AQI संकट: हवा की घेराबंदी में

दिल्ली का वायु प्रदूषण संकट दरअसल पूरे देश में फैलते एक बड़े संकट की झलक है। राजधानी के साथ-साथ मुंबई, कोलकाता और बेंगलुरु जैसे शहरजिन्हें कभी उनकी भौगोलिक स्थिति या जलवायु के कारण सुरक्षित माना जाता था।

जिस समस्या को कभी कुछ असुविधाजनक “खराब हवा वाले दिन” कहकर नजरअंदाज कर दिया जाता था, वह आज एक लंबे और लगातार गंभीर होते सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट का रूप ले चुकी है। भारत के शहरों में जहरीला स्मॉग अब हर साल लौटने वाली हकीकत बन गया है। यह स्वास्थ्य सेवाओं पर भारी दबाव डाल रहा है, शासन की कमजोरियों को सामने ला रहा है और लोगों के सबसे बुनियादी अधिकार—साफ और सुरक्षित हवा में सांस लेने के अधिकार—को खतरे में डाल रहा है। यह संकट अब न तो कभी-कभार का है और न ही केवल मौसम तक सीमित है; यह गहराई से जड़ जमा चुका, स्थायी और राजनीतिक बन चुका है।

दिल्ली की सर्द सुबहों में सूरज अक्सर धूसर धुंध के पीछे से कमजोर-सा दिखाई देता है। स्कूली बच्चे चेहरे से बड़े मास्क पहनकर घर से निकलते हैं। बुज़ुर्ग अपनी सुबह की सैर छोड़कर घरों में सिमट जाते हैं, जो कभी उनकी रोज़मर्रा की दिनचर्या हुआ करती थी। वहीं अस्पताल पहले से जानते हैं कि सांस लेने में तकलीफ वाले मरीजों की संख्या बढ़ने वाली है। जो दृश्य कभी असामान्य थे, वे अब रोज़मर्रा की तस्वीर बन चुके हैं।

दिल्ली का वायु प्रदूषण संकट दरअसल पूरे देश में फैलते एक बड़े संकट की झलक है। राजधानी के साथ-साथ मुंबई, कोलकाता और बेंगलुरु जैसे शहरजिन्हें कभी उनकी भौगोलिक स्थिति या जलवायु के कारण सुरक्षित माना जाता था। अब तेजी से प्रदूषण की गिरफ्त में हैं। छोटे शहर भी अब इससे बच नहीं पा रहे। चिंता की बात यह है कि यह संकट उन इलाकों तक फैल रहा है जिन्हें हमेशा साफ हवा से जोड़ा गया। हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड जैसे पहाड़ी राज्य, जिन्हें लंबे समय तक प्राकृतिक शरणस्थल माना गया, अब खराब AQI दर्ज करने लगे हैं। इससे यह धारणा टूट रही है कि ऊंचाई अपने-आप साफ हवा की गारंटी होती है।

इसके उलट, दक्षिण भारत के कुछ हिस्से और उत्तर-पूर्व के कई राज्य अब भी तुलनात्मक रूप से बेहतर वायु गुणवत्ता दर्ज कर रहे हैं। ये अंतर इस बात को दिखाते हैं कि वायु प्रदूषण भूगोल, शहरी योजना, उद्योगों की मौजूदगी, नीतियों के अमल और जलवायु परिस्थितियों के आपसी असर से तय होता है। इससे एक साफ बात सामने आती है।वायु प्रदूषण कोई मजबूरी नहीं है, बल्कि हमारे फैसलों का नतीजा है।

दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में यह संकट सबसे साफ दिखाई देता है। घने स्मॉग के कारण AQI बार-बार “गंभीर” और “गंभीर-प्लस” स्तर तक पहुंच गया है, जिससे हर उम्र के लोग जोखिम में हैं। हालात बिगड़ने पर सरकार को ग्रेडेड रिस्पॉन्स एक्शन प्लान (GRAP-4) लागू करना पड़ा। इसके तहत आपात कदम उठाए गए—स्कूल बंद या हाइब्रिड किए गए, निर्माण कार्य रोके गए, वाहनों की आवाजाही सीमित की गई और कामकाज की व्यवस्था बदली गई।

फिर भी, इन सख्त कदमों के बावजूद अमल में लापरवाही सामने आई। , प्रबंधन आयोग ने दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान और उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिवों को पत्र लिखकर चिंता जताई कि दिल्ली-एनसीआर के कुछ स्कूल अब भी बाहर खेल गतिविधियां करवा रहे थे, जबकि सुप्रीम कोर्ट और आयोग के स्पष्ट निर्देश इसके खिलाफ थे। आयोग ने इसे आदेशों की भावना के विपरीत बताया और प्रदूषण के सबसे खराब महीनों में शारीरिक खेल प्रतियोगिताओं को टालने की अपनी अपील दोहराई।

आंकड़े स्थिति की गंभीरता साफ दिखाते हैं। इस मौसम के सबसे खराब दिनों में दिल्ली का AQI कई इलाकों में 500 के करीब पहुंच गया और कुछ जगहों पर इससे ऊपर भी चला गया। जहांगीरपुरी में यह 498 तक दर्ज हुआ, जबकि हरियाणा के बहादुरगढ़ सहित एनसीआर के कई हिस्सों में 460 से ऊपर के स्तर दर्ज किए गए। धुंध के कारण दृश्यता कम हो गई, रोज़मर्रा की आवाजाही खतरनाक बन गई और अस्पतालों में सांस, आंखों की जलन और पुरानी बीमारियों के बिगड़ने वाले मरीजों की संख्या तेजी से बढ़ी।

स्वास्थ्य विभाग ने लोगों को बिना मास्क बाहर न निकलने की सलाह दी, खासकर बच्चों, बुज़ुर्गों और पहले से बीमार लोगों को। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के आंकड़ों ने दिखाया कि खराब मौसम की वजह से AQI लगातार बढ़ रहा है। इसके बाद वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग की GRAP उप-समिति ने आपात बैठकें कर हालात की समीक्षा की।

मौसम वैज्ञानिकों के मुताबिक प्रदूषण में अचानक बढ़ोतरी का कारण सिर्फ उत्सर्जन नहीं, बल्कि मौसम की प्रतिकूल स्थिति थी। कमजोर पश्चिमी विक्षोभ के कारण हवा की रफ्तार कम हो गई, हवा की दिशा बदली, नमी बढ़ी और प्रदूषक जमीन के पास फंस गए। सर्दियों का कोहरा और स्मॉग मिलकर प्रदूषकों को फैलने से रोकते रहे और हवा और ज्यादा जहरीली हो गई।

हालात ‘गंभीर-प्लस’ स्तर पार करने पर पूरे एनसीआर में GRAP-4 के सभी नियम लागू कर दिए गए। ट्रकों की एंट्री रोकी गई, पुराने डीज़ल भारी वाहनों पर प्रतिबंध लगा, निर्माण गतिविधियां भी यहां तक कि सार्वजनिक परियोजनाएं भी रोक दी गईं और स्कूलों को हाइब्रिड मोड में चलाने का निर्देश दिया गया। राज्यों को कॉलेज बंद करने, गैर-जरूरी कारोबार रोकने और ऑड-ईवन जैसे कदमों पर भी विचार करने को कहा गया।

इन फैसलों का असर तुरंत दिखा। स्कूल ऑनलाइन हुए, दफ्तरों में वर्क-फ्रॉम-होम बढ़ा और खराब दृश्यता के कारण उड़ानें प्रभावित हुईं। आम लोगों में नाराज़गी और चिंता दोनों दिखी। कई लोगों ने कहा कि सरकार हर साल देर से कदम उठाती है और असली वजहों—वाहनों का धुआं, उद्योग, निर्माण की धूल और पराली जलाना पर स्थायी समाधान नहीं करती।

दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने सरकार का पक्ष रखते हुए कहा कि समाधान दिल्ली में रहते हुए ही निकालने होंगे। “मेरी दिल्ली, मेरी जिम्मेदारी,” कहते हुए उन्होंने कहा कि समस्या यहीं है और हल भी यहीं से निकलेगा।

डॉक्टरों का कहना है कि PM2.5 जैसे सूक्ष्म कणों के लंबे संपर्क से शरीर को गंभीर नुकसान होता है, खासकर बच्चों के फेफड़ों और दिल के मरीजों पर। पर्यावरण विशेषज्ञ मानते हैं कि GRAP जैसे कदम जरूरी हैं, लेकिन वे उस समस्या का पूरा हल नहीं हैं जो सालों की गलत योजना और कमजोर नियमों से पैदा हुई है।

वायु प्रदूषण अब केवल पर्यावरण का मुद्दा नहीं रह गया है। यह एक स्वास्थ्य आपातकाल, आर्थिक बोझ और शासन की बड़ी परीक्षा बन चुका है।

AQI कई हानिकारक तत्वों का माप है, जिनमें PM2.5 सबसे ज्यादा खतरनाक है। सर्दियों में पराली जलाना, वाहन, उद्योग, बिजली संयंत्र और ठहरा हुआ मौसम मिलकर जहरीली हवा बनाते हैं।

मुंबई और कोलकाता में समुद्री हवाएं थोड़ी राहत देती हैं, लेकिन लगातार निर्माण और ट्रैफिक हालात बिगाड़ते हैं। बेंगलुरु में तेज़ आबादी वृद्धि और कमजोर सार्वजनिक परिवहन इसका उदाहरण है। पहाड़ी शहरों में भी अब साफ हवा भरोसे की चीज नहीं रही।

प्रदूषण से सांस की बीमारियां, दिल की समस्याएं और मानसिक तनाव बढ़ रहे हैं। खेती, जंगल और जल स्रोत भी इससे प्रभावित हो रहे हैं।

सरकारी योजनाएं हैं, लेकिन कमजोर अमल उनकी ताकत घटा देता है। तकनीक मदद कर सकती है, लेकिन समाधान नहीं बन सकती।

आम लोगों के लिए यह संकट रोज़ की सच्चाई है—बच्चों को घर में बंद रखना, खांसी के साथ काम करना और साफ हवा की उम्मीद करना।

भारत आज एक अहम मोड़ पर है। विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन अब टाला नहीं जा सकता। साफ हवा को बहस नहीं, प्राथमिकता बनाना होगा।

समाधान सबको पता हैं। सवाल सिर्फ यह है—क्या राजनीतिक इच्छाशक्ति इस संकट के स्तर तक पहुंचेगी? तब तक लोग AQI देखकर ही तय करते रहेंगे कि सांस लेना सुरक्षित है या नहीं।