नई दिल्ली: अमेरिका ने भारत को रूस से तेल खरीदने के लिए 30 दिनों की अस्थायी छूट देने का ऐलान किया है। अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर जानकारी देते हुए कहा कि वैश्विक तेल सप्लाई को बनाए रखने के लिए अमेरिकी ट्रेजरी विभाग ने भारतीय रिफाइनरियों को यह सीमित अवधि की अनुमति दी है। हालांकि यह छूट केवल 30 दिनों के लिए है और इसका मकसद उन तेल सौदों को पूरा करना है जो पहले से समुद्र में फंसे हुए हैं।
दरअसल, अमेरिका ने रूस से तेल खरीदने को लेकर भारत पर अतिरिक्त 25 प्रतिशत टैरिफ लगा दिया था, जिससे कुल टैरिफ 50 प्रतिशत तक पहुंच गया था। बाद में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा था कि अगर भारत रूसी तेल आयात कम करेगा तो टैरिफ घटाकर 18 प्रतिशत किया जा सकता है। उन्होंने यह भी चेतावनी दी थी कि अगर रूस से तेल खरीद जारी रही तो टैरिफ फिर बढ़ाया जा सकता है। अमेरिका का कहना है कि उसका उद्देश्य यूक्रेन युद्ध के कारण रूस पर आर्थिक दबाव बनाना है।
अमेरिकी वित्त मंत्री ने अपने बयान में यह भी कहा कि भारत अमेरिका का एक महत्वपूर्ण साझेदार है और उम्मीद है कि भारत आने वाले समय में अमेरिकी तेल की खरीद बढ़ाएगा। साथ ही उन्होंने कहा कि यह फैसला वैश्विक ऊर्जा बाजार में स्थिरता बनाए रखने के लिए लिया गया है, क्योंकि ईरान और अमेरिका-इजरायल के बीच बढ़ते तनाव से तेल सप्लाई पर असर पड़ रहा है।
इसी बीच ईरान द्वारा होर्मुज़ स्ट्रेट को बंद करने की चेतावनी ने भी दुनिया की चिंता बढ़ा दी है। यह समुद्री रास्ता बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि दुनिया की करीब 20 प्रतिशत तेल सप्लाई इसी मार्ग से गुजरती है। भारत भी अपनी करीब 40 प्रतिशत तेल जरूरत इसी रास्ते से पूरी करता है। ऐसे में अगर यहां तनाव बढ़ता है तो भारत की ऊर्जा सुरक्षा पर असर पड़ सकता है।
अमेरिका के इस फैसले के बाद भारत में विपक्षी दलों ने मोदी सरकार पर निशाना साधा है। कांग्रेस नेता कपिल सिब्बल और पवन खेड़ा ने सोशल मीडिया पर सरकार की विदेश नीति पर सवाल उठाए हैं और इसे भारत के लिए असहज स्थिति बताया है।
हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि फिलहाल भारत के पास पर्याप्त तेल भंडार मौजूद है। सरकार के अनुसार देश के पास इतना कच्चा तेल है कि वह कई हफ्तों तक घरेलू जरूरतों को पूरा कर सकता है। इसके अलावा भारत पेट्रोलियम उत्पादों का बड़ा निर्यातक भी है, इसलिए जरूरत पड़ने पर निर्यात कम करके घरेलू आपूर्ति बनाए रखी जा सकती है। लेकिन अगर मध्य-पूर्व में युद्ध लंबे समय तक चला, तो इसका असर भारत समेत पूरी दुनिया के तेल बाजार पर पड़ सकता है।




