आत्महत्या का अनुबंध

श्रीमाली इस ओर भी ध्यान दिलाती हैं कि गरीब किसानों के लिए तय ऋण के एक बड़े हिस्से पर कॉरपोरेट खेती करने वाली कंपनियां कब्जा जमा लेती हैं. साथ ही कॉरपोरेट खेती के नाम पर बड़े पैमाने पर खेती करने के कारण उनके लिए ऋण लेने की राह आसान होती है. यही तथ्य मुंबई में रहने वाले अर्थशास्त्री आर. रामकुमार के हाल ही में किए गए एक अध्ययन में भी सामने आए, जिसमें उन्होंने वर्ष 2000 से बैंकों द्वारा खेती के लिए दिए ऋणों का अध्ययन किया था.

कॉरपोरेट खेती में अग्रणी आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और गुजरात जैसे राज्यों में खेती में उत्पन्न होती अस्थिरता और संकट की स्थिति साफ तौर पर इस ओर संकेत करती है कि कृषि में एफडीआई के क्या प्रभाव हो सकते हैं.  हैदराबाद स्थित सुंदरय्या विज्ञान केंद्र (एसवीके) द्वारा आंध्र प्रदेश और तेलंगाना के 88 गांवों में क्षेत्रवार सर्वेक्षण किया जा रहा है. सर्वेक्षण के संयोजक के. वीरैया का कहना है कि सर्वेक्षण में ऐसे तथ्य सामने आ रहे हैं, जो दिखाते हैं कि अनियंत्रित विदेशी पूंजी किस तरह का संकट पैदा कर सकती है. वीरैया कहते हैं, ‘कॉरपोरेट खेती किसानों के शोषण को तेज करने के अलावा खेती की शैली को भी प्रभावित करती है जिससे खाद्य सुरक्षा भी प्रभावित होती है.’

एसवीके ने अपने अध्ययन में तेलंगाना के वारंगल जिले में तेजी से बढ़ती किसान आत्महत्याओं को कॉरपोरेट खेती से जोड़ा है. इस नए गठित राज्य में जून 2014 से अब तक 1,750 किसान आत्महत्या कर चुके हैं. वारंगल के इन किसानों में से एक चौथाई एक बड़ी बहुराष्ट्रीय कॉरपोरेट खेती कंपनी की भारतीय शाखा द्वारा की गई ठगी का शिकार हुए थे. इस कंपनी ने अपने स्थानीय नेटवर्क के माध्यम से किसानों को काफी ऊंची कीमत पर बीटी कॉटन के बीज बेचे थे. बीज अच्छी किस्म के नहीं थे. इस कारण फसल भी उम्मीद के मुताबिक अच्छी नहीं हुई. कंपनी ने खराब किस्म के कपास को खरीदने से मना कर दिया और इस तरह एक बड़े घाटे के शिकार हुए किसानों में आत्महत्या का सिलसिला शुरू हो गया. आंध्र प्रदेश में भी कॉरपोरेट खेती का अनुभव बहुत अच्छा नहीं रहा. पश्चिम गोदावरी जिले के बी.वी. गुडेम गांव में गोदरेज ग्रुप की कंपनी ने ताड़ के तेल और कोका जैसी नकदी फसलों की कॉरपोरेट खेती शुरू की. इस खेती ने एक ऐसे बड़े भूभाग को घेर लिया जो इससे पहले धान की समृद्ध खेती के लिए जाना जाता था. एसवीके के अध्ययन के अनुसार इन नकदी फसलों ने लगभग 3000 एकड़ की धान की खेती की जगह ले ली है.

एक प्रचलित धारणा यह है कि कॉरपोरेटीकरण जाति प्रथा की जकड़नों को तोड़ देता है. लेकिन एसवीके का अध्ययन यह दर्शाता है कि गोदरेज ग्रुप ने प्रचलित जाति आधारित भेदभाव और प्रथाओं को मजबूत किया है जिसमें बंधुआ मजदूरी से मिलती-जुलती एक प्रथा भी शामिल है. गुंटूर जिले के कट्टावारिपलम गांव में भी गन्ने और कपास की खेती में अनुबंध आधारित खेती को अपनाया गया है. इससे पहले खेत मजदूरों को एक किलो कपास को तोड़ने के लिए 7 रुपये और एक किलो मिर्च तोड़ने के लिए 12 रुपये दिए जाते थे. लेकिन अनुबंध आधारित खेती के चलते दूसरे जिलों और राज्यों से खेती के लिए मजदूरों के आने के बाद मजदूरी क्रमश: 2.5 रुपये और 7 रुपये पर आ गई है. इस कारण स्थानीय मजदूर निराश होकर यहां से पलायन कर रहे हैं. आंध्र प्रदेश में भी कमोबेश यही हाल है. गुजरात जहां मोदी ने कॉरपोरेट और अनुबंध आधारित खेती को संस्थागत रूप दिया है, वहां भी कठिन श्रम और मजदूरी कम होने का यही कारण सामने आया है.

इस ओर भी ध्यान देने की जरूरत है कि ऐसे हालात में कॉरपोरेटीकरण के क्या प्रभाव होंगे जहां आरंभिक उत्पादक यानी किसान अपने उत्पादों से तैयार होने वाले प्रसंस्कृत उत्पादों की कुल कीमत का 10 प्रतिशत से भी कम प्राप्त कर पाते हैं. इसका यह भी अर्थ है कि कॉरपोरेट कंपनियां खेतों से कच्चा माल बहुत कम कीमत पर और अपने नियम एवं शर्तों पर उठाती हैं.

उदाहरण के लिए भारत में इस वर्ष रबड़ उत्पादन करने वाले राज्यों में किसानों ने सबसे अधिक आत्महत्या की है. ऐसा तब है जब भारत की सबसे बड़ी टायर कंपनी एमआरएफ ने इस वर्ष अप्रैल-जून की तिमाही में अपने कुल मुनाफे में 94 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की है. फूड एंड एग्रीकल्चरल आॅर्गनाइजेशन की रिपोर्ट ‘द स्टेट आॅफ फूड इनसिक्योरिटी इन द वर्ल्ड, 2015’ में भारत भुखमरी के शिकार देशों में पहले स्थान पर है. इसके बावजूद ‘न्यूनतम सरकार, अधिकतम सुशासन’ के नाम पर सरकार एक ओर लगातार सामाजिक कल्याणकारी योजनाओं को कम कर रही है और दूसरी ओर 2014-15 के वित्तीय वर्ष में हीरे और सोना उद्योगों को 75,592 करोड़ की भारी भरकम सब्सिडी देने में भी उसे कोई गुरेज नहीं.

जब नई दिल्ली में मोदी सत्ता में आए तब मुंबई की दलाल स्ट्रीट के ब्रोकर इस बात पर चर्चा कर रहे थे कि क्या वे वैसे कदम उठा सकते हैं जैसे 1980 में  इंग्लैंड में मारग्रेट थैचर ने उठाए थे. उस समय थैचर ने सभी मजदूर यूनियनों को कुचल कर मुक्त बाजार को जोर-शोर से बढ़ावा दिया था. परिणामस्वरूप बड़े व्यवसायियों को फायदा हुआ. क्या एफडीआई के रास्ते कॉरपोरेटीकरण के माध्यम से खेती के संकट को बढ़ाकर मोदी ‘थैचर चमत्कार’ के भारतीय संस्करण का सपना देख रहे हैं?