बांग्लादेश के हालिया चुनाव में बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) की जीत के बाद पार्टी प्रमुख तारिक़ रहमान के बयानों और नीतिगत संकेतों पर भारत समेत पड़ोसी देशों की नजर बनी हुई है। चुनाव अभियान के दौरान बीएनपी ने नारा दिया था—“न दिल्ली, न पिंडी, न कोई और देश, बांग्लादेश सबसे पहले।” इस नारे को देश की स्वतंत्र विदेश नीति के संकेत के रूप में देखा जा रहा है।
चुनावी रैली में दिए गए भाषणों में तारिक़ रहमान ने कहा था कि उनकी राजनीति में बांग्लादेश की संप्रभुता और जनता के हित सबसे ऊपर रहेंगे। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि उनकी सरकार किसी बाहरी देश के प्रभाव में काम नहीं करेगी। साथ ही, उनके भाषणों में धार्मिक प्रतीकों और इस्लामी मूल्यों का उल्लेख भी प्रमुख रूप से दिखा, जिसे कुछ विश्लेषक घरेलू राजनीति में धर्म की भूमिका बढ़ने के संकेत के रूप में देखते हैं।
भारत-बांग्लादेश संबंधों को लेकर तारिक़ रहमान ने पहले कहा था कि शेख़ हसीना के कार्यकाल में हुए कुछ समझौतों में असंतुलन है और नई सरकार उन्हें “रीसेट” करना चाहती है। पानी बंटवारे जैसे मुद्दे, खासकर तीस्ता नदी समझौता, अब भी दोनों देशों के बीच संवेदनशील विषय बने हुए हैं। बीएनपी का मानना है कि अंतरराष्ट्रीय जल समझौतों के आधार पर बांग्लादेश को न्यायसंगत हिस्सा मिलना चाहिए।
भारत के लिए बांग्लादेश रणनीतिक रूप से बेहद अहम देश है। दोनों देशों के बीच लगभग 2,500 किलोमीटर लंबी सीमा है और व्यापार, बिजली, ईंधन और खाद्यान्न जैसे कई क्षेत्रों में भारत बांग्लादेश का बड़ा साझेदार है। ऐसे में नई सरकार की विदेश नीति की दिशा पर खास ध्यान दिया जा रहा है।
एक और अहम मुद्दा पूर्व प्रधानमंत्री शेख़ हसीना से जुड़ा है। बीएनपी नेताओं ने साफ किया है कि उनका प्रत्यर्पण एक राजनीतिक मांग बना रहेगा। शेख़ हसीना के भारत में रहने को लेकर भी बांग्लादेश की राजनीति में लगातार चर्चा होती रही है। माना जा रहा है कि यह विषय भारत और नई बांग्लादेश सरकार के रिश्तों में संवेदनशील मोड़ ला सकता है।
राजनीतिक विशेषज्ञों का कहना है कि बीएनपी सरकार भारत के साथ रिश्ते पूरी तरह खत्म नहीं करेगी, लेकिन वह ज्यादा संतुलित और सतर्क नीति अपना सकती है। नई सरकार की कोशिश होगी कि वह अमेरिका, चीन और पाकिस्तान जैसे देशों के साथ भी अपने संबंधों को संतुलित रखे और किसी एक देश पर निर्भर न दिखे।
इतिहास पर नजर डालें तो 1990 के दशक में बीएनपी सरकार और भारत के रिश्ते उतार-चढ़ाव से भरे रहे थे। सीमा, जल बंटवारा और सुरक्षा जैसे मुद्दों पर मतभेद सामने आए थे। अब एक बार फिर वही सवाल खड़े हो रहे हैं कि नई सरकार किस दिशा में आगे बढ़ेगी।




