1973 में मुझे मोरक्को से भांग की तस्करी करने के आरोप में गिरफ्तार करके एचएमपी विनचेस्टर की जेल में डाल दिया गया। ये मेरी ज़िंदगी का सबसे कठिन और आशा-निराशा के बीच झूलने वाला समय था। इस वक्त मेरे जीवन के क्षितिज पर परिस्थितियों और मेरी मानसिक दशा के मुताबिक दो चीज़ें मुझे बार-बार दिखाई देती थीं—एक तो आज़ादी और दूसरी सज़ा। उसी दौरान मैं पहली बार रिक से मिला। वो छह फुट लंबा था लेकिन हृष्ट-पुष्ट होने की वजह से थोड़ा छोटा ही दिखता था। उसके कंधों से लेकर कलाइयों तक पर मौजूद मांसपेशियों के उभार किसी बलखाती नदी जैसा आभास देते थे। हाल ही में घुटे हुए सिर पर गहरे शहद के रंग की क्रेडिट कार्ड जितनी मोटाई की बालों की झाड़ी जैसी उगी हुई थी। उसकी आंखे छोटी, काली और उत्सुकता से भरी हुई थीं जो एक बेचैन मक्खी की तरह चारों ओर घूमती रहती थीं। उसके दांत छोटे और सफेद, मगर कई जगह से चटखे हुए और उखड़ी परतों वाले थे, जैसा कि उन्हें, उनकी कई कठोर चीज़ों से हुई मुठभेड़ों के चलते होना भी चाहिए था। रिक के दाहिने हाथ पर चमकीले नीले और लाल रंग के उड़ते हुए एक पक्षी का गुदना भी गुदा हुआ था।
जब मुझे, जेल की कोठरी और जिस आदमी के साथ इसे साझा करना था, दिखाए गए तो मुझे उस दिन ये, पहले से ही हो चुकी घटनाओं का चरम बिंदु जान पड़ा। बंद पसीना बहाने वाली गाड़ी में यात्रा, एक झूठा वकील, जमानत की अर्जी, अर्जी का ठुकराया जाना, दोबारा से रिमांड पर भेजा जाना और अंत में निराशा की पराकाष्ठा ये आदेश–एक ऐसे आदमी के साथ कमरे को साझा करने का, जिसके साथ मेरी कोई समानता ही नहीं थी। लेकिन उस शुक्रवार की शाम थका होने के कारण मैं किसी तरह का प्रतिरोध करने की हालत में नहीं था। मगर वहां शतरंज की बिसात देख कर मेरा रुख थोड़ा नर्म भी हो गया था। कम से कम हमारे बीच एक समानता तो थी ही। मगर अभी बहुत कुछ सामने आना बाकी था। उसने दुनिया के हर महाद्वीप की यात्रा की थी, एक सच्चे घुमक्कड़ की तरह और उसकी सारी दुनिया एक पिट्ठू बैग में सिमटी हुई थी।
मैं उस आदमी की डरावनी छवि से पहले से ही–उसे देख कर और उसके बारे में लोगों से सुनकर– वाकिफ था। उसके प्रति मेरी धारणा दो हफ्ते पहले उस वक्त और मजबूत हो गई थी जब उसने एक शर्त की वजह से 3 मकड़ियां, अनगिनत चीटियां और एक छोटा तिलचट्टा खा लिया था। आखिरी चीज़ को उसने दो बार में खाया था। जेल की चाय के साथ उसने अपने इस अजीबोगरीब नाश्ते को नीचे गटका और फिर एक लंबी डकार लेकर सिगरेट पीने बैठ गया था। मुझे लगा कि वो पागल है। जेल में आने के कुछ हफ्तों के भीतर ही वो तीन लोगों को अस्पताल पहुंचा चुका था। ऐसा करके उसने उनसे एक पुराना जेल से बाहर का हिसाब-किताब चुकता किया था।
प्रत्यक्षदर्शियों का दावा था कि उसने मुश्किल से ही कभी अपने हाथों का इस्तेमाल किया होगा। सारा काम उसका सर ही कर देता था। जेल के भीतर लोगों का मानना था कि अगर ब्रिटेन में सिर लड़ाने की कोई प्रतियोगिता हो तो वो उसे आराम से जीत सकता था। सप्ताहांत में कोठरी बदलने के आवेदन पर विचार नहीं किया जाता था। मैंने सोचा कि अगले दो दिन बहुत कठिन बीतने वाले हैं लेकिन मैं इसे बढ़िया से बढ़िया बनाने की पूरी कोशिश करूंगा। पहला झटका शतरंज के रूप में आया। मैं शतरंज काफी बढ़िया खेलता था मगर उसने पहला गेम बहुत ही आसानी से जीत लिया था। इसने मेरे अहम को चोट पहुंचाई जिसके चलते मैं एक और गेम खेलने के लिए तैयार था। दूसरा गेम मैंने अपनी पूरी काबिलियत के साथ खेला लेकिन फिर भी ये बिना किसी नतीजे के समाप्त हुआ।
उसके दोहरे व्यक्तित्व ने मेरी उत्सुकता को बढ़ा दिया था– शतरंज खेलने वाला एक सड़क छाप लड़ाका? मगर अभी बहुत कुछ सामने आना बाकी था। उसने दुनिया के हर महाद्वीप की यात्रा की थी, एक सच्चे घुमक्कड़ की तरह और उसकी सारी दुनिया एक पिट्ठू बैग में सिमटी हुई थी। उसकी रंगीन, खुराफात भरी कहानियां इतनी दिलचस्प थीं कि थकान से चूर-चूर हो चुकने के बाद भी मैंने देर रात तक सोने के बारे में सोचा तक नहीं।
रविवार को उसने एक बार फिर मुझे हैरत में डाल दिया। उसने अपनी जेब से एक पत्र निकाला और मुझसे उसे पढ़ने के लिए कहा। उसने कहा, "मैं पढ़-लिख नहीं सकता।" वो एक तरह के रोग का शिकार था जिसकी वजह से वो सिर्फ कुछ आकृतियां ही खींच सकता था। वो अपने दस्तखत कर सकता था लेकिन सिर्फ उसके आकार की स्मृतियों के आधार पर।
पिछली रात बातचीत के दौरान हमने किताबों के बारे में भी बातें की थीं और एक खास किताब ‘जेन एंड आर्ट ऑफ द मोटरसाइकल मेंटिनेंस’ में से उसने कुछ पंक्तियां भी उद्धृत की थीं। "भगवान बुद्ध किसी डिजिटल कंप्यूटर के सर्किट में या किसी मोटरसाइकल के गियर में भी उतनी ही सहजता के साथ मौजूद रहते हैं जितना कि किसी पर्वत के शिखर पर या फिर फूल की पंखुड़ियों में।"
और कुछ घंटे बाद, आज, वो मुझसे कह रहा था कि वो पढ़-लिख नहीं सकता। ये एक पहेली थी जो कुछ समय पश्चात खुद ही हल हो जाने वाली थी। दरअसल जब भी उसे किसी पढ़े-लिखे आदमी के साथ जेल की कोठरी में रखा जाता था तो वो उसे पढ़ने को कहता था। इस दौरान जो भी कहावतें, मुहावरे उसे अच्छे लगते वो उन्हें याद कर लेता था।
शाम को कोठरी में बंद किए जाने के बाद मैं उसे किताबें पढ़ कर सुनाने लगा। उस आदमी के प्रति मेरे मन में सहानुभूति पैदा हो चुकी थी जिसके जीवन में मैं बेहद अनिच्छा से मगर संयोगवश दाखिल हुआ था। इसके बाद सोमवार को मैंने अपनी कोठरी बदलने का आवेदन नहीं किया। हम अगले कई महीनों तक उसी कोठरी में साथ-साथ रहे। हम दोस्त बन चुके थे।
कृस कृष्णम्मा
(कृस 73 साल के हैं। टेनिस कोच रह चुके, "बैलड ऑफ द लेज़ी ‘एल’" नामक किताब के लेखक कृस, लंदन, गोवा और स्पेन में रहते हैं।)
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