित पहले भारतीय हैं जिन्होंने द्वीप पर उतर कर वहां रहने वाले आदिम समुदाय के लोगों को जानने समझने की कोशिश की।

उनका मानना है कि यह आदिम समुदाय अब बहुत तादाद में है। वह अपनी सुरक्षा को लेकर काफी सतर्क रहता है। उनका मानना है कि हालांकि वे तब खुद वापस लौट आए थे लेकिन यह आदिम समुदाय हिंसक नहीं है। हम जब खुद आक्रामक रूप में उनकी ओर जाएंगे उनकी सीमा में घुसेंगे तो वे प्रतिरोध तो करेंगे ही।

पंडित ने 1966 से 1991 के दौरान सात-आठ लोगों के साथ नार्थ सेंटिनेल आईलैंड की यात्रा की। उन्होंने बताया कि पहली बार जब वे गए तो उनका इरादा था कि उनकी आजादी और उनके रहन-सहन का अध्ययन। इस समुदाय के लोगों को हिंसक प्रवृत्ति का माना जाता है। हालांकि जब हम वहां पहुंचते तो हमें वे आक्रामक मानते क्योंकि उनकी सीमा में हम घुसने की कोशिश कर रहे हैं। हम जब गए तो साथ में एक बड़ी टीम ले गए। हमने उनकी बस्तियां, उनके रहन-सहन में जाना-समझा। वे तब वहां 18 झोपडिय़ों में रहते। हमेशा उनके कंधे पर भाला और धनुष-बाण होता।

अपने साथ हम काफी लोहा और नारीयल ले गए थे। हमने वहां नारीयल बांटा। नारीयल उनके द्वीप में होता नहीं था और लोहे से वे धनुष, भाला आदि बनाते। 1991 तक तो इस समुदाय के कुछ लोगों से पंडित और उनकी टीम के कुछ लोगों का अच्छा परिचय भी हो गया। लेकिन इस बात से वे इंकार नहीं करते कि वे व्यवहार में विश्वसनीय हैं। उन्होंने कहा, ऐसा लगता नहीं कि सेटिनेल समुदाय के लोगों ने चाऊ की हत्या की। लेकिन ऐसा हो भी सकता है क्योंकि एक बार जब मैं गया था तो इसी समुदाय का एक नौजवान ने मेरा चश्मा देखना चाहा। मैंने उसे दे दिया। कुछ देर बाद जब मैंने उससे चश्मा वापस लेना चाहा तो उसने पहले नराजगी दिखाई।

चाऊ की लाश पाने के लिए उन्होंने संभावना बताई कि कुछ स्थानीय मल्लाहों के साथ जाकर पता लगाना होगा कि वे कैसे कहां अपने समुदाय में लाशों का संस्कार करते हैं। तभी कुछ संभव होगा। एंथ्रापॉलिजिकल सर्वे ऑफ इंडिया के निदेशक रहे पंडित ने बताया कि वे पच्चीस साल पोर्ट ब्लेयर में रहे और 1992 में निदेशक पद से नई दिल्ल्ी में सेवानिवृत्त हुए। उन्होंने आदिम जनजाति के लोगों से संपर्क बढ़ाने के कई प्रयास किए। उन्होंने मल्लिका जोशी से बातचीत में कहा कि उनसे हमें कुछ नहीं चाहिए था। एक बार एक सुअर, नारियल आदि बतौर उपहार हम ले गए। उपहार देने का हमारा तरीका था कि द्वीप से थोड़ा कुछ पानी में ही उपहार छोड़ते। हम यह भी ध्यान रखते कि उनके बाण और माले हमें तक न पहुंचे। हमने सुअर पानी में छोड़ा। नारीयल छोड़े और लौट कर अपनी मोटरबोट पर आ गए। हमने देखा कि उन्होंने सुअर को जांचा परखा। एक ने तो उसे भाले से कोंचा। हमे लगा था कि हमारे उपहार पसंद किए जाएगे लेकिन दूसरे दिन हमने देखा उन्होंने सुअर को एक गड्ढे में गाड़ दिया था। हम फिर कभी सुअर नहीं ले गए। यानी वह उन्हें पसंद नहीं था।

1967 में 20 लोगों के साथ उस द्वीप पर हम गए। हमें लगा कि वे जंगलों में छिप गए। हमारा कतई कोई इरादा कब्जा जमाने का नहीं था। लौटते हुए हमने उनके रहने की जगहों पर एक-एक नारियल रखा और लौट आए। इसी तरह 1975 में बेल्जियम के राजा लियोपाल्ड-तीन ने वहां जाना चाहा। उनकी नाव जैसे ही द्वीप के पास पहुंची उनकी ही तरफ एक तीर आया। इस राजा खुश हुए। उन्होंने कहा, उनकी जि़ंदगी का यह दिन बड़ा खुबसूरत है। आखिरी बार पंडित ने 1991 में उस द्वीप की ओर जाकर नारियल दिए।