खुद जज के सामने उतरे केजरीवाल, बिना डिग्री पैरवी कैसे? एडवोकेट एक्ट की धारा 32 का समझें पूरा मामला

दिल्ली हाईकोर्ट में एक अलग ही तस्वीर देखने को मिली, जब Arvind Kejriwal ने अपने केस में खुद ही दलील देने का फैसला कर लिया। आमतौर पर अदालत में वकीलों की दलीलें सुनाई देती हैं, लेकिन इस बार ‘पार्टी-इन-पर्सन’ बनकर केजरीवाल ने कानूनी गलियारों में नई बहस छेड़ दी है।

केजरीवाल ने खुद जज के सामने अपनी बात रखने की इच्छा जताई। फोटो: बिज़नेस स्टैंडर्ड (File Photo)
केजरीवाल ने खुद जज के सामने अपनी बात रखने की इच्छा जताई। फोटो: बिज़नेस स्टैंडर्ड (File Photo)

नई दिल्ली: सोमवार को दिल्ली हाईकोर्ट के एक कोर्ट रूम में माहौल तब बदला, जब केजरीवाल ने अपने वकीलों को पीछे रखते हुए खुद जज के सामने अपनी बात रखने की इच्छा जताई। यह कदम इसलिए खास है क्योंकि आम तौर पर अदालत में वही लोग बहस कर सकते हैं जो बार काउंसिल में रजिस्टर्ड वकील होते हैं। लेकिन कानून में एक ऐसा प्रावधान भी है, जो कुछ परिस्थितियों में किसी आम व्यक्ति को भी अपनी बात रखने की अनुमति देता है।

एडवोकेट एक्ट, 1961 की धारा 32 के अनुसार अदालत को यह अधिकार होता है कि वह किसी भी व्यक्ति को, चाहे वह वकील न हो, किसी खास मामले में पेश होकर दलील देने की अनुमति दे सकती है। हालांकि यह कोई मौलिक अधिकार नहीं है, बल्कि पूरी तरह कोर्ट के विवेक पर निर्भर करता है। यानी जज को अगर लगता है कि व्यक्ति अपने मामले को ठीक से समझा सकता है, तभी उसे यह अनुमति मिलती है।

इसके अलावा सिविल प्रक्रिया संहिता के तहत भी ‘पार्टी-इन-पर्सन’ का प्रावधान है, जिसमें कोई भी पक्षकार खुद अपनी पैरवी कर सकता है। लेकिन इसके लिए कुछ शर्तें होती हैं। कई बार अदालत यह सुनिश्चित करने के लिए सक्षमता प्रमाण पत्र या रजिस्ट्री से मंजूरी मांगती है, ताकि कोर्ट की प्रक्रिया और गरिमा बनी रहे।

केजरीवाल के मामले में एक बड़ा कानूनी पेच यह भी था कि अगर किसी व्यक्ति ने पहले से वकील रखा है, तो वह सीधे खुद बहस नहीं कर सकता। उसे पहले अपने वकील को औपचारिक रूप से केस से हटाना होता है। इस पर सॉलिसिटर जनरल Tushar Mehta ने आपत्ति भी जताई और कोर्ट को प्रक्रिया का पालन कराने की बात कही।

हालांकि केजरीवाल ने दलील दी कि जिस विशेष आवेदन पर वे बहस करना चाहते हैं, उसके लिए उन्होंने किसी वकील को नियुक्त नहीं किया है। इसलिए वे खुद अपनी बात रखने के हकदार हैं। उन्होंने यह भी बताया कि ‘पार्टी-इन-पर्सन’ होने के कारण उन्हें ई-फाइलिंग में दिक्कत आई, इसलिए उन्होंने हार्ड कॉपी स्वीकार करने का अनुरोध किया।

हालांकि इस तरह खुद पैरवी करने की भी सीमाएं हैं। कोई भी व्यक्ति इसे पेशे के रूप में नहीं अपना सकता और केवल एक विशेष मामले में ही अदालत की अनुमति से ऐसा कर सकता है। अगर अदालत को लगता है कि व्यक्ति प्रक्रिया का पालन नहीं कर रहा या कोर्ट का समय खराब कर रहा है, तो उसकी अनुमति तुरंत रद्द की जा सकती है।

यह मामला सिर्फ एक कोर्ट केस नहीं बल्कि एक बड़े कानूनी सिद्धांत की चर्चा को सामने लाता है। यह दिखाता है कि भारतीय कानून में आम व्यक्ति को भी अपनी बात रखने का अधिकार है, लेकिन उसके साथ जिम्मेदारी और नियमों का पालन करना भी उतना ही जरूरी है।