‘स्त्री की आकांक्षा भी बेहतर दुनिया की आकांक्षा है’

महिला लेखन फिक्शन तक सीमित क्यों है? आलोचना, चिंतन तथा अन्य अध्ययनपरक विधाओं में महिलाएं उस तरह से नहीं लिख रही हैं जैसे कविता या कहानी?
महिलाएं फिक्शन ज्यादा लिख रही हैं, यह सही है. गद्य से पहले उन्होंने कविताएं और गीत लिखे. शिक्षा मिलने के साथ गद्य के क्षेत्र में उनका आना हुआ. गद्य चिंतन और विचार का क्षेत्र माना गया है. यह अधिक चुनौतीपूर्ण है. धीरे-धीरे स्त्रियां विचार के इस क्षेत्र में भी अधिक स्पेस लेंगी. अभी उन्हें शिक्षा मिले बहुत लंबा अरसा नहीं हुआ है, जबकि हमारी सभ्यता के पास ज्ञान की हजारों वर्ष की परम्परा है. जितना ज्यादा शिक्षा का प्रसार होगा, साथ ही जितना चेतना का विकास होगा, उतना ही विचार के क्षेत्र में हस्तक्षेप बढ़ेगा. मैं भी गद्य में कई अलग तरह के काम कर रही हूं. बहुत दिनों से मीरा पर काम कर रही थी, उनके पदों का एक नया पाठ तैयार करने की योजना है, इस वर्ष यह काम पूरा करने की कोशिश है. एक दूसरे उपन्यास पर भी काम जारी है. इसी के साथ कुछ ऐसी कहानियों को, जो फार्मूले से अलग स्त्री के समाजीकरण की प्रक्रिया को दिखाती हैं, उन्हें विमर्श की सैद्धांतिकी के साथ समझाने की कोशिश भी है.

आपकी कहानियों की स्त्रियां हमारे आसपास की स्त्रियां हैं. आपके पास तो फौज के भी गहन अनुभव हैं. क्या उनमें से कुछ खास अनुभव साझा करना चाहेंगी?
मेरी कहानियों की स्त्रियां हमारे समाज की संघर्षरत स्त्रियां हैं. इसीलिए ये पाठक को जानी-पहचानी लगती हैं. पाठक का ऐसी कहानियों के साथ एक पाठकीय रिश्ता बनता है. लेखक के लिए यह एक बड़ी पूंजी है कि पाठक उसकी कहानियों को अपना मानें. फौजी जीवन के अनुभवों का खजाना मेरे पास है. पर अभी मैं इस पर बहुत नहीं लिख पाई हूं. केवल एक कहानी ‘छावनी में बेघर’ में ही कुछ बातें कह पाई थी. इस कहानी में मैंने सैनिकों के मनुष्य जीवन की बात उठाई थी, उनकी हीरोइक छवि से अलग उनके मानवीय सुख, दुख, जिम्मेदारियां, चिंताएं और मुसीबत के वक्त फौजी परिवारों की आपसी सांझेदारियां, सहयोग… कारगिल युद्ध की पृष्ठभूमि इस कहानी में है. फौजियों का जीवन बहुत कठिन है. इसे आम आदमी समझता भी है पर भैतिकवादी दृष्टिकोण और बाजार ने आज धन को सर्वोच्च बना दिया है और त्याग, बलिदान जैसे मूल्यों को पीछे ढकेल दिया है. सैनिक चाहे अफसर हो या सिपाही, मेरे मन में उनके लिए बहुत सम्मान है.

क्या आपको लगता है कि फेसबुक जैसे सोशल मीडिया माध्यमों ने साहित्य को लोकतांत्रिक बनाया है. तमाम नए लोग इनके जरिये सामने आए हैं, आपको इसकी क्या कमियां या खूबियां नजर आती हैं?
सोशल मीडिया ने एक नया जनतांत्रिक स्पेस निर्मित किया है. यहां कोई भी अपनी बात कहने के लिए स्वतंत्र है. कई बार यहां बड़ी अच्छी बहसें उठ खड़ी होती हैं. बहस करते-करते कोई बीच से गायब भी हो सकता है, इसकी भी छूट है. कई बार ऐसे बेतुके झगड़े भी देखने को मिल जाते हैं, जिनसे जीवन की एक और समझ खुलती है. मनुष्य ऐसा ही है- तमाम अंतर्द्वद्वों से घिरा हुआ. इसकी खूबी यह भी है कि विवेक की परीक्षा यहां होती रहती है. और तमाम तरह के विचारों, सूचनाओं का पिटारा भी आपको यहां मिल जाता है. तमाम प्रतिभाएं ऐसी भी दिख जाती हैं, जिन्हें यदि जरा-सा मांज दिया जाए तो अद्भुत हो उठेंगी. व्यस्त जीवन में लोगों को कनेक्ट करने का एक बड़ा माध्यम तो यह है ही. मैं खुद भी इसके साथ जुड़ी हुई हूं. जल्दी ही एक ब्लॉग शुरू करने वाली हूं.

आपका पहला उपन्यास  ‘अन्हियारे तलछट में चमका’  अपने अनूठे कथ्य और शिल्प की वजह से चर्चा में रहा. उसे प्रेमचंद सम्मान से भी सम्मानित किया गया. एक कथा लेखक को उपन्यास लिखते समय किन चुनौतियों से जूझना पड़ता है.
यह कहा जाता है कि उपन्यास अधिक समय और उर्जा लेने वाली श्रमसाध्य विधा है, यह ठीक है, लेकिन श्रम तो कोई भी कर सकता है. असल बात है औपन्यासिक विजन, जिसके बिना उपन्यास नहीं सध सकता. जीवन को आप कितना समझते हैं? आपके अनुभव का दायरा कितना बड़ा है? विचार के स्तर पर क्या बन सका है, इतिहास बोध है भी या नहीं, पिछली और समसामयिक समस्याओं को किस तरह चिन्हित कर पाये हैं? इस तरह की बातों का उपन्यास के लिए बड़ा महत्व है. जीवन की गहरी समझ और विराट विजन मुझे उपन्यास के लिए जरूरी लगता है.

जहां तक ‘अन्हियारे तलछट में चमका’ की बात है तो यही कहूंगी कि बस, मेरी कोशिश इतनी थी कि जो बात कहना चाहती हूं, उसे खूब अच्छी तरह से कह पाऊं. समय बहुत लगा. केवल फाइनल ड्राफ्ट बनाने में लगभग एक वर्ष का समय लग गया. तकनीक नई थी तो शायद इसी से शिल्प भी बदलता चला गया. कहानी कहने के लिए आत्मकथा की तकनीक को भी इसमें मिला दिया. तमाम प्रविधियां घुलमिल कर एक नई प्रविधि की तरफ लेती गईं. यह भी अनायास ही हुआ. बस, कहने के तरीके की खोज में यह तरीका बनता गया. व्यापक पाठकीय प्रतिक्रियाओं ने मेरा हौसला बढ़ाया है. युवा वर्ग इसे अपने से कनेक्ट कर के देख रहा है, मुझे इसका भी सुकून मिल रहा है. दूर-दराज से पत्र, फोन और एसएमएस आ रहे हैं. एक महिला गाजियाबाद से मुझे ढूंढ़ते हुए आई, उन्होंने अखबार में उपन्यास के बारे में पढ़कर उपन्यास मंगवाया था. एक युवक ने उपन्यास के पहले चैप्टर की कुछ पंक्तियां एक सांस में सुना दीं और कहा कि वह भी ऐसा ही सोचता था. मुझे तसल्ली है कि इस उपन्यास के पात्र पाठकों को परिचित लग रहे हैं. बल्कि कई जगह पाठकों ने यह भी पूछा है कि ‘क्या ये पात्र जीवित हैं?’ इस पर मैं कहूंगी कि इस उपन्यास के पात्रों का जीवित या मृत व्यक्तियों से कोई संबंध नहीं है, पर दरअसल ये सब जीवित हैं, हमारे आस-पास हैं.

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here