उस दिन क्या हुआ ये देश में सबको पता है. 26 नवंबर की उस रात भारी-भरकम हथियारों से लैस 10 आतंकी एक नौका से गेटवे ऑफ इंडिया के पास उतर कर दो-दो लोगों के समूह में बंट गए. हर तरह के आधुनिक जेहाद के लिए प्रशिक्षित आतंकियों के ये समूह यहां से अपने लिए नियत अलग-अलग स्थानों की ओर बढ़ चले. इसके बाद पहली गोली कोलाबा में स्थित लियोपोल्ड कैफे में चली और आखिरी इसके तीन दिन बाद होटल ताज में. इस दौरान करीब पौने दो सौ निर्दोष लोग मारे गए और 400 के करीब घायल हुए.
दाते का ऑपरेटर गोली चलाने की हालत में नहीं था इसलिए वे अकेले मोर्चा संभाले हुए थे क्योंकि चौथी मंजिल पर महिलाओं और नवजात बच्चों के फंसे होने की वजह से इसके सिवा कोई और चारा ही नहीं था
मगर जो हुआ, उसको न होने देने या उसकी भयंकरता कम रहे, ऐसा करने के लिए क्या किया गया ये सबको नहीं पता. पुलिस को की गईं कॉल्स के रिकॉर्ड्स, जो कि तहलका के पास मौजूद हैं, बताते हैं कि जब आतंकी अपने नापाक इरादे पूरा करने में लगे हुए थे, तब पूरी तरह से मतिभ्रम की शिकार मुंबई पुलिस, अपने ही अफसरों की जान के प्रति लापरवाह बनी हुई थी. देखा जाए तो मुंबई एक ऐसा शहर है जो इससे पहले भी कई बार आतंक की गिरफ्त में आ चुका है. इसकी शुरुआत 1993 में हुए बम धमाकों से हुई थी. इसके चलते आर्थिक गतिविधियों के केंद्र वाले इस इलाके में राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड द्वारा प्रशिक्षित 50 कमांडो भी मौजूद रहते हैं मगर उनकी सेवाएं लेने का ख्याल किसी के दिमाग में आया ही नहीं. एक तथ्य ये भी है कि ऐसी स्थिति से निपटने के लिए मुंबई पुलिस ने एक निर्धारित प्रक्रिया (स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रॉसिजर) बना रखा है जो कि पुलिस आयुक्त के निर्देश पर अमल में लाई जाती है पर ऐसा कुछ भी नहीं किया जा सका.
पुलिस की ट्रांस्क्रिप्ट्स – पुलिस के द्वारा या उसको की गई हर कॉल रिकॉर्ड की जाती है – एक दिल दहला देने वाली सच्चाई बयान करती हैं. आतंकियों में से दो – अजमल कसाब और अबू इस्माइल – को सबसे पहले अत्यधिक भीड़भाड़ वाले छत्रपति शिवाजी टर्मिनस (सीएसटी) में के प्लेटफॉर्म नंबर 13 में जाते हैं और वहां से तभी बाहर निकलते हैं जब वे वहां मौजूद 37 लोगों को अपने आतंक की भेंट चढ़ा चुके होते हैं. इसके बाद दोनों टाइम्स ऑफ इंडिया की इमारत की ओर रुख करते हैं और कुछ ही मिनटों में कामा हॉस्पिटल में प्रवेश कर जाते हैं.
मुंबई पर हमला हुआ था और पुलिस कंट्रोल रूम में अफरा-तफरीका आलम था. रात में ठीक 10:29 बजे कामा हॉस्पिटल के बिल्कुल बगल में मौजूद आजाद मैदान पुलिस स्टेशन से साउथ कंट्रोल (मुंबई पुलिस कई इलाकों और जोनों में बंटी हुई है) में एक फोन किया जाता है जिस पर वहां मौजूद कॉल रिकॉर्ड्स के मुताबिक ये बताया जाता है कि ‘सीएसटी से निकले दो आतंकवादी आजाद मैदान की ओर जा रहे हैं’.
ऐसे संदेश बार-बार आते रहते हैं:
10:38 रात्रि: आजाद मैदान टू साउथ कंट्रोल अगेन: वे विशेष शाखा 1 के आफिस की ओर जाने वाली गली में पैदल जा रहे हैं.
10:39 रात्रि: बीट मार्शल टू साउथ कंट्रोल: हम पीठ पर बैग लादे जाते संदिग्ध व्यक्तियों को देख सकते हैं.
10:40 रात्रि: क्या आपको हमारा संदेश मिल गया कि यहां दो संदिग्ध लोग हैं.
10:54 रात्रि: पीटर एमआरआर टू कंट्रोल: टीओआई (टाइम्स ऑफ इंडिया) लेन में गोलियां चल रही हैं.
10:59 रात्रि: एलटी मार्ग टू कंट्रोल: आतंकवादी कामा (हॉस्पिटल) में पहुंच गए हैं.
एक विचित्र तथ्य ये भी है कि कसाब और इस्माइल ने आजाद मैदान पुलिस स्टेशन के अहाते में घुसकर एक पुलिस उपायुक्त, बृजेश के घर में प्रवेश करने की भी कोशिश की थी. ये दोनों जितनी आसानी से सीएसटी में मौत का खेल खेलने में कामयाब रहे थे शायद उसने इनकी हिम्मत को कई गुना ज्यादा कर दिया था. रिकॉर्ड्स से ये साफ है कि कंट्रोल रूम को रात 10:29 से (जब आजाद मैदान पुलिस स्टेशन ने उसे इस बारे में आगाह किया था) 10:59 तक (जब कसाब और इस्माइल कामा हॉस्पिटल में घुसे थे) आतंकवादियों के बारे में पल-पल की खबर थी. मगर इस दौरान सुव्यवस्थित तरीके से कुछ भी नहीं किया गया.
हालांकि कुछ पुलिस के अफसर इस बीच कोशिशें करते जरूर दिखे मगर ये उनकी खुद की पहल पर की गईं कोशिशें थीं, ऊपर से आए स्पष्ट निर्देशों का पालन नहीं. ऐसे ही अफसरों में से एक थे मुंबई सेंट्रल इलाके के प्रभारी अतिरिक्त पुलिस आयुक्त सदानंद दाते. हालांकि आतंकी हमले उनके इलाके में नहीं हो रहे थे फिर भी वर्ली डिवीजन से सूचना मिलने पर उन्होंने तुरंत कंट्रोल से संपर्क साध कर इस बाबत और जानकारी ली. इसके बाद उन्होंने अतिरिक्त पुलिस आयुक्त (दक्षिण) और संयुक्त पुलिस आयुक्त (कानून और व्यवस्था) को एक एसएमएस भेजा. उनसे सीएसटी जाने को कहा गया.
दाहिनी ओर से हमारी कार के ऊपर गोलियों की जबर्दस्त बौछार होने लगी. मैंने दो लोगों को एके-47 लिए हुए देखा. करकरे, काम्टे और सालस्कर सर ने भी फायरिंग शुरू कर दी26/11 के आरोप पत्र और दाते की बातचीत के विवरणों से हमें हैरान करने वाली जानकारियां मिली हैं. इसमें अधिकारियों की बदहवासी और जड़ता की झलक मिलती है. उस रात दाते ने जो अनुभव किया वो न केवल भयावह था बल्कि अति लापरवाही भी थी.
कसाब और इस्माइल रात के 10.59 बजे कामा पहुंचे थे जबकि दाते 11.05 बजे वहां पहुंचे. सीएसटी जाने का निर्देश मिलने के बाद वो पहले मालाबार हिल स्थित थाने पहुंचे जहां से उन्होंने एक कार्बाइन ली. वहा उन्होंने अपनी टीम के लिए बुलेट प्रूफ जैकेट्स की मांग की पर वे वहां उपलब्ध नहीं थी (सिर्फ दाते और उनके ऑपरेटर के पास बुलेट प्रूफ जैकेट थीं). सीएसटी के रास्ते में दाते की मुलाकात पुलिस इंसपेक्टर मोरे से हुई जिसने उन्हें स्पेशल ब्रांच-1 के पास हो रही फायरिंग और कामा अस्पताल में आतंकियों के घुसने की जानकारी दी. मोरे ने ये भी बताया कि आतंकियों ने अस्पताल की चौथी मंजिल पर मरीजों और नर्सो को बंधक बना लिया है.
जैसे ही दाते कामा अस्पताल में घुसे उन्होंने मुख्य दरवाजे पर दो लाशें पड़ी हुई देखीं. वहां चौकीदार ने उन्हें बताया कि चौथी मंजिल पर नर्सिग स्टाफ बार-बार मदद की गुहार लगा रहा है. दाते ने अपने ऑपरेटर को आदेश दिया कि वो कंट्रोल रूम को ताजा हालात की जानकारी दे दे. इसके बाद वो अपने साथियों के साथ छठवीं मंजिल पर पहुंच गए. वहां से उन्होंने लोहे की कोई चीज उठा कर उस छत की ओर उछाल दी जहां कसाब और इस्माइल पोजीशन लिए हुए थे. जैसे ही टुकड़ा छत पर गिरा वहां गोलियों की बौछार होने लगी. दाते और उनकी टीम ने छठवीं मंजिल के गलियारे में मोर्चा संभाल लिया और कंट्रोल रूम को आतंकियों की स्थिति और फायरिंग के बारे में ताजा जानकारी भी दे दी. रात 11.19 पर पहली बार सहायता भेजने का संदेश भेजा गया. उससे पहले दाते का विचार था कि वो और उनके साथी ये काम अकेले ही कर सकते हैं. अब पुलिस की लॉगबुक को ध्यान से पढ़िए, आपको पता चलेगा कि 11.19 पर पहली बार सहायता मांगे जाने के बाद क्या-क्या हुआ.
11:19 रात्रि: कामा अस्पताल में फायरिंग जारी है. तुरंत कमांडो भेजिए. सेंट्रल रीजन के सर यहां मौजूद हैं.
कंट्रोल: नोटेड
11:20 रात्रि: छठवें तल पर फायरिंग चल रही है. तुरंत सहायता भेजें.
11:20 रात्रि: सेंट्रल रीजन के वाकी टाकी से एक संदेश भेजा जाता है: बुलेट प्रूफ जैकेट की व्यवस्था करें.
कंट्रोल: नोटेड
11:23 रात्रि: दो-तीन धमाके हुए हैं. तुरंत सहायता पहुंचाएं.
11:25 रात्रि: साउथ कंट्रोल टू कंट्रोल: कामा के छठवें तल पर गोलीबारी हो रही है. सहायता की जरूरत है. नजदीकी स्ट्राइकिंग टीम को भेजें.
11:26 रात्रि: कामा के आस-पास स्ट्राइकिंग टीम की कमी है.
11:27 रात्रि: कामा पर स्ट्राइकिंग भेजें, आदमियों की कमी पड़ रही है.
11:28 रात्रि: (अब तक दाते काफी परेशान हो गए थे. वो और उनकी टीम घायल हो गई थी) सेंट्रल रीजन वॉकी टॉकी आपात संदेश भेजता है: भारी फायरिंग हो रही है.हम सभी घायल हैं. हमें सहायता चाहिए. कृपया सहायता भेजें.
तो छठें तल पर आखिर हुआ क्या जहां दाते और उनकी टीम ने पोजीशन ले रखी थी?
दाते का ऑपरेटर गोली चलाने की हालत में नहीं था इसलिए वे अकेले मोर्चा संभाले हुए थे क्योंकि चौथी मंजिल पर महिलाओं और नवजात बच्चों के फंसे होने की वजह से इसके सिवा कोई और चारा ही नहीं थाछठें तल के गलियारे में पोजीशन लेने के कुछ ही देर बाद आतंकियों ने एक ग्रेनेड फेंका. सब इंस्पेक्टर मोरे और दो जवान बुरी तरह से घायल हो गए. दाते की दाहिनी आंख में भी एक छर्रा लगा जिससे उन्हें उस आंख से दिखना बंद हो गया. दाते का ऑपरेटर गोली चलाने की हालत में नहीं था इसलिए वे अकेले मोर्चा संभाले हुए थे क्योंकि चौथी मंजिल पर महिलाओं और नवजात बच्चों के फंसे होने की वजह से इसके सिवा कोई और चारा ही नहीं था. 11.25 बजे दाते ने अपने ऑपरेटर और घायल जवानों को नीचे जाकर इलाज करवाने और साथ ही अतिरिक्त सहायता की व्यवस्था करने के लिए भी कहा.
मोरे और पीसी खांडेकर को नीचे नहीं भेजा जा सका क्योंकि वो जमीन पर बेहोश पड़े हुए थे. अगले 25 मिनटों तक दाते और आतंकियों (कसाब, इस्माइल) के बीच फायरिंग होती रही. एक बार फिर दाते को गोली लगी, उनका बायां पैर बुरी तरह से घायल हो गया. अब तक मध्य रात्रि हो चली थी. इसके बाद आतंकियों ने दाते की दिशा में एक और ग्रेनेड फेंका और वहां से कूच कर गए.
यहां कई ऐसे सवाल खड़े होते हैं जिसका जवाब मुंबई पुलिस को देना होगा.
पहला सवाल: आखिर समय से सहायता क्यों नहीं पहुंची? अगर सहायता समय पर पहुंच गई होती तो कसाब और इस्माइल कामा हॉस्पिटल से भागने में सफल हो ही नहीं सकते थे.
सवाल बेहद अहम है क्योंकि अगर कसाब और इस्माइल यहां से बाहर नहीं निकले होते तो एटीएस मुखिया हेमंत करकरे, अतिरिक्त पुलिस आयुक्त (पूर्वी क्षेत्र) अशोक काम्टे और एनकाउंटर विशेषज्ञ विजय सालस्कर आज जीवित होते.
दाते के बारे में थोड़ा और जान लें. जब उन्होंने दोनों आतंकियों को जाते हुए देखा तो उन्होंने संयुक्त आयुक्त (कानून व्यवस्था) और उपायुक्त पंचम जोन को ठीक बारह बजे एक एसएमएस भेजा जिसमें उन्होंने आतंकियों के जाने और उनके पास स्वचालित हथियार और ग्रेनेड होने की जानकारी उन्हें दी. उन्होंने आतंकियों के जाने के रास्ते के बारे में बताने के साथ अपने लिए सहायता की गुहार भी लगाई. खांडेकर और मोरे को भी सहायता की जरूरत थी क्योंकि वो अभी भी वहां अचेत पड़े हुए थे.
दाते बारह बजे से 12.45 मिनट तक इंतजार करते रहे पर न तो उन्हें कोई जवाब मिला न ही कोई उनकी सहायता के लिए ही आया. तब उन्होंने अपने यानी सेंट्रल रीजन के पुलिस उपायुक्त को फोन किया जो आकर उन्हें अस्पताल ले गए. खांडेकर और मोरे तब तक अपनी जान गंवा चुके थे. साउथ रीजन से कोई भी घायलों और मृतकों की सहायता के लिए नहीं आया था. किसी ने सहायता तक नहीं भेजी.
जब दाते, कसाब और इस्माइल से मोर्चा ले रहे थे करकरे, काम्टे और सालस्कर कामा अस्पताल की ओर आ रहे थे. वो दाते की सहायता के लिए नहीं आ रहे थे बल्कि दाते की तरह ही उन्हें भी किसी से पता चला था कि कामा में फायरिंग चल रही है इसलिए वो उधर आ गए थे.
पहले काम्टे को मुंबई के पुलिस आयुक्त हसन गफूर ने होटल ओबेरॉय जाने का आदेश दिया था मगर बाद में जेसीपी क्राइम राकेश मारिया, जो कि कंट्रोल रूम में थे, ने उन्हें कामा जाने को कहा. करकरे सीएसटी गए और वहां से पैदल ही कामा की ओर आ गए थे. सालस्कर के रास्तों का पूरा विवरण अरुण जाधव ने आरोप पत्र में दिया है – करकरे, काम्टे और सालस्कर के साथ जो कुछ हुआ उसका आंखो देखा विवरण जाधव ने दिया है क्योंकि वो भी उसी कार में था जिसमें बाकी तीनों थे. कसाब और इस्माइल ने कार पर फायरिंग करके तीनों की हत्या कर दी पर जाधव बच गया).
अपने प्राणों की आहुति देने वाले जवानों के परिजन इस बात से बेहद निराश और व्यथित है कि उनके तमाम आपात संदेशों पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दिखाई गईजाधव के बयान के मुताबिक उसे रात के 09.45 बजे कोलाबा में फायरिंग की सूचना उसके साथी अलक नूर ने दी. उसने उसे सालस्कर को सूचना देने के लिए भी कहा. सालस्कर ने जाधव से हथियार जारी करवा कर कोलाबा पुलिस स्टेशन पहुंचने को कहा. उसने एक कार्बाइन और 35 राउंड गोलियां ली और स्टेशन पहुंच गया. सालस्कर और नूर पहले से ही वहां थे. उन्हें कंट्रोल रूम से सूचना मिली थी कि कुछ लोग सीएसटी पर फायरिंग करके स्पेशल ब्रांच की ऑफिस की ओर जा रहे हैं, फिर वो लोग कामा में घुस गए. तीनों लोग एक कार में सवार होकर कामा की ओर चल पड़े, वहां उनकी मुलाकात काम्टे और करकरे से हुई जिन्होंने पहले से ही पोजीशन ले रखी थी. वो सभी कामा के पिछले गेट पर थे.
जल्द ही उन्हें एक घायल पुलिसवाला आता हुआ दिखाई दिया. इसी वक्त उनके ऊपर कामा की छत से जोरदार फायरिंग हुई. जाधव के मुताबिक काम्टे ने अपनी एके-47 से जवाबी फायर किया. पुलिसवाले ने बताया कि घायल दाते छठी मंजिल पर पड़े हुए हैं. करकरे, काम्टे और सालस्कर ने तुरंत ही मुख्य गेट की ओर जाने का फैसला किया. उन्हें पता था कि कसाब और इस्माइल मुख्य दरवाजे से भागने की कोशिश करेंगे (पूरे कामा परिसर में निकासी के कई रास्ते हैं लेकिन कसाब और इस्माइल जिस जगह पर थे वहां से सिर्फ मुख्य दरवाजे के रास्ते ही निकला जा सकता था).
मुख्य गेट की ओर जाने से पहले ही उनकी नजर पुलिस की कैलिस जीप पर पड़ी जो कि पैधुनी पुलिस स्टेशन की थी. सालस्कर ड्राइवर की सीट पर बैठे, काम्टे उनके बाएं और करकरे पीछे की सीट पर. जाधव और तीन दूसरे लोग पिछले दरवाजे से पीछे की सीटों पर जा बैठे. जब उनकी कार स्पेशल ब्रांच-1 की तरफ बढ़ रही थी उसी वक्त कंट्रोल रूम से सूचना मिली कि दोनो आतंकी रंग भवन लेन के पास लाल रंग की कार की ओट में हैं. काम्टे ने सालस्कर को गाड़ी लेन की तरफ ले चलने के लिए कहा. रंग भवन लेन में जो कुछ घटनाक्रम हुआ उससे पहले हम ये जान लें कि उस वक्त क्या हुआ था जब करकरे, काम्टे और सालस्कर कामा के पिछले दरवाजे पर थे. दाते के बयान और उसके कॉल रिकॉर्ड से ये बात तो साफ हो गई कि कसाब और इस्माइल आधी रात के बाद कामा से बाहर निकले जब दाते ने एसएमएस किया था.
उसके पहले 11.19 बजे एटीएस के मुखिया करकरे (जिनका कूट नाम था विक्टर) ने एक आपात संदेश जारी किया था.
11.19 रात्रि
विक्टर टू कंट्रोल: हम कामा हॉस्पिटल पर हैं.
यहां फायरिंग चल रही है. पिछले पांच मिनटों में हमारे सामने तीन-चार ग्रेनेड फटे हैं. घेराबंदी करना जरूरी है. हम स्पेशल ब्रांच ऑफिस के पास ही हैं. एक टीम कामा अस्पताल के मुख्य दरवाजे पर भेजी जाए और उन्हें हमसे संपर्क में रहने के लिए कहा जाए ताकि आपस में क्रॉस फायरिंग न हो. प्रसाद (जेसीपी कानून व्यवस्था, ये भी मारिया के साथ कंट्रोल रूम में ही थे) वहां होंगे. उन्हें सेना से बात करने का आदेश दिया जाए और यहां कमांडो भेजे जाएं. कंट्रोल रूम संदेश को सुनिश्चित करते हुए पूछता है, ‘सर, बिल्डिंग के सामने, राइट ?’ इसके कुछ ही मिनट बाद एक और आपात संदेश भेजा गया
वो बड़ी मुश्किल से जेसीपी राकेश मारिया को इस बात के लिए राजी कर पायीं कि वो एक बयान जारी कर ये स्वीकार करें कि उनके पति ने ही कसाब को घायल किया था
11.28 रात्रि, विक्टर टू कंट्रोल रूम: एटीएस, त्वरित प्रतिक्रिया बल और क्राइम ब्रांच की टीमें स्पेशल ब्रांच के पास हैं. हमें कामा को घेरना होगा. प्रसाद को सेना से बात करने के लिए कहा जाए.
11.30 रात्रि: नोटेड
दाते को बचाने के लिए सहायता नहीं पहुंची. न ही करकरे, काम्टे और सालस्कर को बचाने कोई पहुंचा.
दूसरा सवाल: आखिर मुख्य गेट (सिर्फ यही निकास था जिससे कसाब और इस्माइल निकल सकते थे) को क्यों नहीं घेरा गया?
सबसे पहले तो कसाब और इस्माइल से टैरेस पर ही निपटा जा सकता था पर ऐसा हुआ नहीं.
इसके बाद उन्हें कामा से बाहर निकलने से रोका जा सकता था पर करकरे के बार-बार संदेश दिए जाने के बावजूद ऐसा नहीं हो सका. मुंबई पुलिस का मुख्यालय कामा से थोड़ी ही दूर है. आखिर अतिरिक्त सहायता क्यों नहीं पहुंच सकी? मुख्य दरवाजे पर कब्जा क्यों नहीं किया गया? अगर अतिरिक्त सहायता भेजकर कामा हॉस्पिटल के मुख्य दरवाजे को घेर लिया गया होता तो करकरे, काम्टे और सालस्कर को अपनी जान नहीं गंवानी पड़ती. वे निश्चित ही 11.20 से लेकर आधी रात तक वहीं थे.
तीसरा सवाल: आखिर पूरे 40 मिनट क्यों बर्बाद किए गए? (आईसी 814 के अपहरण के दौरान आपदा प्रबंधन समूह जहाज को अमृतसर में रोकने में असफल रहा. ये चूक बहुत महंगी पड़ी. जहाज कांधार जा पहुंचा और सभी यात्रियों को तीन खूंखार आतंकवादियों की रिहाई के बाद ही छुड़ाया जा सका.)
बिना किसी दबाव या रोक-टोक के कसाब और इस्माइल मुख्य दरवाजे से टहलते हुए बाहर निकल गए और बिल्कुल आजादी से रंग भवन लेन की ओर बढ़ चले. यहां वो पेड़ों की झुरमुट के पास खड़ी एक लाल रंग की कार की ओट में जा खड़े हुए. कंट्रोल रूम से इसकी सूचना मिलने के बाद काम्टे ने सालस्कर को रंग भवन लेन की ओर गाड़ी ले चलने का आदेश दिया था. उनकी कैलिस लाल रंग की कार से बमुश्किल 100 से 150 मीटर दूर थी. तभी इनके ऊपर गोलियों की झड़ी लग गई. जाधव के बयान के मुताबिक, ‘दाहिनी ओर से हमारी कार के ऊपर गोलियों की जबर्दस्त बौछार होने लगी. मैंने दो लोगों को एके-47 लिए हुए देखा. करकरे, काम्टे और सालस्कर सर ने भी फायरिंग शुरू कर दी. मेरे बाएं हाथ और कंधे में गोली लग गई, मेरी कार्बाइन हाथ से गिर गई जिसे मैं उठा नहीं सका.’
गोलियों की झड़ी के बीच काम्टे ने जबर्दस्त साहस दिखाया. वो कार से बाहर निकल कर झड़ियों की तरफ फायरिंग करने लगे. काम्टे कसाब को चोट पहुंचाने में सफल रहे. उसके हाथ में गोली लगी. जाधव के बयान के हिसाब से, ‘दोनों ने करकरे साहब, काम्टे साहब और सालस्कर साहब के ऊपर गोलियां चलानी जारी रखीं जिसमें तीनों घायल हो गए. कुछ देर बाद फायरिंग रुक गई. उनमें से लंबा वाला (इस्माइल) हमारी कार के पास आया और पिछला दरवाजा खोलने लगा पर वो खुला नहीं. मैंने मरे होने का नाटक किया. मेरे ठीक बगल वाला आदमी मेरे ऊपर ही गिर गया था. जल्द ही कार फिर से चलने लगी. लंबा वाला लड़का महापालिका रोड पर कार ले जा रहा था. मुझे अहसास हुआ कि करकरे साहब, काम्टे साहब और सालस्कर साहब अपनी सीट पर नहीं थे. उन्होंने विधानसभा के पास कार रोक दी और कार से उतर गए. एक बार फिर से मुझे फायरिंग की आवाज सुनाई दी.’
जाधव इस बात से अनजान था कि करकरे, काम्टे और सालस्कर को कार से नीचे फेंक दिया गया था. सालस्कर अभी जीवित थे उन्हें अस्पताल ले जाया गया जहां 1.05 बजे मृत घोषित कर दिया गया.
चौथा सवाल: क्या सही समय पर सालस्कर को अस्पताल पहुंचा कर उन्हें बचाया जा सकता था?
पुलिस रिकॉर्ड के मुताबिक करकरे, काम्टे और सालस्कर को 12.05 बजे के आस पास गोली लगी थी.
12.19 रात्रि: साउथ कंट्रोल टू अज्ञात वाकी
टाकी: लोगों का कहना है कि पुलिस की एक गाड़ी अगवा हो गई है.
12.25 रात्रि: कंट्रोल टू अबाल मोबाइल- क्वालिस कार को अगवा किया गया है.
12.40 रात्रि: साउथ कंट्रोल टू पीटर एलटी मार्ग: स्पेशल ब्रांच-1 लेन में सहायता भेजें. वहां दो-तीन लोग घायल हुए हैं. मेरे ख्याल से काम्टे साहब हैं. तुरंत सहायता भेजें.
12.40 बजे तक कोई भी करकरे, काम्टे और सालस्कर को बचाने के लिए नहीं पहुंचा. एटीएस के मुखिया, पूर्वी क्षेत्र के एसीपी और एक एनकाउंटर विशेषज्ञ 40 मिनट तक सड़क पर ही पड़े रहे. पहले भी सहायता नहीं पहुंची थी और इस बार भी सहायता नहीं पहुंची, कोई एंबुलेंस भी मौके पर नहीं थी. कॉल लॉग रिकॉर्ड के मुताबिक 12.25 बजे के करीब जाधव ने कैलिस से एक वायरलेस संदेश भेजा, ‘रंग भवन लेन से एक क्वालिस को अगवा कर लिया गया है. सालस्कर सर, एटीएस सर और ईस्ट रीजन सर के ऊपर फायर करके. अब आतंकियों ने कार स्टेट बैंक ऑफ मैसूर, मंत्रालय के पास छोड़ दी है.’
अपने प्राणों की आहुति देने वाले जवानों के परिजन इस बात से बेहद निराश और व्यथित है कि उनके तमाम आपात संदेशों पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दिखाई गई. विनीता काम्टे उन परिस्थितियों के बारे में जानना चाहती हैं जिनमें फंस कर उनके पति की जान गई. वो लोगों के सवाल सुन-सुनकर थक गई थी कि आखिर तीनों सीनियर अधिकारी एक साथ क्यों थे और उन्होंने अपने पति के वरिष्ठ अधिकारियों से इस संबंध में जवाब मांगने का निर्णय किया पर जल्द ही उन्हें अहसास हो गया कि उन्हें सच नहीं बताया जा रहा है.
वो बताती हैं कि वो बड़ी मुश्किल से जेसीपी राकेश मारिया को इस बात के लिए राजी कर पायीं कि वो एक बयान जारी कर ये स्वीकार करें कि उनके पति ने ही कसाब को घायल किया था. विनीता ने तहलका को बताया, ‘मैंने उनसे कहा कि अगर मेरे पति ने कसाब को घायल नहीं किया है तो कोई बात नहीं है लेकिन अगर उन्होंने ही ये काम किया है तो फिर मैं इसका श्रेय किसी को नहीं लेने दूंगी.’ प्रत्यक्षदर्शियों से उन्हें जानकारी मिली थी कि अशोक काम्टे कार से बाहर निकल कर आए थे और फायर किया था. कसाब ने भी अपने बयान में इस बात की पुष्टि की थी कि एक वर्दीधारी अधिकारी ने कार से बाहर निकल कर फायर किया था. उस रात सिर्फ काम्टे ही थे जिन्होंने वर्दी पहन रखी थी.
वो अपने पति के कॉल रिकॉर्ड भी देखना चाहती थी पर पुलिस आयुक्त हसन गफूर को पत्र लिखे जाने के बाद भी उन्हें कोई जवाब ही नहीं मिला. ‘वो मुझे अलग-अलग कहानियां सुनाते थे. सम्मान का भाव दिखाने की बजाए वो सिर्फ मुझे भटकाते रहे.’ हार कर विनीता ने अपनी वकील बहन रेवती देरे की सहायता से आरटीआई दरख्वास्त दाखिल की. इस पर राकेश मारिया ने घिसा-पिटा रुख दिखाते हुए सूचना अधिकारी को लिख भेजा, ‘धारा 8(एच) (जांच प्रक्रिया में बाधा डालना) के तहत आवेदन को निरस्त कर दिया जाए.’
पांचवां सवाल: आखिर संयुक्त पुलिस आयुक्त परिवारों को भटका क्यों रहे हैं?
मारिया को ये अधिकार तो है कि वो सूचना देने से मना कर दें पर अपने एक पत्र (जिसकी एक प्रति तहलका के पास भी है) में तो वो सूचना अधिकारी पर सीधे दबाव डालते हुए नजर आते हैं. हार न मानने को दृढ़ विनीता ने आरटीआई के आदेश के खिलाफ अपील की. अब उन्हें अपने पति के कॉल रिकॉर्ड की जांच करने की अनुमति मिल गई है. इस बाबत बाद में एक उपायुक्त द्वारा दिया गया आदेश इस मायने में चौंकाने वाला है कि ये कहता है कि मारिया ने सूचना अधिकारी पर दबाव बनाने का प्रयास किया था और विनीता को कॉल रिकॉर्ड की जांच करने का मौका मिलना चाहिए आखिर उनके पति ने देश के लिए अपनी जान दी है.
साफ है कि मुंबई पुलिस और महाराष्ट्र सरकार 26/11 की सच्चाई पर पर्दा डालना चाहती है, ये बात कॉल रिकॉर्ड से भी साफ हो जाती है. इस संबंध में जब मारिया से संपर्क किया गया तो उन्होंने कहा कि वो लंदन में हैं और मुंबई के पुलिस आयुक्त ने ‘नो कमेंट’ कह कर पल्ला झाड़ लिया.
राज्य सरकार ने दिसंबर 2008 को सरकार और मुंबई पुलिस की भूमिका की जांच के लिए पूर्व गृह सचिव राम प्रधान के नेतृत्व में दो सदस्यीय समिति का गठन किया था. 100 पन्नों की रिपोर्ट में प्रधान ने दोनों को ही क्लीन चिट थमा दी है. उन्होंने मीडिया को बताया, ‘हमले के बाद मुंबई दौरे पर आए गृहमंत्री पी. चिदंबरम ने राज्य के नागरिकों से माफी मांगी थी. ये खुद ही साबित करता है कि चूक केंद्र सरकार की ओर से हुई.’ पुलिस की भूमिका के बारे में पूछे जाने पर प्रधान ने कहा, ‘मुंबई पुलिस को छोड़िए पूरे देश की पुलिस युद्ध जैसी स्थितियों से निपटने के लिए तैयार नहीं हैं.’ समिति के दूसरे सदस्य वी. बालाचंद्रन के मुताबिक, ‘हमने कंट्रोल रूम में आईं 5,000 कॉलों का विश्लेषण किया, और कंट्रोल रूम स्टाफ द्वारा दिए गए जवाब और उनकी कार्यवाही से हम पूरी तरह संतुष्ट थे.’
रिपोर्ट को अभी विधानसभा में पेश नहीं किया गया है – यहां क्लीन चिट के विरोध में विपक्ष पहले ही वाक-आउट कर चुका है- लेकिन प्रधान और बालाचंद्रन ने पहले ही मीडिया को ये बात स्पष्ट कर दी है कि किसी के सिर ठीकरा नहीं फोड़ा जाएगा.
हालांकि विनीता काम्टे के लिए ये रिपोर्ट अंतिम सत्य नहीं है, वो कहती हैं कि अपने पति के कॉल रिकॉर्ड की जांच के पश्चात वो अदालत का दरवाजा भी खटखटा सकती हैं. कविता करकरे ने भी प्रधान समिति की रिपोर्ट पर अपनी प्रतिक्रिया जताई है. मीडिया से बातचीत में उन्होंने कहा, ‘समिति की रिपोर्ट से आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में कोई सहायता नहीं मिलेगी. उस वक्त खुफिया विभाग, तट रक्षक, पुलिस और राज्य सरकार के बीच किसी तरह का समन्वय ही नहीं था. पर समिति इन बातों को स्वीकार करने के लिए तैयार ही नहीं है और मुझे पता है कि वो कभी भी 26/11 को मुंबई में जो कुछ हुआ उसकी कमियों को स्वीकार नहीं करेंगे. अन्यथा मुझे अपने पति को नहीं खोना पड़ता.’
चिदंबरमजी, उम्मीद है आप इसे पढ़ रहे होंगे. समिति ने आपकी माफी की आड़ लेकर तमाम सच्चाइयों को दफन कर दिया. आपने आंतरिक सुरक्षा तंत्र में आमूल बदलाव का वादा किया था – ये भी एक वजह है कि हम ये उम्मीद कर रहे हैं कि आप इसे पढ़ रहे होंगे. क्या हम अगले हमले से निपटने के लिए तैयार हैं वो भी तब जब हम जरूरी सहायता तक समय पर पहुंचाने की स्थिति में नहीं हैं?