जलती रस्सी, जाता बल

2009 का आम चुनाव सही मायनों में आम रहा. ऐसा मैं इसलिए कह रहा हूं क्योंकि पूरे देश में कोई खास लहर देखने को नहीं मिली. अलग-अलग जगहों पर उम्मीदवारों और पार्टियों की हार-जीत तय करने वाले अलग-अलग कारक रहे. विविधता इतनी थी कि एक ही राज्य में दो जगहों पर दो बिल्कुल अलग समीकरण काम करते दिखे.

जब भाजपा और वाम दलों ने मनमोहन सिंह पर निशाना साधते हुए उन्हें मजाक का पात्र बनाया तो जनता को अच्छा नहीं लगा. नतीजतन सिंह उन्हीं गुणों के लिए जनता के हीरो बन गए जिनके लिए उनकी हंसी उड़ाई जा रही थी 

हालांकि इस विविधता में भी कुछ समानता देखी जा सकती हैं. सबसे पहली बात तो ये कि लोग राजनीति के चढ़ते पारे को कुछ शांत कर देना चाहते थे. पिछले 15 सालों से देश में गरमा-गरमी की राजनीति का बोलबाला रहा है. मुझे लगता है कि लोग इससे थोड़ा ऊब चुके थे. मसलन पिछले दो आम चुनावों ने दिखाया कि उत्तर प्रदेश में मतदाताओं का सिर्फ एक फीसदी हिस्सा ही रामजन्मभूमि में दिलचस्पी रखता है. भाजपा ने भी इस मुद्दे को शायद इसीलिए इस चुनाव में ज्यादा तवज्जो नहीं दी क्योंकि उसके आंतरिक विश्लेषण में भी यही बात निकलकर आ रही थी. प. बंगाल को छोड़ दें तो अब की बार चुनाव में कहीं भी उस तरह का भावनात्मक ज्वार देखने को नहीं मिला जो अक्सर आम चुनावों में देखा जाता है.

ऐसा बेवजह नहीं हुआ. दरअसल हमारे समाज की प्रकृति ही कुछ ऐसी है कि यहां विविधता अपने चरम स्वरूप में मौजूद हैं. खानपान, सोच, जीवनशैली.सबमें इतने अंतर हैं कि गिने ही नहीं जा सकते. ये अंतर किसी के द्वारा थोपे हुए नहीं बल्कि स्वाभाविक हैं और इसलिए इनसे जिस तरह की विविधता का निर्माण होता है उस पर किसी का कोई नियंत्रण नहीं होता. नियंत्रित विविधता का आदर्श उदाहरण अमेरिका है. वहां आपको हर तरह का खाना, कपड़ा और सांस्कृतिक गतिविधियां तो देखने को मिलेंगीं. मगर हमारे उलट ये चीजें वहां पर उपलब्ध करवाई गई हैं.

विविधता का हमारे यहां जैसा चरम स्वरूप तब बनता है जब आप उन लोगों के साथ भी सहिष्णुता के साथ रहते हैं जो आपके जीवन के कुछ बेहद बुनियादी सिद्धांतों को चुनौती देते हैं. दक्षिण एशिया के ज्यादातर लोगों की तरह भारतीयों में भी इस प्रकार की विविधता के साथ जीने की योग्यता है. इसका सबसे शक्तिशाली उदाहरण है इस साल कश्मीर में सज्जाद लोन का चुनाव लड़ना. किसी ने भी इस बात पर एतराज नहीं जताया कि एक अलगाववादी भारत के संविधान के तहत शपथ लेना चाहता है. उल्टे हर किसी ने उत्साह के साथ इसका जिक्र किया. मैं इसे चरम भिन्नता के प्रति सहिष्णुता के उदाहरण के तौर पर देखता हूं. ऐसे समाज में किसी भी तरह की अति का आखिर में खुद ही अंत हो जाता है.

भारत एक ऐसा देश है जहां देवों में भी कुछ दोष हैं और असुरों में भी कुछ अच्छाइयां. मैं इस संस्कृति को महाकाव्य संस्कृति कहता हूं. कोई भी  महाकाव्य देवों और असुरों के बिना पूरा नहीं होता और दोनों के होने से ही कहानी पूरी होती है. ये हमारी सामूहिक चेतना का हिस्सा है और मुझे लगता है कि इसका आखिरकार हमारी जिंदगी पर भी प्रभाव पड़ा है. लोग एक दिशा में एक बिंदु तक जाते हैं और फिर ठहरकर सोचने लग जाते हैं. उन्हें लगता है कि आगे जाना खतरनाक है क्योंकि इससे उनकी जिंदगी का बुनियादी समीकरण बिगड़ सकता है. वे कहते हैं, बस अब बहुत हो चुका, अब सामान्य जीवन की तरफ लौटा जाए. ये चुनाव इसी सामूहिक चेतना का प्रतिनिधित्व करता है. शायद हमें राजनीति में इस तरह के विराम की जरूरत भी थी.

ये अच्छा हुआ कि भाजपा केंद्र की सत्ता में आई. इससे न सिर्फ कांग्रेस ने खुद को सुधारा बल्कि भाजपा को भी अहसास हो गया कि अगर अपने फॉर्मूले सही रखे तो वह भी केंद्र में सत्तासीन हो सकती है

चुनाव परिणामों का दूसरा निष्कर्ष ये निकलता है कि लोग गरिमा और शिष्टाचार की उम्मीद कर रहे थे और शायद नकारात्मक प्रचार अभियान, व्यक्तिगत हमलों की अति और द्वेषपूर्ण नारों ने उन्हें नाराज कर दिया. जब भाजपा और वाम दलों ने मनमोहन सिंह पर निशाना साधते हुए उन्हें मजाक का पात्र बनाया तो जनता को अच्छा नहीं लगा. नतीजतन सिंह उन्हीं गुणों के लिए जनता के हीरो बन गए जिनके लिए उनकी हंसी उड़ाई जा रही थी. उनकी कमजोरी, गैर राजनीतिक पृष्ठभूमि, कांग्रेस हाईकमान के दबाव में काम करने की प्रवृत्ति जैसी चीजें अचानक एक तरह की शिष्ट राजनीति का प्रतीक बन गईं. शोर मचाते अपने विरोधियों के उलट सोनिया और राहुल गांधी के अपेक्षाकृति शालीन आचरण ने भी कांग्रेस को फायदा पहुंचाया.

यहां पर मैं एक छोटी लेकिन अहम घटना का जिक्र करना चाहूंगा. दिल्ली स्थित इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में मैंने एक बैरे से चुनाव परिणामों पर उसकी राय पूछी. उसका कहना था, ‘ये बहुत अच्छा रहा.’ मैंने पूछा कि क्या वह कांग्रेस का वोटर है? उसने जवाब दिया, ‘ऐसी बात नहीं है साहब.          सरदारजी अच्छे आदमी हैं. वे पढ़े-लिखे हैं, वे कोई चोर नहीं हैं और राजनीति में नए हैं. फिर भी वे(विरोधी) उनके पीछे हाथ धोकर पड़े थे और उन्हें कमजोर और डरपोक कह रहे थे. ये देखकर किसे अच्छा लगेगा? मुझे खुशी है, चुनाव नतीजों ने दिखा दिया है कि ऊपरवाला सब देखता है.’ ये उदाहरण मैंने इसलिए दिया कि ‘ऊपरवाला सब देखता है’ ये विचार कई दूसरे लोगों का भी रहा है.

इस चुनाव का तीसरा निष्कर्ष ये है कि मतदाता घमंड को नीचा दिखाना चाहते थे. जिस तरीके से मायावती दिल्ली फतह करने निकली थीं मगर उत्तर प्रदेश भी नहीं बचा पाईं उससे ये अहम संकेत मिलता है कि उनकी मनमानी और तड़कभड़क लोगों को पसंद नहीं आई. अपनी मूर्तियां लगवाकर अमर होने की लालसा पाले मायावती को शायद भ्रम हो गया था कि अब अगर वे कुछ भी नहीं करें तो भी इतिहास उनका इंतजार कर रहा है. नरेंद्र मोदी और प्रकाश करात का घमंड भी लोगों को नहीं भाया. ये घमंड हर तरह का था. अपनी खास शैली का घमंड, अपरिवर्तनीय होने की गलतफहमी का घमंड, महत्वकांक्षा का घमंड और लोगों की उपेक्षा करने का घमंड. इन सबको मतदाताओं ने पाठ पढ़ा दिया.

नरेंद्र मोदी ने भाजपा, संघ, बजंरग दल और विश्व हिंदू परिषद के भीतर से अपने खिलाफ होने वाले हर संभावित विरोध को किनारे कर दिया है. इनमें से अब कोई भी आसानी से तो मोदी के खिलाफ कुछ नहीं कर सकता. मोदी की नजर सत्ता पर है, पश्चिमी गुजरात और मध्यवर्गीय गुजरातियों में उनका तगड़ा आधार है इसलिए उन्हें कोई हिला नहीं सकता. मगर इस चुनाव ने अखिल भारतीय स्तर के नेता होने की उनकी क्षमताओं पर की सवाल खड़े कर दिए हैं. उन्हें भाजपा के लिए एक स्टार कैंपेनर कहा जा रहा था मगर भारत के मतदाता ने उन्हें नकार कर एक मजबूत संदेश दिया है. भारत में देखा गया है कि विवादास्पद नेता मुश्किल से ही देश के शीर्ष पदों तक पहुंचते हैं. 

मोदी समुदायों की बात न करने के लिए कृतसंकल्प हैं. वे इस बात के लिए भी कृतसंकल्प हैं कि गुजरात में 2002 में जो हुआ उसके लिए माफी नहीं मांगेंगे या मुस्लिम समुदाय के जख्मों पर मरहम नहीं लगाएंगे. वे बस इतना कहकर पीछा छुड़ा लेते हैं कि वे साढ़े पांच करोड़ गुजरातियों के नेता हैं. ऐसा कहने का आशय ये है कि आप इससे खुद ही मान लीजिए कि वे मुसलमानों के भी नेता हैं. चुनाव नतीजों के बाद मोदी को भी अहसास हो गया होगा कि उन्हें विनम्रता के कुछ सबक सीखने की जरूरत है और ये भी कि भारत में राजनीति करने की भाषा किस प्रकार की होनी चाहिए. भारतीय राजनीति ने इंदिरा गांधी से लेकर मायावती तक कइयों को विनम्रता के सबक सिखाए हैं और अगर मोदी ने ये अभी भी नहीं सीखा है तो वह उन्हें आगे ये सिखा देगी. भले ही ये बात कितनी भी बुरी लगे मगर दुर्भाग्य से प्रकाश करात और नरेंद्र मोदी में एक बड़ी समानता है. ये दोनों ही ऐसे शख्स हैं जो ये समझ ही नहीं सकते कि दूसरे की सोच में भी कोई अच्छाई हो सकती है. ये दोनों ही विचारधारा में बदलाव को बर्दाश्त नहीं कर सकते. मोदी और मायावती की तरह ही इस चुनाव ने प्रकाश करात के घमंड को भी कम कर दिया है.

आप ऐसा नहीं कर सकते कि किसी फाइव स्टार होटल में एक वक्त के खाने में 12000 रुपए उड़ा दें और कूड़ा बीनते किसी बच्चों को 10 रुपये देकर अपनी सामाजिक जिम्मेदारी की इतिश्री समझ लें मगर वाम को लगा झटका एक गहरे रोग की तरफ भी इशारा करता है. बंगाल में पार्टी लंबे समय से सत्ता में रही है. हमारे समाज में जब कोई पार्टी तरक्की पर होती है तो असामाजिक तत्व उसकी तरफ खिंचे आते हैं. उत्तर प्रदेश का ही उदाहरण लीजिए. यहां के माफिया तत्व पहले कांग्रेस के साथ जुड़े, फिर भाजपा के साथ, इसके बाद सपा के और फिर बसपा के साथ. बंगाल में वाम दलों के राज को 32 साल हो चुके हैं और सारे असामाजिक तत्व माकपा में गहरे तक जड़ें जमा चुके हैं. इनके चलते पार्टी की ताकत असाधारण थी. गांव दर गांव दूसरी पार्टियों के उम्मीदवारों को प्रचार अभियान से रोका गया. हालांकि घमंड और नियंत्रण का ये फंदा अभी पूरी तरह से खुला तो नहीं है मगर ढीला जरूर पड़ने लगा है. विस्तृत परिप्रेक्ष्य में देखा जाए तो प्रकाश करात ने बंगाल का काफी भला किया है. तीन दशक के निर्बाध शासन ने व्यवस्था को पूरी तरह से सड़ा दिया है. भले ही विपक्ष कितना ही बुरा क्यों न हो, मगर ये अंकुश रखने का काम तो करता ही है और अगर आप एक बार भी सत्ता से हाथ धो बैठते हैं तो ये आपको दुबारा धरातल पर लाकर बिठा देता है.

उदाहरण के लिए मैं मानता हूं कि ये अच्छा हुआ कि भाजपा केंद्र की सत्ता में आई. इससे न सिर्फ कांग्रेस ने खुद को सुधारा बल्कि भाजपा को भी अहसास हो गया कि अगर अपने फॉर्मूले सही रखे तो वह भी केंद्र में सत्तासीन हो सकती है. विहिप, बजरंग दल और शिवसेना जैसी उन्मादी शक्तियों को काबू में रखने के लिए भी यह बहुत अहम है. जब आपके पास वध शक्ति होती है तो आपको सड़कों पर तोड़फोड़ कर अपनी ताकत दिखाने की जरूरत नहीं होती. आप उन पर लगाम लगाए रखते हैं क्योंकि आपकी ताकत जगजाहिर होती है और साथ ही आपको सम्मान भी खूब मिलता है.

मगर सिर्फ अपराध और घमंड ही बंगाल और केरल में वामदलों की हार के कारण नहीं रहे. संकट ये है कि उनकी तरह का लेनिनवाद क्यूबा, बंगाल, केरल और चंदन मित्रा के शब्दों में ‘जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय गणराज्य’ को छोड़कर अब दुनिया में कहीं भी बचा नहीं है. मुझे तो हैरत होती है कि ये विचारधारा भारत में इतने सारे लोगों को आखिर इतना सम्मोहित कैसे कर सकी. यहां ध्यान देने वाली बात ये है कि सर्वहाराओं के विकास की इस तथाकथित अवधारणा के सबसे बड़े रक्षक मध्यवर्ग से आए कार्यकर्ता हैं. यही वजह है कि भारत में बाकी जगहों के सामाजिक ताने-बाने में जो क्रांतिकारी बदलाव आए हैं उन्होंने प. बंगाल में 32 वर्ष तक वामपंथी शासन रहने के बावजूद यहां के समाज को छुआ तक नहीं है. वहां अभी भी हर चीज पर ऊंची जातियों का प्रभुत्व रहता है और कुछ मायनों में तो ये जांत-पांत को लेकर सबसे ज्यादा जड़ समाज है.

उदाहरण के लिए भारत में प. बंगाल अकेला राज्य होगा जहां आप किसी दलित के मुख्यमंत्री बनने की कल्पना भी नहीं कर सकते. इसके उलट दक्षिण भारत के समाज में काफी खुलापन आया है और इसमें काफी नई ऊर्जा का संचार हुआ है. यहां ए आर रहमान या उनके गुरू इलयराजा समाज की सबसे निचली परत से ऊपर उठी महान प्रतिभाएं हैं. गैरब्राह्मण जातियों में इस तरह की ऊर्जा के प्रवाह का कोई ऐसा उदाहरण बंगाल में देखने को नहीं मिलता.

उम्मीद कम ही है कि इस हार से बंगाल में व्याप्त मार्क्सवाद में कोई ताजा सोच पैदा होगी. ऐसा इसलिए है क्योंकि ये उपनिवेशवादी संस्कृति का आखिरी अवशेष है. यही वजह है कि हमारे मार्क्सवाद अपनी किताबों के अलावा कुछ और नहीं सोच पाते. इसीलिए उन्होंने लैटिन अमेरिकी या यूरोपीय मार्क्सवाद से कुछ ग्रहण नहीं किया. यही वजह है कि यहां भीतर से कोई नई सोच निकलकर नहीं आई. इस तरह के बौद्धिक जगत में नई सोच सिर्फ दो ही तरीकों से आती है, मौत से या फिर रिटायरमेंट से.

कांग्रेस की तरफ वोटरों का दोबारा रुख करना इस बात का संकेत है कि सपा और बसपा जैसे क्षेत्रीय दल भी आकार और महत्वकांक्षाओं के लिहाज से इतने बड़े हो गए हैं कि परंपरागत वोट बैंक के प्रति उनकी प्रतिक्रिया अब पहले जैसी नहीं रहीइस चुनाव का एक और अहम संकेत ये है कि राष्ट्रीय स्तर की पार्टियों का समर्थन बढ़ा है. इसे एक अहम सुधार की शुरुआत के तौर पर देखा जा सकता है. छोटे दल अब जरूरत से कहीं ज्यादा हो गए हैं और चुनावी ताकत के बिखराव ने फायदा देना बंद कर दिया है. इससे मतदाताओं को महसूस हो गया है कि बेहतर यही है कि केंद्र में बड़ी पार्टियों को आने दिया जाए.

दिलचस्प बात ये है कि भले ही मंडलवाद की राजनीति का जोर कम हुआ हो मगर ये नहीं कहा जा सकता कि मंडल के बाद राजनीति का जो दौर शुरू हुआ था उसका अंत हो गया है. कांग्रेस के परंपरागत वोट बैंक में से कई -मसलन उत्तर प्रदेश में दलित और मुसलमान – छोटे दलों के पाले में चले गए थे. दलित बसपा के, मुसलमान मुलायम के और बिहार में दोनों लालू के साथ गए. इन पार्टियों में मुख्य आकर्षण ये था कि छोटी होने के कारण ये अपने वोट बैंक की मांगों के प्रति कहीं ज्यादा संवेदनशील थीं जबकि कांग्रेस जैसी किसी राष्ट्रीय स्तर की पार्टी में दूसरे गुटों की मांगें आपकी मांगों से टकराकर उन्हें निष्क्रिय कर देती थीं. कांग्रेस की तरफ वोटरों का दोबारा रुख करना इस बात का संकेत है कि सपा और बसपा जैसे क्षेत्रीय दल भी आकार और महत्वकांक्षाओं के लिहाज से इतने बड़े हो गए हैं कि परंपरागत वोट बैंक के प्रति उनकी प्रतिक्रिया अब पहले जैसी नहीं रही. नतीजतन कांग्रेस को अब ऐसी नई और छोटी पार्टी के तौर पर देखा जा रहा है जो नया आधार बनाने की कोशिश कर रही है. लोगों को लगता है कि ये उनकी जरूरतों के प्रति ज्यादा संवेदनशील साबित हो सकती है.

मंडलवाद का दौर अभी खत्म नहीं हुआ है ऐसा कहने की और भी वजहें हैं. भारत में शहरों में रहने वाले अमीर वर्ग के भी एक छोटे से हिस्से को छोड़ दें तो यहां व्यक्ति से ज्यादा आज भी उसकी जाति मायने रखती है. पार्टी भी उम्मीदवारों का चयन करते हुए उसकी जाति पर सबसे ज्यादा गौर करती है. बाकी सारी खासियतें उसके बाद कहीं जाकर आती हैं. दरअसल देखा जाए तो मंडलवाद की राजनीति के दौर को अभी इसलिए भी खत्म हुआ नहीं कहा जा सकता क्योंकि सिर्फ बातों की खाने वाले नेताओं का जोर अभी भी कायम है.

हालांकि कुछ पार्टियों ने अब जाति पर पहले से कम जोर देना शुरू कर दिया है. ऐसा इसलिए है क्योंकि उनके मतदाता वर्ग मुख्यधारा में आ गए हैं. मराठा, पटेल, वोक्कलिगा, लिंगायत, जाट जैसे समुदाय इसका उदाहरण हैं. यादव भी अब लगभग मुख्यधारा में आ चुके हैं और इसलिए वे भी अब इस पर कम ध्यान देते हैं. नीतिश कुमार के बिहार का मुख्यमंत्री बनने के बाद कुर्मी भी ज्यादा सुरक्षित महसूस करेंगे.

मगर अब भी सैकड़ों समुदाय ऐसे हैं जिनके पास पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं है. बड़े समुदाय खुद को संगठित करके फायदे की फसल काट चुके हैं. अब छोटे समुदायों की बारी है. जैसे 70 और 80 के दशक में एनटीआर के जरिए कम्मा समुदाय मुख्यधारा में आया था वैसे ही इस चुनाव में चिरंजीवी के आने से कापू समुदाय के साथ हुआ है. ये बनिस्बत कहीं छोटे समुदाय हैं. पहले की बात होती तो उन्होंने बड़े नेताओं को वोट दिया होता पर अब उन्हें लगता है कि बदले राजनीतिक परिदृश्य में वे एक छोटा ही सही पर अहम स्थान प्राप्त कर सकते हैं.

हाल ही में गुर्जरों ने अनुसूचित जनजाति का दर्जा पाने के लिए संगठित होना शुरू किया जैसे कि सिर्फ संसद का एक फैसला ही किसी संगठन को एक जनजाति में तब्दील करने के लिए काफी हो. इस तरह की सोच, आरक्षण के लिए लड़ाई, अतार्किक मांगें और कुछ और दूसरी तरह की वोट बैंक की राजनीति देखने को मिलती रहेगी. मगर दीर्घावधि में ये भारत के लिए अच्छा ही साबित होगा.

जैसे-जैसे व्यवस्था अलग-अलग समुदायों को ज्यादा स्थान देती जाएगी लोकतांत्रिक व्यवस्था में हरेक का हिस्सा बढ़ता जाएगा. समय के साथ ज्यादा से ज्यादा लोग मुख्यधारा में आते जाएंगे और समस्या खुद ब खुद हल हो जाएगी. 35 से 40 लोकसभा सीटें चाहने वाले मुलायम या लालू जैसे और आठ से दस लोकसभा सीटों की तमन्ना रखने चिरंजीवी सरीखे जातिवादी समूहों में बहुत बड़ा अंतर है. दरअसल पहले से ही बहुत से लोगों के आ जाने से जगह कम होती जा रही है. मगर आने वाली पीढ़ी को इसका सामना नहीं करना पड़ेगा. अगली पीढ़ी को विरासत में कहीं ज्यादा भागीदारी वाला समाज मिलेगा.

आखिर में घमंड पर आखिरी बात. वाम दल भले ही परास्त हुए हैं मगर साम्यवादी रुझान हमारे समाज में अक्षुण्ण है. दरअसल देखा जाए तो ये बहुत जरूरी भी है. अगर यूपीए ये मान लेगा कि ये जनादेश बेलगाम उदारीकरण के लिए है तो वह बहुत बड़ी भूल करेगा. हमारे समाज का एक वर्ग अब भी सबसे निचले पायदान पर खड़े लोगों के बारे में सोचता है. ऐसे लोग अब भी हैं जो सोचते हैं कि खुद को एक इंसानी समाज के रूप में जिंदा रखने के लिए ये बहुत अहम है कि गरीबों की तरफ प्राथमिकता से ध्यान दिया जाए.

आप ऐसा नहीं कर सकते कि किसी फाइव स्टार होटल में एक वक्त के खाने में 12000 रुपए उड़ा दें और कूड़ा बीनते किसी बच्चों को 10 रुपये देकर अपनी सामाजिक जिम्मेदारी की इतिश्री समझ लें. न ही आप ये देखने के लिए 200 साल तक इंतजार कर सकते हैं कि उदारीकरण का फायदा आखिरकार अपने आप ही नीचे तक पहुंच जाएगा.

ये संयोग नहीं है कि यूपीए को चुनाव में विजयी बनाने वाली वास्तविकता राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना और किसानों की कर्ज माफी योजना है. भले ही इस पैसे का 90 फीसदी भ्रष्टाचार में डूब गया हो मगर फिर भी ये ग्रामीण क्षेत्र तक पहुंचा है. सारा भ्रष्टाचार दिल्ली या भुनवेश्वर में नहीं है. स्थानीय स्तर पर भी काफी पैसा खाया जाता है. मगर जो लूट रहे हैं उन्हें भी खर्च तो करना ही है. इससे स्थानीय अर्थव्यवस्था फलती-फूलती है. इससे चुनावी लाभ मिलता है. भारत के गरीब हमेशा वोट देते हैं. घमंड को खंड-खंड करने के लिए उनके पास यही तो सबसे कारगर हथियार है.