बांग्लादेश के 13वें संसदीय चुनाव के नतीजों में अल्पसंख्यक समुदाय की भागीदारी को लेकर खास चर्चा हो रही है। इस चुनाव में हिंदू समुदाय से आने वाले चार उम्मीदवारों ने जीत दर्ज की है। खास बात यह है कि ये सभी विजेता उम्मीदवार बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) से जुड़े हुए हैं। वहीं, जमात-ए-इस्लामी की ओर से उतारा गया एकमात्र हिंदू उम्मीदवार चुनाव हार गया।
ढाका-3 सीट से BNP के वरिष्ठ नेता गायेश्वर चंद्र रॉय ने जीत हासिल की। उन्हें करीब 99 हजार वोट मिले, जबकि उनके प्रतिद्वंद्वी जमात उम्मीदवार को लगभग 83 हजार वोटों से संतोष करना पड़ा। यह इलाका कई शहरी और ग्रामीण हिस्सों को कवर करता है। हाल के समय में अल्पसंख्यक समुदाय पर हुए हमलों की खबरों के बीच उनकी जीत को एक मजबूत संदेश के तौर पर देखा जा रहा है।
मागुरा-2 सीट से BNP के उपाध्यक्ष निताई रॉय चौधरी ने भी बड़ी जीत दर्ज की। उन्हें लगभग 1 लाख 47 हजार वोट मिले, जबकि जमात उम्मीदवार को करीब 1 लाख 17 हजार वोट प्राप्त हुए। निताई रॉय चौधरी को पार्टी के भीतर अल्पसंख्यक समुदाय का एक प्रभावशाली चेहरा माना जाता है। उनकी जीत यह दिखाती है कि अल्पसंख्यक बहुल इलाकों में BNP का प्रभाव बना हुआ है।
इसके अलावा रंगामती सीट से अधिवक्ता दिपेन दीवान ने जीत दर्ज की। उन्हें लगभग 31 हजार वोट मिले और उन्होंने अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी को स्पष्ट अंतर से हराया। वहीं, बंदरबन सीट से साचिंग प्रू ने भी चुनाव जीतकर संसद में जगह बनाई। उन्हें करीब 1 लाख 41 हजार वोट मिले। इस तरह कुल चार हिंदू उम्मीदवार संसद पहुंचने में सफल रहे।
दूसरी ओर, जमात गठबंधन की ओर से खुलना-1 सीट से चुनाव लड़ने वाले कृष्ण नंदी को हार का सामना करना पड़ा। उन्हें 70 हजार से ज्यादा वोट मिले, लेकिन वे BNP उम्मीदवार को पछाड़ नहीं सके। इस चुनाव में जमात की ओर से उतारा गया कोई भी अल्पसंख्यक उम्मीदवार जीत नहीं सका।
कुल मिलाकर, इस चुनाव में हिंदू समुदाय से जुड़े चार उम्मीदवारों की जीत ने अल्पसंख्यक प्रतिनिधित्व को लेकर नई चर्चा छेड़ दी है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि नई सरकार अल्पसंख्यक समुदाय की सुरक्षा और अधिकारों को लेकर क्या कदम उठाती है।




