दूरदर्शन: एक स्वप्न भंग की दास्तां

इसी पृष्ठभूमि में जनहित को सर्वोपरि मानने वाले और लोगों के जानने और स्वस्थ मनोरंजन के अधिकार के लिए समर्पित लोक सेवा प्रसारण को मजबूत करने और आगे बढ़ाने की मांग होती रही है. इसकी वजह यह है कि इस मुद्दे पर अधिकांश मीडिया अध्येता और विश्लेषक एकमत हैं कि निजी पूंजी के स्वामित्व वाले जन माध्यमों की सीमाएं स्पष्ट हैं क्योंकि वे व्यावसायिक उपक्रम हैं, मुनाफे के लिए विज्ञापनदाताओं और निवेशकों के दबाव में कंटेंट के साथ समझौता करना उनके स्वामित्व के ढांचे में अंतर्निहित है और वे व्यापक जनहित और लोकतांत्रिक मूल्यों की उपेक्षा करते रहेंगे.

लेकिन इसके उलट अगर लोक सेवा प्रसारण को लोगों की उम्मीदों पर खरा उतरना है तो उसमें कार्यक्रमों के निर्माण से लेकर उसके प्रबंधन में आम लोगों और बुद्धिजीवियों/कलाकारों की सक्रिय भागीदारी जरूरी है. लेकिन पिछले कुछ दशकों में व्यावसायिक प्रसारण माध्यमों के बढ़ते वर्चस्व के बीच इस विचार को हाशिए पर ढकेल दिया गया था. यह मान लिया गया था कि व्यावसायिक प्रसारण के विस्तार और बढ़ोत्तरी में लोक सेवा की जरूरतें भी पूरी हो जाएंगी. यही कारण है कि देश में लोक प्रसारण सेवा की स्थिति संतोषजनक नहीं है. हालत यह हो गई है कि लोक प्रसारण के नाम पर राज्य और सरकार के नियंत्रण और निर्देशों पर चलने वाले दूरदर्शन और आकाशवाणी को न तो पर्याप्त संसाधन मुहैया कराए जाते हैं, न उन्हें सृजनात्मक आजादी हासिल है और न ही वे जनहित में प्रसारण कर रहे हैं.

इस आलोचना में काफी दम है कि वे सरकार के भोंपू में बदल दिए गए हैं और दूसरी ओर, उन्हें निजी प्रसारकों के साथ व्यावसायिक प्रतियोगिता में ढकेल दिया गया है. इस कारण लोगों में एक ओर उनकी साख बहुत कम है और दूसरी ओर, निजी प्रसारकों के साथ व्यावसायिक प्रतियोगिता में उनका इस हद तक व्यवसायीकरण हो गया है कि उनमें लोक प्रसारण सेवा की कोई विशेषता नहीं दिखाई देती है. इस प्रक्रिया में वे न तो लोक प्रसारण सेवा की कसौटियों पर खरे उतर पा रहे हैं और न ही पूरी तरह व्यावसायिक प्रसारक की तरह काम कर पा रहे हैं. यह कहना गलत नहीं होगा कि सत्तारूढ़ दल और नौकरशाही के साथ-साथ व्यावसायिक शिकंजे में उनका दम घुट रहा है.

सच यह है कि भारत में लोक सेवा प्रसारण के विचार के प्रति एक व्यापक सहमति, ध्वनि तरंगों (प्रसारण) को स्वतंत्र करने के बाबत सुप्रीम कोर्ट के फैसले और संसद में प्रसार भारती कानून के पास होने के बावजूद प्रसार भारती वास्तविक अर्थों में एक सक्रिय, सचेत और स्वतंत्र-स्वायत्त लोक प्रसारक की भूमिका नहीं निभा पा रहा है. हालांकि 70 और 80 के दशकों की तुलना में प्रसार भारती यानी दूरदर्शन और आकाशवाणी में बीच के दौर में सीमित सा खुलापन आया लेकिन इसके बावजूद उसकी लोक छवि एक ऐसे प्रसारक की बनी हुई है कि जो सरकार के नियंत्रण और निर्देशों पर चलता है और जहां नौकरशाही के दबदबे के कारण सृजनात्मकता के लिए बहुत कम गुंजाइश बची है.

हैरानी की बात यह भी है कि सार्वजनिक धन और संसाधनों से चलने वाली प्रसार भारती की मौजूदा स्थिति और उसके कामकाज पर देश में कोई खास चर्चा और बहस नहीं दिखाई देती है. उसके कामकाज पर न तो संसद में कोई व्यापक चर्चा होती है और न ही सार्वजनिक और अकादमिक मंचों पर कोई बड़ी बहस सुनाई देती है. यहां तक कि खुद प्रसार भारती के अंदर उसके कर्मचारियों और अधिकारियों में अपनी स्वतंत्रता और स्वायत्तता को लेकर कोई सक्रियता और उत्साह नहीं दिखाई पड़ता है.

इसके उलट कर्मचारी संगठनों ने प्रसार भारती को भंग करके खुद को सरकारी कर्मचारी घोषित करने की मांग की है. इसके पीछे वजह सरकारी नौकरी का स्थायित्व, पेंशन, आवास सुविधा आदि हैं. लेकिन इससे यह भी पता चलता है कि प्रसार भारती के कर्मचारियों में मौजूदा ढांचे और कामकाज को लेकर कितनी निराशा, उदासी और दिशाहीनता है. यहां तक कि प्रसार भारती कानून के मुताबिक न तो उसके बोर्ड का गठन हुआ और न ही उस कानून को ईमानदारी से लागू किया गया.

आज प्रसार भारती कानून को अमल में आए कोई 19 साल हो गए. इस बीच, उसकी दशा-दिशा तय करने के लिए अलग-अलग सरकारों ने कोई पांच समितियों का गठन किया. इनमें वर्ष 1996 में बनी नीतिश सेनगुप्ता समिति, वर्ष 1999-2000 में बनी नारायण मूर्ति समिति, वर्ष 2000 में बनी बक्शी समिति के अलावा यूपीए सरकार के कार्यकाल में गठित सैम पित्रोदा समिति का गठन किया गया लेकिन कहना मुश्किल है कि इन समितियों की रिपोर्टों पर किस हद तक अमल हुआ?

नतीजा, सबके सामने हैं. कहां तो प्रसार भारती को बीबीसी की तरह स्वायत्त, स्वतंत्र और लोकप्रिय बनाने का वायदा था और कहां दूरदर्शन निजी चैनलों की बदतर अनुकृति भर बनकर रह गया है. यह वैसे ही है जैसे बानर से नर बनने की प्रक्रिया में एक हिस्सा चिम्पांजी बनकर रह गया, वैसे ही दूरदर्शन, दूरदर्शन से बीबीसी बनने की प्रक्रिया में बदतर दूरदर्शन बनकर रह गया है.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और मीडिया अध्यापन से जुड़े हैं)

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