नई दिल्ली: अमेरिका और इजरायल की ओर से ईरान पर किए गए हमलों को अब चार दिन पूरे हो चुके हैं। इस दौरान ईरान ने जवाबी कार्रवाई में सैकड़ों मिसाइलें और ड्रोन दागे हैं, जिन्हें रोकने के लिए अमेरिका और उसके सहयोगी देशों ने लगातार एयर डिफेंस सिस्टम का इस्तेमाल किया। अब इसी को लेकर एक नई चिंता सामने आ रही है – क्या अमेरिका के पास मौजूद इंटरसेप्टर मिसाइलें खत्म हो सकती हैं?
अमेरिकी सेना के शीर्ष अधिकारी जनरल डैन केन ने बताया कि अब तक सैकड़ों बैलिस्टिक मिसाइलों को हवा में ही रोक दिया गया है। यह सैन्य सफलता जरूर मानी जा रही है, लेकिन इसकी कीमत भी भारी है। इन मिसाइलों को रोकने के लिए जो इंटरसेप्टर मिसाइलें इस्तेमाल होती हैं, वे बेहद महंगी होती हैं और इनकी संख्या सीमित होती है।
रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि अगर यह युद्ध कई हफ्तों तक चलता रहा, तो अमेरिका और उसके साझेदार देशों के लिए इंटरसेप्टर मिसाइलों की कमी एक गंभीर समस्या बन सकती है। एक थिंक टैंक की सीनियर एक्सपर्ट केली ग्रिको के मुताबिक, ऐसा खतरा है कि ईरान की मिसाइलें खत्म होने से पहले अमेरिका के पास इंटरसेप्टर मिसाइलें ही खत्म हो जाएं।
इजरायल के शुरुआती आकलन के अनुसार, ईरान के पास करीब 2500 बैलिस्टिक मिसाइलें हैं। यह संख्या अमेरिका और इजरायल के कुल इंटरसेप्टर स्टॉक से ज्यादा मानी जा रही है। हालांकि दोनों देश ईरान के मिसाइल लॉन्च ठिकानों और भंडारण केंद्रों को नष्ट करने की कोशिश कर रहे हैं, ताकि उसकी हमले की क्षमता को कमजोर किया जा सके।
ड्रोन भी एक बड़ी चुनौती बने हुए हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि ड्रोन गिराने में भी इंटरसेप्टर मिसाइलों का इस्तेमाल हो रहा है, जिससे भंडार पर और दबाव बढ़ रहा है। समस्या यह है कि अमेरिका जितनी तेजी से मिसाइलें इस्तेमाल कर रहा है, उतनी तेजी से उनका उत्पादन नहीं हो पा रहा।
रक्षा जानकारों का मानना है कि अगर यह जंग लंबी चली, तो अमेरिका को चीन और रूस जैसे देशों से निपटने के लिए जरूरी हथियारों के भंडार पर असर पड़ सकता है। यही वजह है कि इसे चीन और रूस के लिए “मौका” माना जा रहा है, क्योंकि अमेरिका का ध्यान और संसाधन मध्य पूर्व की जंग में उलझ सकते हैं।




