आम आदमी पार्टी: कहां गए वे लोग?

लखनऊ लोकसभा सीट पर फिल्म अभिनेता और कमेडियन जावेद जाफरी की उम्मीदवारी भी दूसरे विकल्प के तौर पर सामने आई थी. आप ने इससे पहले पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के पौत्र आदर्श शास्त्री को लखनऊ लोकसभा सीट से अपना उम्मीदवार बनाया था. बाद में किन्हीं कारणों से आदर्श को इलाहाबाद भेज दिया गया और जावेद जाफरी को लखनऊ से उम्मीदवार घोषित कर दिया गया. जावेद जाफरी का मामला बहुत सीधा है. वे चुनावों के बाद न तो अपने लोकसभा क्षेत्र में कभी दिखे हैं न ही पार्टी के किसी फोरम पर. लखनऊ के आम आदमी पार्टी कार्यकर्ता मनुज सिंह की बातों से कार्यकर्ताओं की निराशा साफ झलकती है. मनुज बताते हैं, ‘पार्टी ने जिस तरह से काम किया उसका खामियाजा पार्टी ने भुगता है. मैं यहां मेंबरशिप कोऑर्डिनेटर था. चुनाव से पहले हमने कुल 32 लाख कार्यकर्ता पूरे प्रदेश में बनाए थे. जबकि पार्टी को चुनाव में कुल साढ़े आठ लाख वोट मिले. यह पार्टी द्वारा उम्मीदवारों को चयन में की गई गड़बड़ी का नतीजा है. जावेद जाफरी को यहां सिर्फ 43000 वोट मिले. हमने निचले स्तर पर तय किया है कि हम सब पार्टी से जुड़े रहेंगे लेकिन प्रत्याशी के चयन में पार्टी को हमारी भागीदारी सुनिश्चित करनी होगी, चाहे वह सलाह के तौर पर ही क्यों न हो.’ मनुज और उनके जैसे तमाम कार्यकर्ताओं से बातचीत में एक बात साफ होती है कि बाहर से लाकर बैठा दिए गए सेलीब्रेटी उम्मीदवारों से कुछ हद तक तो फायदा हो सकता है, लेकिन संगठनात्मक मजबूती के लिए उसका स्थानीय होना और क्षेत्र में जमे रहना बहुत जरूरी होता है. आप जैसी नई पार्टी के लिए यह बेहद जरूरी है. जबकि जावेद जाफरी जैसे बाहरी लोगों की व्यावसायिक मजबूरियां भी उन्हें संगठन के लिए काम करने की छूट नहीं देती.

‘जिस तरह से काम करना चाहिए वैसा काम पार्टी कर नहीं रही है. पार्टी का जनाधार बढ़ाने का एक तरीका होता है, पार्टी में इसको लेकर भारी गड़बड़ी है’

हरविंदर सिंह फूल्का

1984 में हुए सिख विरोधी दंगों के पीड़ितों को न्याय दिलाने के मकसद से सिटिजन फॉर जस्टिस कमेटी की स्थापना करके फूल्का करीब तीस साल पहले सुर्खियों में आए थे. लगभग 25 सालों तक फूल्का अकेले दंगों के पीड़ितों के लिए लड़ाई लड़ते रहे. सुप्रीम कोर्ट में एक वकील के तौर पर उनकी प्रतिष्ठा है और सिख दंगों के पीड़ितों की लड़ाई लड़ने की वजह से उनका काफी सम्मान है. इनका एक बहुत महत्वपूर्ण बयान आज भी राजनीति और जुडीशियरी के गलियारों में कहा-सुना जाता है- ‘1984 के दंगों से पहले राजनीति में अपराधी नहीं थे. अपराधी नेताओं के पीछे खड़े रहते थे. लेकिन 1984 के दंगों के बाद अपराधियों को लगने लगा कि लूटमार और हत्या करने वाले भी चुनाव जीत सकते हैं. इस तरह से अपराधियों ने राजनीति को करियर बनाना शुरू कर दिया.’ फूल्का को आप ने लुधियाना से अपना उम्मीदवार घोषित किया था. पर वे चुनाव हार गए. हार के बाद लुधियाना में अपनी राजनीतिक गतिविधियों को लेकर वे कहते हैं, ‘मैं तो दिल्ली और लुधियाना के बीच ही घूमता रहता हूं. पार्टी के स्तर पर मेरी सक्रियता पूरी तरह से बनी हुई है. फिलहाल मैं पंजाब इकाई की कार्यकारिणी का सदस्य और पंजाब प्रदेश का प्रवक्ता भी हूं.’ बहुत सारे नामचीन लोगों में पार्टी को लेकर आई शिथिलता के बारे में फूल्का का मानना है कि चुनाव हारने के बाद थोड़ा धीमा पड़ जाना स्वाभाविक है. आगे कोई चुनाव भी नहीं है और पार्टी भी फिलहाल संगठन को मजबूत करने पर ज्यादा जोर दे रही है. एक बात साफ है कि पार्टी छोड़कर जाने वालों की भीड़ के बावजूद पंजाब इससे कमोबेश अछूता रहा है. इसकी एक वजह शायद यह भी है कि वहां से पार्टी को अनपेक्षित रूप से चार लोकसभा सीटें प्राप्त हुई हैं.

बाबा हरदेव सिंह

बाबा हरदेव सिंह को उत्तर प्रदेश में एक प्रभावशाली प्रशासक के रूप में जाना जाता है. 2007 में वे शारदा सहायक कमांड एरिया डेवलपमेंट प्रोजेक्ट से रिटायर हुए थे. आप में शामिल होने से पहले हरदेव सिंह राष्ट्रीय लोकदल के उत्तर प्रदेश इकाई के अध्यक्ष थे. ठीक चुनाव से पहले वे आम आदमी पार्टी से जुड़े थे. उन्हें पार्टी ने समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव के खिलाफ मैनपुरी चुनाव लड़ाया था. जैसी ख्याति और सफलता बाबा हरदेव सिंह को प्रशासनिक सेवा में मिली थी कह सकते हैं कि उनकी राजनीतिक यात्रा उतनी सफल नहीं रही. दो जून के बाद से उन्होंने आम आदमी पार्टी और खुद के नाम से बनाए गए वेब पेज पर कुछ भी अपडेट नहीं किया है. फिलहाल वे आम आदमी पार्टी से भी मोहभंग की हालत में हैं. क्या आप अभी भी आम आदमी पार्टी से जुड़े हुए हैं, इस सवाल के जवाब में वे कहते हैं, ‘हां, बस जुड़ा हुआ हूं. जिस तरह से काम करना चाहिए वैसा काम पार्टी कर नहीं रही है. पार्टी का जनाधार बढ़ाने का एक तरीका होता है, पार्टी में इसको लेकर भारी गड़बड़ी है. दिल्ली में मिली सफलता की हवा जैसे ही निकली पार्टी जमीन पर आ गई. लोकसभा चुनाव में आप देखिए पार्टी के पास कुछ था ही नहीं. जब तक स्थानीय स्तर पर संगठन और नेतृत्व तैयार नहीं होगा कभी भी सफलता नहीं मिलेगी.’ बाबा हरदेव का मानना है कि जिस साफ-सुथरी राजनीति की उम्मीद मे लोगों ने पार्टी को दिल्ली में अपना समर्थन दिया था वह उम्मीद शायद टूटती दिख रही है. फिलहाल बाबा हरदेव के पास संगठन से जुड़ी कोई जिम्मेदारी नहीं है.

आशीष खेतान

लोकसभा चुनावों से पहले आप से जुड़ने वाले बड़े और हैरत में डालने वाले नामों में एक नाम तेज तर्रार खोजी पत्रकार आशीष खेतान का भी था. आप ने उन्हें नई दिल्ली सीट से अपना उम्मीदवार बनाया था. आशीष खेतान राजनीति में आने से पहले गुजरात दंगों से लेकर स्नूपगेट तक अपनी तमाम दमदार खोजी रिपोर्टों के लिए काफी सुर्खियां बटोर चुके थे. तमाम दूसरे नामचीन नेताओं के विपरीत खेतान चुनावों के बाद भी इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में पार्टी की तरफ से लगातार सक्रिय रहे हैं. सेलीब्रेटी चेहरों का चुनाव के बाद गायब हो जाने के सवाल पर वे कहते हैं, ‘आप बाकी पार्टियों में सेलिब्रेटी लोगों को देखिए वे तो चुनाव जीतने के बाद भी कितने दिन अपने क्षेत्र या लोकसभा में नजर आते हैं. यह मानने की कोई वजह नहीं है कि लोग पार्टी से अलग होकर अपने-अपने रास्ते चले गए हैं. सारे लोग पार्टी के अलग-अलग फोरमों पर काम कर रहे हैं. समस्या यह होती है कि वे फोरम इतने विजिबल नहीं हैं. इस वजह से लगता है कि ज्यादातर लोग पार्टी के लिए सक्रिय नहीं हैं. ऐसे इक्का-दुक्का लोग होंगे जो अपने रास्ते चले गए होंगे.’

आदर्श शास्त्री

आदर्श शास्त्री की सबसे बड़ी पहचान फिलहाल यह है कि वे देश के पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री के पौत्र हैं. पर राजनीतिक पहचान के इतर उनकी अपनी एक दुनिया थी जिसमें वे काफी ऐश और आराम की जिंदगी बसर कर रहे थे. अमेरिका में एप्पल कंपनी की अपनी सुरक्षित नौकरी छोड़कर उन्होंने आम आदमी पार्टी का दामन थामा. उनके पिता अनिल शास्त्री अभी भी कांग्रेस पार्टी के सदस्य हैं. आदर्श कहते हैं, ‘आज जो कांग्रेस है उसका शास्त्रीजी के विचारों से दूर-दूर तक कोई लेना देना नहीं है. मुझे लगता है कि फिलहाल आप ही वह पार्टी है जो शास्त्रीजी के विचारों के करीब है.’ आदर्श शास्त्री उन नेताओं की फेहरिस्त में शुमार हैं जो पूरी तरह से आप के साथ जुड़े हुए हैं. जिस समय तहलका ने उनसे बात करने की कोशिश की वे दिल्ली के जंतर मंतर पर ई-रिक्शा चालकों की रैली में हिस्सा ले रहे थे. उन्हें पार्टी ने कुछ बेहद गंभीर जिम्मेदारियां सौंपी हैं. पार्टी ने मिशन विस्तार योजना के तहत उन्हें हिमाचल प्रदेश का प्रभारी नियुक्त किया है. आदर्श बताते हैं, ‘कुछ लोग मौकापरस्ती में आए थे. वे लोग अलग हो गए हैं.’ तो फिर वे अपने निर्वाचन क्षेत्र इलाहाबाद क्यों नहीं जा रहे हैं, इस सवाल के जवाब में आदर्श कहते हैं कि पार्टी ने मेरे ऊपर केंद्रीय स्तर पर तमाम जिम्मेदारियां सौंपी है जिसकी वजह से इलाहाबाद जाना थोड़ा कम हो गया है, लेकिन यह पूरी तरह से खत्म नहीं हुआ है. मेरा अपने निर्वाचन क्षेत्र के लोगों से लगातार संपर्क बना रहता है.

ऐसे लोगों की भी एक बड़ी संख्या है जो पार्टी के भीतर नेतृत्व के कामकाज और अलोकतांत्रिक हालात की वजह से पार्टी से दूर हुए हैं

चुनाव के दौरान उभरे तमाम नए-चमकदार चेहरों से बातचीत में एक बात साफ तौर पर सामने आती है कि आप कोई परंपरागत ढांचे वाली पार्टी नहीं है. काफी हद तक उसका विस्तार और प्रभाव वालंटियरों और चंदे में मिले पैसों के ऊपर निर्भर रहा है. पार्टी के ज्यादातर कार्यकर्ता ऐसे थे जो चुनाव के दौरान अपना काम-काज छोड़कर चुनाव में आप के लिए काम कर रहे थे. आदर्श शास्त्री के शब्दों में, ‘ज्यादातर कार्यकर्ता चुनाव से पहले वालंटियर के तौर पर जुड़े थे. जाहिर सी बात है कि चुनाव के बाद वे लोग अपने काम-धंधों में लौट गए हैं. इसका ये अर्थ नहीं है कि वे पार्टी से अलग हो गए हैं. समय-समय पर ये लोग पार्टी को अपनी सेवाएं देते रहते हैं.’

फोटो: विकास कुमार
फोटो: विकास कुमार

इसके इतर भी कुछ वजहें सामने आई हैं जिनकी वजह से तमाम बड़े चेहरे पार्टी से दूर हुए हैं. चुनाव के बाद तात्कालिक लाभ की नीयत से जुड़े लोग तो पार्टी से दूर हुए ही हैं साथ ही ऐसे लोगों की भी एक बड़ी संख्या है जो पार्टी के भीतर नेतृत्व के कामकाज और अलोकतांत्रिक हालात की वजह से पार्टी से दूर हुए हैं. इस बिना पर पहला झटका पार्टी को उसके सबसे विश्वसनीय चेहरों में से एक रहे योगेंद्र यादव के रूप में लगा था. किसी तरह से पार्टी इस झटके से उबरने मे सफल रही और यादव पार्टी में बने रहे. पार्टी को दूसरा बड़ा झटका पूर्व पत्रकार और पार्टी की संस्थापक सदस्य शाजिया इल्मी के रूप में लगा. शाजिया ने बाकायदा प्रेस कॉन्फ्रेंस करके पार्टी में व्याप्त कामियों को गिनाया था और अरविंद केजरीवाल के ऊपर एक मंडली के प्रभाव में काम करने का आरोप लगाया था. बाद में पार्टी ने शाजिया को वापस बुलाने की भी कोशिश की थी, लेकिन वह कोशिश सिरे नहीं चढ़ सकी. शाजिया गाजियाबाद से लोकसभा का चुनाव लड़ी थी. उनको लेकर यह खबरें भी उस दौरान उड़ी थीं कि वे गाजियाबाद की बजाय दिल्ली की किसी सीट से चुनाव लड़ना चाहती थीं. लेकिन पार्टी ने उनकी यह इच्छा पूरी नहीं की. फिलहाल शाजिया के बारे में खबर है कि वे स्वच्छ भारत अभियान के जरिए भाजपा के मंचों पर देखी जा रही है. अटकलें लग रही हैं कि शायद वे भाजपा से जुड़ सकती है लेकिन शाजिया ने इसका खंडन किया है. इसी दौर में कुछ और बड़े चेहरों ने भी पार्टी को अलविदा कहा. इनमें अश्विनी उपाध्याय, कैप्टन गोपीनाथ, अशोक अग्रवाल सुरजीत दासगुप्ता, मधु भादुड़ी, नूतन ठाकुर आदि प्रमुख नाम हैं.

जहां तक पार्टी का सवाल है तो ऐसा लग रहा है कि वह शुरुआती दौर की झिझक और झटकों से उबर कर खुद को लंबी लड़ाई के लिए तैयार कर रही है. गुल पनाग कहती हैं, ‘राजनीति रातोंरात होने वाले बदलाव का नाम नहीं है. इसमें कम से कम तीन पीढ़ियां लगती हैं. हम इसके लिए पूरी तरह से तैयार हैं.’ मिशन विस्तार के तहत पार्टी बूथ स्तर पर संगठन खड़ा कर रही है. इस महत्वाकांक्षी योजना पर पंजाब और दिल्ली में गंभीरता से काम हो रहा है. इन शुरुआती झटकों से एक संकेत यह भी मिल रहा है कि शायद पार्टी अब लोकसभा चुनाव जैसी गलती से सबक सीख चुकी है.

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