नई दिल्ली: ईरान, इजरायल और अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव का असर अब पूरी दुनिया के तेल बाज़ार पर साफ दिखाई देने लगा है। इसी बीच अमेरिका ने भारत को 30 दिनों तक रूस से तेल खरीदने की अस्थायी छूट दे दी है। इस फैसले के बाद कई सवाल उठने लगे थे, जिस पर अब अमेरिका की ओर से सफाई दी गई है।
अमेरिका के ऊर्जा मंत्री क्रिस राइट ने एक इंटरव्यू में बताया कि यह कदम सिर्फ अस्थायी है और इसका मकसद वैश्विक तेल बाजार में बढ़ते दबाव को कम करना है। उनका कहना है कि ईरान के साथ बढ़ते संघर्ष और होर्मुज स्ट्रेट में तनाव के कारण तेल की सप्लाई को लेकर अनिश्चितता बढ़ गई है। ऐसे में बाजार में तुरंत ज्यादा तेल उपलब्ध कराना जरूरी हो गया था।
ऊर्जा मंत्री के मुताबिक, यह फैसला रूस के प्रति अमेरिकी नीति में किसी बदलाव का संकेत नहीं है। उन्होंने साफ कहा कि यह केवल एक व्यावहारिक कदम है, ताकि अल्प समय के लिए तेल की सप्लाई बनी रहे और कीमतों में ज्यादा उछाल न आए। अमेरिका का मानना है कि इससे भारतीय रिफाइनरियों को तुरंत कच्चा तेल मिल सकेगा और वैश्विक बाजार में भी दबाव कुछ कम होगा।
दरअसल, हाल के दिनों में पश्चिम एशिया में युद्ध जैसे हालात बनने के कारण कच्चे तेल की कीमतों में तेजी से बढ़ोतरी हुई है। रिपोर्ट्स के मुताबिक युद्ध से पहले जहां कच्चे तेल की कीमत करीब 70 डॉलर प्रति बैरल थी, वहीं अब यह 90 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंच चुकी है। इसका सीधा असर दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाओं पर पड़ सकता है।
जानकारों का कहना है कि समुद्र में पहले से ही बड़ी मात्रा में रूसी तेल टैंकरों में लदा हुआ है। अरब सागर, बंगाल की खाड़ी और सिंगापुर के पास लाखों बैरल तेल जहाजों में मौजूद है, जो जल्द ही भारतीय बंदरगाहों तक पहुंच सकता है। इसी वजह से अमेरिका ने भारत से इस तेल को खरीदने की अपील की, ताकि बाजार में सप्लाई बनी रहे।




