‘प्रेम और प्रकृति की कविता वामपंथियों को रास नहीं आती’

खुद को अज्ञेय का छात्र बताने वाले ओम थानवी की भाषा पर उनके गुरु की छाप साफ साफ दिखती है. वे इसे स्वीकारते भी हैं. पिछले दिनों यात्रा-संस्मरण पर उनकी किताब ‘मुअनजोदड़ो’ आई थी जिसने काफी चर्चा बटोरी. अब उनके संपादन में ‘अपने-अपने अज्ञेय’ किताब वाणी प्रकाशन से छपकर आई है. अज्ञेय पर लिखे सौ से ज्यादा संस्मरण इसमें शामिल किए गए हैं. स्वतंत्र मिश्र से बातचीत में जनसत्ता के संपादक थानवी ने इस पहल और अज्ञेय के व्यक्तित्व पर विस्तार से बातचीत की

‘अपने-अपने अज्ञेय’  के कवर पर अज्ञेय की लिखावट में साहित्य के प्रकाशन के लिए पेड़ काटने की पीड़ा को दर्शाया गया है. फिर क्या जरूरत हुई कि आपने अज्ञेय पर लिखे लेखों को दो मोटे-मोटे खंडों में प्रकाशित करवाया?

 इस संग्रह में सौ से ज्यादा संस्मरण प्रकाशित किए गए हैं. लेख और समीक्षा कोई भी लिख सकता है. लेकिन संस्मरण वही लिख सकते हंै जो अज्ञेय के आस-पास रहे हों. मैंने आग्रह करके बहुत सारे संस्मरण लिखवाए हैं. अज्ञेय जब 75 साल के हुए तब कई लोगों ने उनके बारे में लिखा था. उनके निधन के बाद भी कुछ लोगों ने संस्मरण लिखे. मैंने यत्न किया तो पाया कि संस्मरणों की संख्या सौ पार चली गई. यह संयोग है कि हम अज्ञेय का जन्मशती वर्ष भी मना रहे हैं. मैं नहीं समझता हूं कि हिंदी या दूसरी भाषाओं में किसी लेखक पर सौ से ज्यादा लोगों ने संस्मरण लिखे होंगे. अज्ञेय के बारे में लिखने वाले लेखक भी बहुत महत्वपूर्ण लेखक और साहित्यकार हैं. ये केवल संस्मरण भर नहीं हैं. इसमें उनके साहित्य की आलोचना भी है. कई संस्मरणों में अज्ञेय की निंदा भी की गई है. यह कोई अभिनंदन ग्रंथ नहीं है. एक बड़े लेखक का जन्मदिन इस तरह से मनाया जा सकता था इसलिए मैंने इसे अंजाम तक पहुंचाया.

आपने किताब में लिखा है कि संस्मरण को साहित्य का दर्जा नहीं मिला है जबकि संस्मरण लिखना भी एक महत्वपूर्ण काम है. इसके पीछे क्या तर्क दिए जाते हैं?

 देखिए, साहित्य में जो खांचेबाजी होती है उसके चलते ही यह कहा जाता रहा है कि संस्मरण सृजनात्मक विधा नहीं है. आप देखेंगे कि साहित्य में जो पुरस्कार दिए जाते हैं उसमें कथा, कहानी, कविता या आलोचना को ही रखा जाता है. परंतु मैं ऐसा नहीं मानता. 

 

आप अज्ञेय को सबसे पेचीदा क्यों मानते हैं?

हां, मैंने ऐसा लिखा है. यह अपने आप में एक तरह से सही भी है. अज्ञेय के व्यक्तित्व में एक पेचीदगी थी. हालांकि उनके व्यक्तित्व में एक किस्म की सहजता भी थी. संजीदगी और गरिमा भी थी. मुझे उनके करीब रहने का मौका मिला. उनके साथ मैंने कई यात्राएं कीं. मैंने पाया कि वे मानवीय गरिमा से भरपूर व्यक्ति थे. पेचीदगी यह थी कि वे बहुत संवेदनशील थे. बहुत चुप रहते थे. हालांकि उनकी चुप्पी किसी घुन्ने व्यक्ति वाली नहीं थी. लेकिन उन्हें घुन्ना मान लिया जाता था. एक दफा एक बड़े आलोचक ने उन्हें मनहूस चिपांजी भी कह दिया था. जबकि मैंने उन्हें खूब हंसी, ठठ्ठा करते भी देखा है. मैं एक बार उनके साथ दिल्ली से लखनऊ रेलगाड़ी से गया. वे सामान रखने वाली जगह पर बैठ गए और पूरी नाटकीय भाव-भंगिमा के साथ उन्होंने अपने समय के कवियों की मिमिकरी करके दिखाई. हम पूरे रास्ते खूब हंसते रहे. उनके व्यक्तित्व की जो पेचीदगी है उसके कई सारे पहलू हैं जो एक जगह आकर जुड़ते हैं. उनमें कुछ परस्पर विरोध भी थे. लेकिन उनके करीब आप ज्यों-ज्यों पहुंचते हैं त्यों-त्यों उनके पेंच खुलते जाते हैं.

‘गुलशन नंदा की लोकप्रियता ओछी किस्म की है लेकिन अज्ञेय की सात्विक किस्म की है. इसके अच्छे और बुरे दोनों पहलू होते हैं’

अज्ञेय को लेकर जन्मशती समारोह, संस्मरण ग्रंथ सब कुछ हो रहा है. दूसरी ओर मुक्तिबोध को लेकर सुस्ती क्यों है?

मुक्तिबोध निस्संदेह बड़े कवि थे. इसको लेकर किसी को कोई संदेह नहीं है. 

अज्ञेय को बड़ा और मुक्तिबोध को छोटा करने की राजनीति चलाई जाती रही है. ऐसा लोग क्यों कहते हैं?

हमारे यहां की वामपंथी राजनीति ने बहुत सारे बड़े लेखक और आलोचक दिए. लेकिन साथ में बड़ी अजीबोगरीब राजनीति भी दी है. उस राजनीति का सिरा पकड़ना आसान नहीं है. अमेरिका के किसी भी अनुदान को बुरा माना जाता था लेकिन सोवियत भूमि के किसी भी अनुदान और पुरस्कार को बहुत श्रेष्ठ. इसी तरह से वे साहित्य को भी देखते थे. अगर उनके अनुकूल हो तो सब ठीक है अन्यथा सब गड़बड़ है. विचार में तब्दीली आती है. हो सकता है कि जो आज आप सोच रहे हैं कोई जरूरी नहीं है कि कल भी सोचें. आप जड़ नहीं होते हैं. लेकिन आप जब पार्टी के सदस्य बन जाते हैं तब आप प्रतिज्ञा कर लेते हैं. साहित्य में इस तरह के विचार नहीं चल सकते हैं. शुरू में अज्ञेय वामपंथी विचार से जुड़े रहे. सक्रिय कार्यकर्ता रहे. लेकिन बाद में वे जयप्रकाश नारायण, राम मनोहर लोहिया और अंतत: गांधी के करीब आ गए. अब वे वामपंथियों के लिए दुश्मन हो गए. यह कोई स्वस्थ विचार नहीं है. अज्ञेय को लेकर बड़ी बेकार-बेकार बातें हुईं. वे नपुंसक हैं और साथ ही उनकी जायज संतानें हैं. परस्पर विरोधी बातें. एक कवि और साहित्यकार का इन बातों से क्या लेना-देना? अगर एक बार ये बातें सच हों भी तब भी क्या मतलब रह जाता है. लेकिन लांछन लगाकर उनकी साहित्यिक गतिविधियों में बाधा पहुंचाई जाए. लेकिन ऐसा हुआ नहीं और ऐसा होता भी नहीं है. इसे मैं जातिवादी दृष्टिकोण कहना चाहूंगा. क्योंकि जात-पात करने वाले लोग यही तो करते हैं कि एक जाति के लोग दूसरी जाति को हीन बताकर आगे बढ़ना चाहते हैं. वे अपनी जाति के सदस्यों को आगे बढ़ाने के लिए हर छोटी-बड़ी बातों को अंजाम देते हैं. इस तरह की राजनीति करने वालों ने ही अज्ञेय को कभी मुक्तिबोध तो कभी नागार्जुन के बरक्स खड़ा करने की कोशिश की है. सच तो यह है कि मुक्तिबोध और अज्ञेय एक ही मंच से कविता पढ़ते थे. आप राजेंद्र शर्मा के संस्मरण में यह देख सकते हैं. मुक्तिबोध की मृत्यु पर अज्ञेय ने संस्मरण भी लिखा था. मुझे अज्ञेय के दस्तावेजों में वह संस्मरण मिला. मैंने उसे जनसत्ता में प्रकाशित भी किया था. उसे पढ़कर यह पता चलता है कि मुक्तिबोध का अज्ञेय कितना आदर करते थे. शमशेर बहादुर सिंह और केदारनाथ उनके पहले सप्तक तारसप्तक में शामिल थे. तार सप्तक में सात में से चार कवि तो वामपंथी विचारधारा के थे. इस किताब को पढ़कर पता चलेगा कि अज्ञेय ने नागार्जुन को भी सप्तक में शामिल होने के लिए आमंत्रित किया था. त्रिलोचन को भी आमंत्रित किया था. उनका वामपंथियों से कोई दुराव नहीं था. लेकिन अज्ञेय किसी एक खूंटे से बंधना नहीं चाहते थे. वे एक ऐसे लेखक थे जिसमें सब तरह की विचारधारा समा जाती है. अज्ञेय का यह स्पष्ट मानना था कि किसी की विचारधारा की वजह से आप किसी लेखक की कृति को पसंद या नापसंद नहीं कर सकते. पाब्लो नेरुदा मार्क्सवादी होते हुए प्रेम की कविता लिख सकते हैं लेकिन अपने यहां विचारवादी किस्म के लेखकों ने प्रेम और प्रकृति की कविता को असामाजिक करार दिया. अज्ञेय का विरोध करते-करते लोगों ने प्रेम और प्रकृति की कविताओं को खारिज कर दिया. इस तरह आप हिदुस्तान ही नहीं बल्कि चीनी और जापानी कविताओं को भी खारिज कर देंगे. प्रकृति या प्रेम की कविता कैसे असामाजिक कविता हो सकती है? क्या प्रेम और प्रकृति समाज का हिस्सा नहीं है? अज्ञेय की रुचि मनोविज्ञान, प्रेम और प्रकृति में थी, जो वामपंथी लेखकों को रास नहीं आती थी.

भारतीय समाज में या तो मूर्ति बनाने वाले लोग हैं या फिर मूर्तिभंजक. ऐसा विरोधाभास क्यों है?

किसी साहित्यकार को देवता बनाना ठीक नहीं है लेकिन उसे दानव की तरह पेश करना भी ठीक नहीं है. बड़े और महान साहित्यकारों में हजारों खोट हो सकते हैं और उन पर ध्यान दिया जाना चाहिए. लेकिन उसका कुछ अनुपात तो तय हो. आप कमियां निकालने में उनके मुख्य  अवदान को भूल जाते हैं. अज्ञेय को नापसंद करने वाले कुछ लेखकों ने मुझसे कहा कि आप तो उनके भक्त हैं. कुछ ने मुझे उनका अंधभक्त बताया. लेकिन कुछ लोगों ने कहा कि आपने यह काम बड़ी श्रद्धा के साथ किया है. मुझे नहीं पता कि इस देश में श्रद्धा कब से बुरी चीज हो गई? समर्पण का भाव होना और समर्पित होने में फर्क है. इसमें कोई शक नहीं है कि मेरे मन में अज्ञेय के प्रति श्रद्घा नहीं होती तो मैं इतनी मेहनत नहीं करता. पूरा साल नहीं लगाता. मैं मानता हूं कि मुझे हिंदी का जो भी ज्ञान है, उसमें अज्ञेय की बड़ी भूमिका रही है. मैं हिंदी का छात्र नहीं रहा हूं. अज्ञेय एक-एक शब्द को लेकर बहुत संवेदनशील रहते थे. मैंने अज्ञेय का साहित्य पढ़कर एक भाषा अर्जित की है. भला ऐसे में मैं अज्ञेय के प्रति कृतज्ञ क्यों न रहूं? मैं मानता हूं कि उनके भीतर महानता के तत्व ज्यादा हैं और मेरा ध्यान उसी ओर ज्यादा जाता है.

अज्ञेय पर हमेशा आरोप लगाए जाते रहे. आरोप लगाने वाले कौन हैं और वे ऐसा क्यों करते रहे?

किसी भी व्यक्ति को लांछित करने के लिए कुछ भी आरोप लगाए जा सकते हैं. अज्ञेय ने कभी अपने ऊपर लगे आरोपों का कोई जवाब नहीं दिया तो इसका जवाब मैं क्यों दूं. हां, उन्होंने एक बार इतना जरूर लिखा कि आपको जो करना था आपने किया. इन बातों से न ही आपका कुछ बिगड़ा और न ही मेरा. इतना कुछ किए जाने के बाद आप हिंदी पट्टी के घरों में जाइए किसी और साहित्यकार की किताबें मिलें या न मिलें लेकिन आपको अज्ञेय की दो-चार किताबें जरूर मिल जाएंगी. अज्ञेय का एक विशाल पाठक वर्ग है. हाल ही में आसनसोल (पश्चिम बंगाल) में अज्ञेय की जन्मशती का आयोजन किया गया. नामवर जी ने भीड़ देखकर कहा कि इतनी भीड़ तो आजकल चुनावी गोष्ठियों में ही होती है साहित्य की सभाओं में नहीं. अज्ञेय अगर इतनी भीड़ देखते तो शायद बेहोश हो जाते. शायद अज्ञेय की यही लोकप्रियता उन लोगों को चुभती है. उन्हें लगता रहा कि अज्ञेय खत्म हो जाएंगे. लेकिन स्थितियां आज इसके विपरीत हो गईं. सच तो यह है कि वे सही अर्थोंं में लोकप्रिय साहित्यकार हैं. गुलशन नंदा की लोकप्रियता एक ओछी किस्म की लोकप्रियता है लेकिन अज्ञेय की लोकप्रियता सात्विक किस्म की है. लोकप्रियता के अच्छे और बुरे दोनों पहलू हैं. अज्ञेय की लोकप्रियता दिनोंदिन बढ़ती गई. जन्मशती इस बात का प्रमाण है कि अज्ञेय को लेकर जितने आयोजन हुए उतने किसी लेखक को लेकर नहीं हुए. हमें नहीं पता कि आसनसोल में किसने आयोजन किया. न ही ओम थानवी ने, न ही अशोक वाजपेयी ने और न ही वत्सल निधि ने किया. मैंने तो यह खबर अखबार में पढ़ी. हां, कलकत्ता में हमने जन्मशती का आयोजन किया. वहां भी यह देखकर मुझे हैरानी हुई कि अज्ञेय का सम्मान गैरहिंदी प्रांत में भी बहुत ज्यादा है. एक अखबार ने लिखा कि अज्ञेय आयोजन में हिंदी के लोग कम बंगाल के लोग ज्यादा थे. बंगाली समाज यह मानने को तैयार ही नहीं है कि टैगोर के बाद कोई इतना बड़ा साहित्यकार हुआ है और वहां अज्ञेय की जन्मशती के आयोजन में हॉल खचाखच भरा होना उनकी लोकप्रियता का प्रमाण है. आयोजन में शंख घोष जैसे कवि पहुंचे जो किसी अन्य आयोजन में आते-जाते नहीं हैं. हाल ही में दादा साहब फाल्के से सम्मानित सौमित्र चटर्जी ने अज्ञेय की कविताओं का बांग्ला में पाठ किया. अर्पिता चटर्जी ने बांग्ला में उनकी कविता का पाठ किया. मंच पर सुनील गंगोपाध्याय भी मौजूद थे. जन्मशती वर्ष में उनकी लोकप्रियता और उजागर हुई है. यह सब अज्ञेय पर आरोप मढ़ने वाले लोगों को और चिढ़ाता है. एक वामपंथी लेखक ने यह भी लिखा है कि इस बात की जांच की जानी चाहिए कि अज्ञेय की विदेश यात्रा का खर्च किसने उठाया है अज्ञेय जी की विदेश यात्रा के पचास-साठ साल के बाद आप यह पूछें कि उसका खर्च किसने उठाया तो इससे हास्यास्पद बात क्या हो सकती है? पंकज बिष्ट ने अपनी पत्रिका ‘समयांतर’ में लिखा कि वामपंथियों को अज्ञेय की जन्मशती का विरोध करना चाहिए. उन्होंने तीन पेज की रिपोर्ट लिखी. उसमें अपील की कि लेखकों को कार्यक्रम में शिरकत नहीं करनी चाहिए. हम लोगों ने पंकज बिष्ट जी को आमंत्रित किया और वे कलकत्ता चले आए. आप देख सकते हैं कि इनकी कथनी और करनी में कितना अंतर है.