CBSE का बड़ा फैसला: 10वीं की पहली बोर्ड परीक्षा देना अब जरूरी

नई दिल्ली: कक्षा 10वीं की बोर्ड परीक्षा को लेकर केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड ने नई और सख्त गाइडलाइन जारी की है। बोर्ड ने साफ कर दिया है कि अब सभी छात्रों के लिए पहली बोर्ड परीक्षा में शामिल होना अनिवार्य होगा। अगर कोई छात्र पहली परीक्षा में लापरवाही करता है या कई विषयों में अनुपस्थित रहता है, तो उसे दूसरी बोर्ड परीक्षा में बैठने का मौका नहीं मिलेगा।

new rule
new rule

सीबीएसई के अनुसार, जो छात्र पहली बोर्ड परीक्षा में तीन या उससे अधिक विषयों में परीक्षा नहीं देता है, उसे दूसरी परीक्षा में बैठने की अनुमति नहीं दी जाएगी। ऐसे छात्रों को “एसेंशियल रिपीट” श्रेणी में रखा जाएगा। इसका मतलब यह है कि वे छात्र अगली बार सीधे अगले साल फरवरी में होने वाली मुख्य बोर्ड परीक्षा में ही शामिल हो सकेंगे।

हालांकि, जो छात्र पहली परीक्षा में शामिल होकर पास होते हैं, उन्हें अपनी परफॉर्मेंस सुधारने का मौका मिलेगा। ऐसे छात्र विज्ञान, गणित, सामाजिक विज्ञान और भाषा विषयों में से किसी भी तीन विषयों में सुधार परीक्षा (इम्प्रूवमेंट) दे सकते हैं। यह सुविधा केवल उन्हीं छात्रों को मिलेगी जिन्होंने पहली परीक्षा दी हो और पास होने के योग्य हों।

अगर किसी छात्र का पहली बोर्ड परीक्षा में परिणाम “कम्पार्टमेंट” आता है, तो उसे दूसरी बोर्ड परीक्षा में कम्पार्टमेंट श्रेणी के तहत बैठने की अनुमति दी जाएगी। यानी जिन छात्रों का एक या दो विषयों में कम्पार्टमेंट आया है, वे दूसरी परीक्षा देकर अपनी स्थिति सुधार सकते हैं।

सीबीएसई ने यह भी स्पष्ट किया है कि कक्षा 10वीं पास करने के बाद छात्र किसी भी तरह का अतिरिक्त या स्टैंड-अलोन विषय नहीं ले सकेंगे। बोर्ड का मानना है कि इससे परीक्षा प्रणाली में अनुशासन बना रहेगा और छात्र गंभीरता से पहली बोर्ड परीक्षा में शामिल होंगे।

बोर्ड अधिकारियों के मुताबिक, इस नई नीति का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि सभी छात्र पहली बोर्ड परीक्षा को हल्के में न लें और नियमित रूप से परीक्षा प्रक्रिया में भाग लें। इससे फर्जी या अधूरी उपस्थिति पर रोक लगेगी और परिणाम अधिक पारदर्शी होंगे।

सीबीएसई की यह नई व्यवस्था छात्रों के लिए एक सख्त लेकिन जरूरी कदम मानी जा रही है। अब छात्रों को पहली बोर्ड परीक्षा को बेहद गंभीरता से लेना होगा, क्योंकि आगे का रास्ता उसी पर निर्भर करेगा। यह फैसला आने वाले वर्षों में परीक्षा व्यवस्था को ज्यादा व्यवस्थित और अनुशासित बनाने में मदद करेगा।