कोलकाता का हाथ रिक्शा : मेहनत ज्यादा, मेहनताना कम

बहुत कम रिक्शावाले ऐसे हैं जिन्हें अपनी मेहनत का वाजिब हिस्सा मिल पाता है. एक दिन में इन्हें 150 से 250 रुपये ही हासिल होते हैं लेकिन इतनी कीमत के लिए इन्हें पूरे दिन धूप में तपना और पसीना बहाना पड़ता है और फिर शाम को इन्हीं पैसों में से एक बड़ा हिस्सा ये अपने मालिक को बतौर कमीशन अदा कर देते हैं.

 मानसून की सवारी

आप इन रिक्शों पर बैठकर कोलकाता की तंग और संकरी गलियों में घूमने का मजा ले सकते हैं. ऐसी गलियां जहां पर कार और दूसरे वाहनों को प्रवेश कभी-कभी नामुमकिन सा हो जाता है. ऐसी जगहों पर ये रिक्शावाले कोलकाता की निम्न मध्यम वर्ग और मध्यम वर्ग की जरूरतों को पूरा कर रहे हैं.

मानसून का समय आते ही इनकी मांग और बढ़ जाती है. उस समय परिवहन के दूसरे साधनों की आवाजाही बारिश में एकदम थम सी जाती है. यहां तक कि राज्यपाल जैसे उच्च पद पर आसीन व्यक्ति को भी इनकी ही मदद लेनी पड़ जाती है. इस मौसम में आप रिक्शावालों को कुछ भी ले जाते हुए देख सकते हैं. कभी इन पर सामान का बोझ लदा होता है तो कभी इन पर स्कूल से आते हुए बच्चे दिखाई पड़ जाते हैं. कुछ रिक्शावालों का तो कोलकाता के कुछ परिवारों से भी गहरा नाता जुड़ गया है. ऐसे में वह हर समय उनके लिए अपनी सेवाएं देने को तत्पर रहते हैं.

ऐसे ही एक रिक्शावाले हैं मोहम्मद खलील, जिनके दिन की शुरुआत तड़के ही हो जाती है. कभी-कभी इन्हें दोपहर को आराम करने का मौका मिल जाता है और फिर देर रात बीड़ी के कश के साथ ये अपना दिन खत्म करते हैं. खलील बिहार के मुजफ्फरपुर के रहने वाले हैं और बेनियापुकुर के अनवर हुसैन के डेरे में रहते हैं. 53 वर्ष के खलील 35 वर्षों से भी ज्यादा समय से रिक्शा चला रहे हैं. वहीं उनके बेटे दिल्ली में जामा मस्जिद के पास कपड़ों का बिजनेस करते हैं. खलील को अपने इस पेशे पर शर्म नहीं महसूस होती है. वह गर्व से इसे स्वीकारते हैं और कहते हैं कि बीमारी की हालत में भी वह रिक्शा चलाते हैं. वजह पूछो तो उनका जवाब होता है कि उन्हें यह अच्छा लगता है. 

भले ही खलील यह कहें कि उन्हें बीमारी की हालत में भी रिक्शा चलाना अच्छा लगता है लेकिन यह बात भी सही है कि यह बात कहीं न कहीं उनकी मजबूरी पर पर्दा डालने का काम करती है. परिवार से दूर खलील जैसे कई लोग रोजाना अपनी थकान मिटाने के लिए कभी जुआ खेलते हैं तो कभी शराब में अपना सुकून तलाशते हैं. कभी सेक्स वर्कर्स का सहारा लेते हैं तो कभी नशे की दूसरी आदतों से अपनी थकान को कम करते हैं.

वहीं दूसरी ओर अनवर हुसैन को ये कहने में गर्व महसूस होता है कि वह रिक्शा खींचने वालों के समूह के मालिक हैं. हालांकि उनके डेरे में पिछले कुछ वर्षों में रिक्शा चालकों की संख्या में कमी आई है. किसी जमाने में उनके डेरे में करीब 150 रिक्शावाले रहते थे लेकिन आज यह संख्या घटकर 50 रह गई है. अनवर कहते हैं, ‘रिक्शावालों की संख्या अब कम हो रही है. नई पीढ़ी का कोई युवा अब इस पेशे में नहीं आना चाहता है.’ अनवर सवाल उठाते हैं, ‘युवा अब इस पेशे में क्यों आएंगे जबकि कमाई के नाम पर तो कुछ नहीं मिलता. अगर कुछ मिलता है तो वह है गालियां और पुलिस की ओर से होने वाला शोषण.’ इस बीच हुसैन के पास एक फोन आता है. उन्हें बताया जाता है कि उनके एक रिक्शा को इसके चालक सहित पुलिस ने हिरासत में ले लिया है. कसूर सिर्फ इतना था कि वह रिक्शावाला उस सड़क से गुजर रहा था, जहां उसे रिक्शा ले जाने की अनुमति नहीं है. हुसैन कहते हैं, ‘कभी-कभी अतिरिक्त पैसे के लिए रिक्शावाले गलत गलियों में रिक्शा लेकर चले जाते हैं. उन्हें छुड़ाने के लिए जुर्माना अदा करना पड़ता है और फिर यह रकम उनकी आय से काट ली जाती है.’

बैटरी रिक्शा से उम्मीद

फिलहाल इन रिक्शावालों की उम्मीदें अब ‘पोरिबोर्तन’ का दावा करने वाली ममता बनर्जी की सरकार पर टिकी हैं. राज्य सरकार ने हाथ से खींचे जाने वाले रिक्शा को बैटरी चालित रिक्शा के साथ बदलने का एक उपाय तलाशा है. ऑल बंगाल रिक्शा यूनियन के उपाध्यक्ष मुख्तार अली कहते हैं, ‘बैटरी से चलने वाले रिक्शों का विचार काफी उम्मीदों भरा नजर आता है क्योंकि इन रिक्शों की मदद से रिक्शावालों के पास एक दिन में 300 से 400 रुपये तक कमाने का मौका होगा.’ उनके मुताबिक रिक्शों को हाथ से खींचने का काम बेहद थकान और मेहनत वाला है. निम्न आय वर्ग के लोगों के पास कोई और हुनर न होने के कारण उन्हें इसी पेशे पर निर्भर होना पड़ता है.

मुख्तार अली ने बताया कि कोलकाता में रिक्शावालों की संख्या में कमी आ रही है और शहर को और ज्यादा रिक्शा चालकों की जरूरत है. ऐसे में सरकार की इस तरह की पहल से युवा पीढ़ी भी इस पेशे की ओर से देख सकती है. हालांकि मुख्तार अली बदलते दौर के साथ रिक्शावालों के लिए ट्रेनिंग की भी पुरजोर वकालत करते हैं.

बैटरी वाले रिक्शा का ट्रेंड आने से शहर में लाइसेंस की व्यवस्था भी होगी. इतना तो तय है कि गैर-लाइसेंस रिक्शावालों की बढ़ती तादाद के बीच बैटरी वाले रिक्शों के लिए लाइसेंस हासिल करना हर किसी के लिए मुमकिन नहीं हो पाएगा.

वहीं इस मुद्दे पर मुख्तार अली इस बात का भरोसा दिलाते है कि लाइसेंसी और गैर-लाइसेंसी दोनों ही तरह के रिक्शावालों के पुनर्स्थापन के लिए एक वाजिब कार्यक्रम भी होगा. इस पूरे कार्यक्रम का लब्बो-लुआब यह है कि वह उम्रदराज व्यक्ति जो दशकों से रिक्शा चलाता आ रहा है या चलाना चाहेगा, वह इस नए विकल्प के अनुकूल होगा या नहीं. रिक्शा को हाथ से खींचने के इस काम की निंदा कई शब्दों के प्रयोग से कर सकते हैं लेकिन यह सत्य नहीं बदला जा सकता है कि स्वतंत्र भारत के पश्चिम बंगाल में रहने वाले अप्रवासियों के लिए रिक्शा खींचना ही फिलहाल उनके लिए कमाई का एकमात्र जरिया रहेगा. 

जैसे-जैसे यह तरीका बेकार होता जाएगा शायद यह व्यवसाय भी खुद की पहचान खोने लगेगा और लोग भी भुला दिए जाएंगे या फिर कहीं खो जाएंगे.