लोग गाते-गाते गरियाने लगे हैं!

बनारस में एक मोहल्ला है अस्सी और इस अस्सी में सामाजिक अड्डेबाजी का ठिकाना है पप्पू चाय की दुकान. पप्पू चाय की दुकान में बैठकर आप दुनिया-जहान की बातें कर सकते हैं और मोदी से लेकर बराक ओबामा तक खुलकर अपनी राय रख सकते हैं. आपको काउंटर करने वाले भी मिलेंगे और आपसे इत्तेफाक रखने वाले भी लेकिन ऐसी अड्डेबाजी फेसबुक पर क्यों नहीं है? यहां तो आपने जरा-सी भी नाइत्तेफाकी दिखाई कि लोग-बाग टूट पड़ेंगे और आप पर गालियों की इस तरह बौछार शुरू कर देंगे कि आपको वहां से निकल जाना ही बेहतर लगेगा. फेसबुक, ट्विटर और व्हाट्स एप ने आदमी को एक ऐसा हथियार मुहैया करा दिया है कि वह अपनी सारी भड़ास इसी माध्यम से व्यक्त करने लगा है. इस भड़ास में जहां ईर्ष्या है, द्वेष और जलन है तथा ये सारे के सारे कलुषों को बाहर कर देने का एक जरिया है. लेकिन बोला हुआ शब्द चाहे कम मार करे पर लिखा हुआ शब्द ज्यादा तीखी मार ही नहीं बल्कि ऐसी मार करता है जिसका असर तात्कालिक ही नहीं सालों तक दिखता है. आप कुछ भी ऐसा लिखिए जो लीक से हटकर हो तो पता चलता है कि तत्काल सोशल मीडिया में प्रतिक्रिया शुरू हो जाती है. कोई आपको देशद्रोही, धर्मद्रोही और जातिद्रोही बताने में लग जाता है तो कोई आपको प्रतिक्रियावादी, रूढि़वादी और लकीर का फकीर बताने में पूरा जोर लगा देता है. मजे की बात कि लिखा हुआ मैटर एक ही है लेकिन प्रतिक्रिया भिन्न स्रोतों से अलग-अलग. यानी कोई भी विवेकपूर्ण बात सुनने की या पढ़ने की क्षमता धीरे-धीरे नष्ट होती जा रही है. हमारे कान बस वही सुनना चाहते हैं जो हमें पसंद हो अथवा जो हमारी रुचि के अनुसार लिखा गया हो. मगर कुछ वर्षों पूर्व तक ऐसा नहीं था. तब काफी कुछ ऐसा लिखा जाता था जो हमारी धारणा के प्रतिकूल होता था मगर उसे पढ़ा जाता था और सधी हुई प्रतिक्रिया व्यक्त की जाती थी.

हमारे समाज का इस तरह एकरस हो जाना और उसकी विविधता खत्म हो जाने का एक कारण तो समाज में उत्पादक और अनुत्पादक शक्तियों में आया बदलाव है. हर समाज की संस्कृति उसके उत्पादन के साधन और उसकी भौगोलिक स्थिति से प्रभावित होती है. अब भौगोलिक स्थिति तो अचानक बदलती नहीं पर उत्पादन के साधन जरूर तेजी से बदल जाते हैं. आज जिस तरह मध्यवर्ग को अपनी लाइफ स्टाइल और मूल्यों को बनाए रखने के लिए दिन-रात जूझना पड़ता है और परिवार के हर सदस्य को आय का जरिया तलाशने पर जोर देना पड़ता है, उस वजह से उसकी आंतरिक खुशी में कमी आई है. अब प्रसन्नता का स्रोत उसे परिवार से नहीं बल्कि मनोरंजन के अन्य साधन तलाशने से मिलता है. भले वह बाहर जाकर खाना खाना हो अथवा मल्टीप्लेक्स में जाकर सिनेमा देखना, वह सब जगह एक भीड़ और भागमभाग देखता है जिस वजह से जीवन में एकरसता आने लगती है. सुबह उठकर ऑफिस के लिए घर से निकलने से लेकर शाम जल्दी घर पहुंचने तक वह बस एक ही चीज देखता है भीड़ और भागते हुए लोग. यह भीड़ और भागमभाग उसके जीवन से विवेक छीन लेता है और आदमी बस एक ही तरीके से सोचना शुरू करता है. इसमें उसके अपनी वैल्यूज होती हैं और अपनी तरह के तमाम ईगो और टैबू. वह कुछ भी अलग हटकर सोचना बंद कर देता है तथा ऐसी हर बात को खारिज कर देता है जो उसके वैल्यूज और भ्रमों को तोड़ता हो. इससे एक तरह की जड़ता आती है और एक ही समझ विकसित होती है. यह जड़ता और एकरस समझ उसे कुछ भी भिन्न देखते ही प्रतिक्रिया करने पर प्रेरित करता है और नतीजा होता है भड़ास.

असली चिंता उन लोगों की है जो अपनी एकांतिक सोच के कारण विवेक खोते जा रहे हैं. मनुष्य की एकांतिक सोच उसे समाज से काटती है. वह अपने मन की दुनिया में रहने लगता है जहां विरोध नहीं है, जहां उसके प्रतिकूल न तो कोई बात कही जाती है न कोई चरित्र उसकी मर्जी के बिना विचरण करता है. यह उसकी अपनी दुनिया तो है लेकिन यह दुनिया हकीकत नहीं बन सकती यह सिर्फ आभासी दुनिया रह सकती है जो वर्चुअल है और जिसमें सब कुछ सिर्फ ब्लिंक करता है. वास्तविक दुनिया में दुख है, शोक है, पीड़ा है और अकेलापन है मगर सुख भी अपार है और वह सुख जो वास्तविक है. मगर भागमभाग वाली जिंदगी आदमी को वास्तविक दुनिया से नहीं उस वर्चुअल दुनिया की तरफ धकेलती है जो झूठ और छद्म पर टिकी है. पर जो लोग इस आभासी दुनिया में पीड़ाएं और हकीकत को व्यक्त करते हैं उस पर ये सारे लोग हमले शुरू कर देते हैं जो झूठ और फरेब की अपनी दुनिया में अपने तरीके से ही मगन हैं.

(लेखक अमर उजाला के संपादक रह चुके हैं)

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