ASI की रिपोर्ट में कहा गया है कि परिसर से बड़ी संख्या में प्राचीन मूर्तियां, शिलालेख और स्थापत्य अवशेष मिले हैं। इनमें भगवान शिव, विष्णु, गणेश और वासुकी नाग की आकृतियों के प्रमाण सामने आए हैं। रिपोर्ट के अनुसार, करीब 1700 से ज्यादा कलाकृतियां मिली हैं, जिनमें स्तंभ, दीवारों के हिस्से, भित्ति चित्र और शिल्पकला के नमूने शामिल हैं। इन सभी का केमिकल ट्रीटमेंट कर वैज्ञानिक तरीके से अध्ययन किया गया है।
सर्वे में कई शिलालेख संस्कृत, देवनागरी और नागरी लिपि में पाए गए हैं। कुछ शिलालेखों में “श्री सरस्वत्यै नमः” जैसे शब्द दर्ज हैं, जो देवी सरस्वती से जुड़े होने की ओर इशारा करते हैं। रिपोर्ट में बताया गया है कि ये शिलालेख 11वीं–12वीं सदी के परमार काल से संबंधित हो सकते हैं। स्तंभों और पत्थरों पर कमल, बेलबूटे, कीर्तिमुख और देवी-देवताओं की आकृतियां भी दर्ज की गई हैं।
ASI ने यह भी उल्लेख किया है कि वर्तमान ढांचे में इस्लामी स्थापत्य के तत्व मौजूद हैं। फारसी और अरबी भाषा के कुछ अभिलेख मिले हैं, जो बाद के समय में इसे मस्जिद या दरगाह के रूप में उपयोग किए जाने का संकेत देते हैं। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि मस्जिद निर्माण में पुराने संरचनात्मक अवशेषों का दोबारा उपयोग किया गया हो सकता है।
ASI की रिपोर्ट ने भोजशाला को लेकर ऐतिहासिक और धार्मिक दोनों पहलुओं को सामने रखा है। अब अदालत के सामने दोनों पक्ष अपनी आपत्तियां दर्ज कराएंगे, जिसके बाद इस संवेदनशील मामले में आगे की कानूनी प्रक्रिया तय होगी। देशभर की नजरें इस फैसले पर टिकी हुई हैं।




