दिल्ली विधानसभा चुनावः आप की चुस्ती, भाजपा की सुस्ती

दरअसल आनेवाले समय में जिन भी राज्यों में चुनाव होनेवाले हैं या हो सकते हैं उनमें दिल्ली ही ऐसा है जहां आप के रूप में एक मजबूत विपक्ष भाजपा के सामने है. हाल ही में उत्तराखंड में हुए उपचुनाव भी बताते हैं कि जरूरी नहीं है कि क्षेत्रीय चुनावों में भी मोदी का जादू उतना ही चले जितना लोकसभा चुनावों में चला था. ऊपर से दिल्ली में पार्टी के सामने नेतृत्व की समस्या भी है. पिछले एक साल से भी कम समय में इस प्रदेश ने तीन-तीन पार्टी अध्यक्षों को देखा है. दिल्ली प्रदेश भाजपा के वर्तमान अध्यक्ष सतीश उपाध्याय का नाम अध्यक्ष बनने से पहले ज्यादातर लोगों ने नहीं सुना था. दिल्ली में पार्टी का सबसे विश्वसनीय चेहरा रहे डॉक्टर हर्षवर्धन एक ऐसी सरकार के कैबिनेट मंत्री हैं जिसमें एक-एक मंत्री कई-कई महत्वपूर्ण विभागों का काम संभाल रहे हैं. इन वजहों से दिल्ली में पार्टी संगठन की हालत फिलहाल जैसी है उसके चलते भाजपा के विधायक भी जल्द चुनाव में नहीं जाना चाहते.

जिन राज्यों में इसी साल चुनाव होने हैं उनमें महाराष्ट्र और हरियाणा तो हैं ही बिहार और उत्तर प्रदेश में होनेवाले उपचुनाव भी हैं. कहना गलत नहीं होगा कि भाजपा की सरकार अगर केंद्र में इतने जबर्दस्त बहुमत के साथ है तो उत्तर प्रदेश, बिहार इसकी सबसे बड़ी वजहों में से हैं. यहां की करीब 10-10 सीटों पर उपचुनाव होने हैं. वैसे तो उपचुनाव ज्यादातर सत्तासीन दल के पक्ष में जाते देखे गए हैं लेकिन जिस तरह की स्थितियां इन दो राज्यों में भाजपा के लिए बन गईं हैं उनके चलते इनका भी जबर्दस्त प्रतीकात्मक महत्व उसके लिए हो गया है.

जैसाकि आप को भी लगता है कि भाजपा अभी दिल्ली में ऐसा कुछ नहीं करना चाहती जिसका जरा भी बुरा असर चुनावों में जानेवाले राज्यों पर पड़े. लेकिन जरूरी हुआ तो इन राज्यों के चुनावों के बाद वह जोड़-जुगत से भी सरकार बनाने की सोच सकती है.

इसके अलावा भाजपा नेतृत्व और सरकार में एक सोच यह भी बन रही है कि कुछ समय में कई मोर्चों पर सरकार जो काम कर रही है उसके परिणाम आने शुरू हो जाएंगे जिससे उसके पक्ष में सकारात्मक माहौल बन सकता है. अभी महंगाई की दर काफी ऊपर है जो आने वाले समय में अपने आप और थोड़ा उसके प्रयासों से नीचे आ सकती है. भाजपा की केंद्र सरकार को लगता है कि भले ही वह केंद्रीय बजट के जरिये जनता में पिछली सरकार से खुद के अलग होने का संदेश मजबूती से नहीं दे पाई हो लेकिन आनेवाले समय में वह नए कानून बनाकर, अर्थव्यवस्था में सुधार के लिए जरूरी नये कदम उठाकर और निर्णय लेनेवाली सरकार बन-दिखकर सकारात्मक संदेश देने में सफल रहेगी.

भाजपा के अंदर एक सोच यह भी है कि अगर उसे आम आदमी पार्टी के भूत से हमेशा के लिए निजात पाना है तो ऐसा उसे दिल्ली में पटखनी देकर ही किया जा सकता है. नहीं तो वह बिलकुल केंद्र सरकार की नाक के नीचे एक ऐसा तिनका साबित हो सकती है जो वक्त-बेवक्त उसे असहज और उसके व्यवहार को असंतुलित बनाता रहे. भले ही दिल्ली एक पूरा राज्य न हो लेकिन यहां सत्तासीन होने का एक अपना सांकेतिक महत्व भी है. इन्हीं सब वजहों से यहां पार्टी एक नहीं बल्कि 10 बार फूंककर कदम रखते दिख रही है.

(इस लेख के कुछ हिस्से   ‘केजरीवाल इतनी जल्दी में क्यों हैं’ शीर्षक से वेबसाइट पर प्रकाशित हो चुके हैं.)

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