
तहलका डेस्क।
नई दिल्ली/तिरुवनंतपुरम। केरल के हालिया चुनाव परिणामों ने जहां एक ओर सत्ता परिवर्तन की पटकथा लिखी, वहीं दूसरी ओर सरकार गठन की प्रक्रिया अब विवादों के साये में है। लोकतांत्रिक प्रक्रिया में जनादेश मिलने के बाद शीघ्र शासन की बागडोर संभालना एक नैतिक जिम्मेदारी होती है, परंतु राज्य में मुख्यमंत्री के चयन में हो रहा विलंब अब विपक्ष के तीखे हमलों का केंद्र बन गया है।
विपक्षी गठबंधन एलडीएफ ने इस देरी को जनता के निर्णय का अनादर करार देते हुए कांग्रेस और यूडीएफ की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्न खड़े किए हैं। एलडीएफ के वरिष्ठ रणनीतिकार टी. पी. रामकृष्णन का मानना है कि प्रशासनिक शून्यता की स्थिति में नीतिगत निर्णय लेना लोकतांत्रिक मर्यादाओं के प्रतिकूल है। आरोप है कि नई सरकार के औपचारिक रूप से कार्यभार संभालने से पहले ही स्थानांतरण और नियुक्तियों जैसे महत्वपूर्ण कार्यों में संगठन का हस्तक्षेप बढ़ गया है।
इसके अतिरिक्त, आवश्यक वस्तुओं, विशेषकर चावल की कीमतों में संभावित वृद्धि ने जनविरोधी नीतियों की आशंकाओं को जन्म दे दिया है। पूर्ववर्ती प्रशासन के दौरान जिस तरह कैबिनेट के माध्यम से कीमतों पर नियंत्रण रखा जाता था, उसकी तुलना में वर्तमान अनिश्चितता चिंताजनक है।
सत्ता पक्ष जहां मुख्यमंत्री के नाम पर आम सहमति बनाने में जूझ रहा है, वहीं नेता प्रतिपक्ष के चयन की जल्दबाजी पर भी सवाल उठ रहे हैं। संवैधानिक रूप से पहले सरकार का गठन और फिर प्रतिपक्ष की भूमिका स्पष्ट होनी चाहिए। एलडीएफ ने स्पष्ट किया है कि उनके खेमे में नेतृत्व को लेकर कोई अंतर्कलह नहीं है और माकपा की राज्य इकाई जल्द ही जिम्मेदारियों का बंटवारा कर लेगी।
हालांकि, गठबंधन के भीतर भाकपा जैसे सहयोगियों की आकांक्षाओं को आंतरिक संवाद के माध्यम से सुलझाना एक चुनौती जरूर है, जिसे सार्वजनिक विमर्श के बजाय मोर्चे के भीतर हल करने की आवश्यकता है।
अंततः, केरल की जनता एक स्थिर और क्रियाशील शासन की प्रतीक्षा कर रही है। सत्ता के गलियारों में चल रही यह खींचतान न केवल विकास कार्यों को बाधित कर रही है, बल्कि भविष्य की राजनीतिक स्थिरता पर भी प्रश्नचिह्न लगा रही है।



