ईरान से इज़राइल तक तेल की ‘सीक्रेट पाइपलाइन’ की कहानी, कई साल तक चला कारोबार

यह गुप्त साझेदारी 1979 में ईरान की इस्लामी क्रांति के बाद खत्म हो गई। नई सरकार के आने के साथ ही ईरान और इज़राइल के रिश्ते पूरी तरह टूट गए और यह तेल परियोजना भी बंद हो गई।

ईरान और इज़राइल का सीक्रेट तेल व्यापार
ईरान और इज़राइल का सीक्रेट तेल व्यापार

नई दिल्ली: आज ईरान और इज़राइल एक-दूसरे के कट्टर विरोधी माने जाते हैं। लेकिन इतिहास का एक दिलचस्प अध्याय बताता है कि कभी दोनों देश चुपचाप तेल के कारोबार में साझेदार भी रहे थे। यह साझेदारी इतनी गुप्त थी कि कई साल तक दुनिया को इसकी भनक तक नहीं लगी।

यह कहानी 1960 के दशक के आखिर की है। उस समय पश्चिम एशिया में हालात तेजी से बदल रहे थे। जून 1967 में इजराइल और कई अरब देशों के बीच युद्ध हुआ। इस संघर्ष के बाद मिस्र ने स्वेज नहर को बंद कर दिया। यह नहर यूरोप और एशिया के बीच सबसे छोटा समुद्री रास्ता मानी जाती है। इसके बंद होने से क्षेत्र के कई देशों के लिए तेल और व्यापार के रास्ते मुश्किल हो गए।

स्वेज नहर बंद होने का असर इज़राइल पर भी पड़ा। देश के सामने तेल आयात का संकट खड़ा हो गया। दूसरी ओर ईरान, जो उस समय बड़ा तेल निर्यातक था, उसे भी अपने तेल को यूरोप तक पहुंचाने के लिए नया रास्ता चाहिए था। इसी जरूरत ने दोनों देशों को एक साथ आने पर मजबूर कर दिया।

1968 में एक गुप्त समझौते के तहत लाल सागर के इलात बंदरगाह को भूमध्य सागर के अश्केलोन बंदरगाह से जोड़ने के लिए एक पाइपलाइन बनाई गई। करीब 254 किलोमीटर लंबी इस पाइपलाइन के जरिए तेल को लाल सागर से सीधे भूमध्य सागर तक पहुंचाया जाने लगा। इससे जहाज़ों को अफ्रीका के लंबे समुद्री रास्ते से घूमकर जाने की जरूरत नहीं पड़ती थी।

इस पूरे कारोबार को दुनिया से छिपाने के लिए अलग-अलग विदेशी कंपनियों का सहारा लिया गया। तेल टैंकर अक्सर अपने गंतव्य के बारे में गलत जानकारी देते थे और चुपचाप इलात बंदरगाह पर पहुंचकर तेल उतार देते थे। वहां से पाइपलाइन के जरिए तेल अश्केलोन पहुंचाया जाता और फिर यूरोप के बाजारों तक भेज दिया जाता।

हालांकि इतना बड़ा ऑपरेशन ज्यादा समय तक पूरी तरह गुप्त नहीं रह सका। बाद में अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए की रिपोर्टों और शोधकर्ताओं की किताबों में इस परियोजना का जिक्र सामने आया।