बृज खंडेलवाल द्वारा
भला हो अंग्रेजी कवि डोम मोरेस का, (इनके पिताश्री फ्रैंक मोरिस भारत में पत्रकारिता जगत के एक महान स्तंभ थे, जिनकी एडिटोरियल्स सत्ता के गलियारों में भूचाल ला देती थीं)), जिन्होंने 2003 के जाड़ों की एक शाम मुझे एक भूले हुए अंग्रेज शख़्श के बारे में बताया, जिसने आगरा को अपनाया और शायद यहीं से दुनिया से बिदा ले गया। लौंग वॉकर के नाम से मशहूर ये अजीब कैरेक्टर टूरिज्म लिटरेचर का पहला राइटर रहा होगा।
ताजमहल के पोस्टकार्ड पर छाने से बहुत पहले, एक अजीबोगरीब अंग्रेज़ आगरा की गलियों में दाख़िल हुआ था—हाथ में एक लाठी, एक नोटबुक और अजीबो-ग़रीब सनक। उसका नाम था थॉमस कॉरिएट—वही शख़्स जिसने इंग्लैंड को खाने की मेज़ पर कांटे (fork) से रूबरू कराया।
कॉरिएट की बेचैन रूह उसे ईरान से होते हुए सूरत और फिर उत्तर की तरफ़ आगरा खींच लाई—जहाँ बादशाह जहाँगीर की सल्तनत का दरबार था। सन 1616 का आगरा संग-ए-मरमर के महलों, फैले हुए बाग़ों और रौनक़ से भरे कारवां सरायों से जगमगाता था, जहाँ काबुल, समरकंद और इस्फ़हान के सौदागर आपस में टकराते रहते थे। व्यापार से उलट, कॉरिएट मुनाफ़ा नहीं, बल्कि क़िस्से तलाश रहा था। जहाँगीर ने अपनी तुज़ुक़-ए-जहाँगीरी में इस अजनबी अंग्रेज़ का ज़िक्र किया—उसकी बातों की भूख और आराम को नकारने वाली फ़ितरत देखकर हैरान भी हुए, खुश भी।
आगरा से कॉरिएट ने अपने ख़त लंदन रवाना किए, जिनमें उसने शहर की ज़िंदगी और मुग़ल तामझाम का डिटेल्ड जिक्र किया। यही कुछ शुरुआती अंग्रेज़ी दस्तावेज़ हैं जिनसे यूरोप को हिंदुस्तान की झलक मिली—उस ज़माने से बहुत पहले जब ईस्ट इंडिया कंपनी ट्रेड से राजनीति की तरफ़ बढ़ी।
लेकिन आगरा ही उसकी आख़िरी मंज़िल भी साबित हुआ। बीमारी ने उसे घेर लिया और 1617 में वहीं उसका इंतक़ाल हो गया। उसकी क़ब्र वक्त की गर्द में कहीं गुम हो गई। उसे कम ही लोग याद करते हैं, मगर उसकी सैर ने दो दुनियाएं जोड़ दीं—इंग्लैंड की दावत की मेज़ और जहाँगीर का आगरा—एक सनकी मुसाफ़िर के ज़रिए।
थॉमस के विवरणों से पता चलता है कि सन 1615 का आगरा—मुग़ल सल्तनत का धड़कता दिल—शानो-शौकत, तामीरी हुस्न और अदबी नफ़ासत का शहर था। लाल क़िले की सरख़-गुलाबी दीवारें और ख़ुशबूदार बाग़ात इस आलमी तामीर का नक़्शा थीं। इन्हीं नक़्शों के दरमियान एक फ़क़ीरी हाल में भटकता हुआ दाख़िल हुआ थॉमस कॉरिएट—सॉमरसेट के गाँव ओडकॉम्ब का एक सनकी अंग्रेज़, जो साउथैम्प्टन से पाँच हज़ार मील पैदल चलकर जहाँगीर से मिलने पहुँचा। उसे लोग “ओडकॉम्बियन लेग- स्ट्रेचर” कहते थे—यानी टाँगें फैलाकर चलने वाला मुसाफ़िर।
कॉरिएट को शायद पहला “टूरिज़्म-राइटर” भी कहा जा सकता है। उसकी चिट्ठियाँ आगरा की रौनक़, उसके महलों और ख़ासकर तवायफ़ों के जलवे बयान करती हैं—वो तवायफ़ें जिनकी अदाएँ और अदब मुग़ल दरबार को मोहती थीं। डॉम मॉरिस ने अपनी किताब The Long Strider में लिखा है कि आगरा में कॉरिएट की मौजूदगी हमें उस शहर की तस्वीर देती है जहाँ रक़्स और रियाज़, तवायफ़ों की महफ़िलें और मुग़ल तामीर दोनों एक साथ उसे हैरान और मोहित (enchanted) करते रहे।
जहाँगीर का आगरा हिन्द-इस्लामी तामीर का शाहकार था। यमुना किनारे लाल पत्थर का क़िला—उसका अमर सिंह दरवाज़ा फ़नकारी नक़्शों और चमकीली टाइलों से सजता, दीवान-ए-आम में संग-ए-मरमर के स्तंभ लाजवर्द और अग़ी़क से जड़े हुए, शीश महल की दीवारें सितारों की तरह झिलमिलातीं। राम बाग़ के चहार-बाग़ नक़्शे, कमल-आकार फ़व्वारे और गुलाबों की पगडंडियाँ फ़ारसी जन्नत की याद दिलाते। किनारी बाज़ार और जोहरी मंडी में रौनक़ थी, जहाँ हवेलियों के झरोखे और मेहराबदार दरवाज़े ढलती धूप में चमकते। कॉरिएट ने आगरा को “शानो-शौकत के महलों और ख़ूबसूरत सड़कों का शहर” कहा—जो इंग्लैंड की तामीर को मात देता था।
उसकी नज़र ख़ासकर तवायफ़ों पर ठहरती। ये सिर्फ़ रक़्स और गीत की ख़ातून न थीं, बल्कि अदब और तहज़ीब की अलमबरदार थीं। बचपन से कथक, हिंदुस्तानी संगीत, उर्दू शायरी और आचार-संहिता में माहिर, उनकी कोठों से ग़ज़लों की सरगोशियाँ और पायल की छनक गूंजती। आम रंडियों से अलग, तवायफ़ें उमरा और दरबारी तबक़े की दिलनशीं थीं। कॉरिएट उनके हुनर से हैरान तो हुआ मगर अपनी ईसाई नज़रों से झिझका भी। एक ख़त में उसने लिखा—“मैंने ख़ूबसूरत ख़वातीन को ऐसा रक़्स करते देखा कि उनके पाँव ज़मीन को चूमते से लगते थे, और उनके नग़मे दिल में ऐसे ख़याल जगाते जिन्हें बयान करने की हिम्मत न थी।”
मगर आगरा की यही रंगीनियाँ कॉरिएट का फक्कड़पन के साथ मिलकर उसकी दास्तान बना गईं। फटेहाल कपड़ों में वह हाथी-गाड़ियों और बैलगाड़ियों के दरमियान घूमता, अंग्रेज़ सौदागरों से उधार माँगता और दावा करता—“मैं अजनबियों की रहमदिली पर ज़िंदा हूँ, लेकिन उन जगहों पर चलता हूँ जहाँ बादशाह बसते हैं।” उसने दीवान-ए-आम में फ़ारसी में जहाँगीर के सामने ख़िताब भी किया—उम्मीद में कि कुछ इनाम मिलेगा, मगर जहाँगीर की मुस्कराहट ही नसीब हुई।
1617 में बीमारी ने उसका काम तमाम कर दिया। उसकी क़ब्र का कोई निशान अब बाक़ी नहीं। मगर ओडकॉम्ब के चर्च में एक पट्टिका अब भी याद दिलाती है—”ग्रेट वॉकर” जिसने आगरा की तवायफ़ों और बुर्ज़ों की दास्तानें यूरोप तक पहुँचाईं।