रासायनिक युद्ध में भारत की क्षमता और चुनौतियाँ

भारतीय नौसेना के जहाजों में भी केमिकल बायोलॉजिकल रेडियोलॉजिकल न्यूक्लियर (सीबीआरएन) प्रोटेक्शन सिस्टम लगा है। मतलब ये है कि रासायनिक हमले से बचाव और डिकंटेमिनेशन में भारत बहुत मजबूत है। और जो पाकिस्तान भारत को आए दिन आतंकवादी गतिबिधियों से परेशान करता रहता है और सब्र की परीक्षा लेता रहता है, उसे नष्ट करने में भारत को बहुत समय नहीं लगेगा। लिखते हैं -के.रवि(दादा)

आज की दुनिया परमाणु और रासायनिक हथियारों के ढेर पर बैठी है और बड़ी तेजी से दुनिया के हर देश में रासायनिक हथियार इकट्ठे करने की होड़ लगी हुई है। अमेरिका, चाइना, इजरायल, रूस, यूक्रेन, ईरान, ईराक, भारत, पाकिस्तान, उत्तरी कोरिया, दक्षिणी कोरिया के अलावा और कई देश रासायनिक हथियारों के जखीरे इकट्ठे करने में लगे हुए हैं। आज के हालात ये हैं कि अगर विश्व युद्ध की तरफ दुनिया बढ़ती है, तो रासायनिक युद्ध होना तय है, जिसमें दुनिया की 70 से 90 प्रतिशत इंसानी आबादी के साथ-साथ धरती पर रहने वाले अन्य प्राणी भी बड़ी संख्या में मर जाएंगे।

कहना पड़ेगा रासायनिक हथियार मानव इतिहास को खत्म करने के लिए तैयार सबसे भयावह हथियारों में से हैं। पहले विश्व युद्ध में सरसों गैस से लेकर इराक-ईरान युद्ध में सारिन और सीरिया में क्लोरीन तक का उपयोग हमेशा युद्ध अपराध माना गया है। आज के समय में 1997 का रासायनिक हथियार संधि (सीडब्ल्यूसी) लागू है, जिसके भारत और पाकिस्तान दोनों सदस्य हैं। फिर भी रासायनिक युद्ध में भारत कितना मजबूत है? यह प्रश्न इसलिए प्रासंगिक है, क्योंकि पड़ोसी देश पाकिस्तान के पास अभी भी रासायनिक हथियार कार्यक्रम के अवशेष माने जाते हैं और चीन की विशाल रासायनिक उद्योग क्षमता को दोहरे उपयोग के रूप में देखा जाता है।

भारत ने 1997 में सीडब्ल्यूसी पर हस्ताक्षर किए और अपने सभी घोषित रासायनिक हथियार स्टॉक (लगभग 1000 टन से अधिक फोसजीन, सरसों एजेंट आदि) को 2009 तक पूरी तरह नष्ट कर दिया। ऑर्गेनाइडेशन फॉर दी प्रोहिबिशन ऑफ केमिकल वेपंस (ओपीसीडब्ल्यू) ने भारत के विनाश कार्यक्रम को प्रमाणित भी किया। इसलिए कानूनी और घोषित रूप से भारत के पास कोई आक्रामक रासायनिक हथियार नहीं है। रासायनिक हथियारों के मामले में भारत की नीति नो फर्स्ट यूज नहीं है, बल्कि भारत ने स्पष्ट कहा है कि अगर कोई देश भारत पर रासायनिक हमला करेगा, तो भारत अपनी रक्षा के लिए प्रतिशोधी हमले का अधिकार रखता है। इसका मतलब यह है कि भारत के पास निष्क्रिय लेकिन तुरंत सक्रिय करने योग्य रासायनिक क्षमता हो सकती है।

असल में 1993 में यूनाइटेड नेशंस की देखरेख में इन देशों की मदद से ओरगेनाइजेशन फॉर दी प्रोहिबिशन ऑफ केमिकल वेपर्स नाम का एक संगठन बना, जिसका काम सभी 1993 मेंबर्स देशों में रासायनिक हथियारों को नष्ट करके बताया जाए कि इन देशों में कोई रासायनिक हथियार नहीं है। इजरायल को छोड़कर सभी देशों ने इस पर साइन किए कि वो अपने यहां रासायनिक हथियारों का भंडार नहीं रखेंगे। लेकिन आज अगर सच में देखा जाए, तो भारत को छोड़कर तकरीबन 80 प्रतिशत मेंबर देश परमाणु हथियारों का संग्रह करने में लगे हैं। हाल ही में यूक्रेन और रूस के अलावा इजरायल और गाजा के युद्ध में, जिसमें बाद में ईरान ने भी इजरायल पर हमला किया, रासायनिक युद्ध बढ़ने का खतरा बढ़ चुका है और कई देश ये मानकर बैठे हैं कि अगर तीसरा विश्व युद्ध होता है, तो वो रासायनिक हथियारों का इस्तेमाल करने से पीछे नहीं हटेंगे। चीन और अमेरिका जैसे देश तो रोबोट युद्थ तक की तैयारी किए बैठे हैं, जिसमें भारत की कोई तैयारी नहीं है।

डीआरडीओ की न्यूक्लियर-बायोलॉजिकल केमिकल (एनबीसी) सुरक्षा प्रणाली दुनिया की सबसे उन्नत प्रणालियों में से एक मानी जाती है। भारतीय सेना के पास एनबीसी सूट (मार्क-आईवी और मार्क-वी), एनबीसी फिल्टर युक्त वाहन (एनबीसी-प्रोटेक्टेड टी-90, बीएमपी-2), व्यक्तिगत डिटेक्टर किट, डिकंटेमिनेशन उपकरण (आरटीआर-डीएस), ऑटोमैटिक केमिकल एजेंट डिटेक्टर (एसीएडीए) आदि बड़े पैमाने पर उपलब्ध हैं। नागपुर में डीआरडीओ का डिफेंस रिसर्च एंड डेवलेपमेंट इस्टेब्हिलिशमेंट और ग्वालियर का डिफेंस रिसर्च एंड डेवलेपमेंट लैबोरेटरी रासायनिक एजेंटों के लिए एंटी-डॉट्स, डिटेक्शन किट और वैक्सीन विकसित कर रहे हैं। भारत ने रूसी-निर्मित सारिन और वीएक्स के लिए ऑटो-इंजेक्टर (एट्रोपाइन + प्रैडिक्सोजाइम) बड़े पैमाने पर उत्पादन शुरू कर दिया है।

भारतीय नौसेना के जहाजों में भी केमिकल बायोलॉजिकल रेडियोलॉजिकल न्यूक्लियर (सीबीआरएन) प्रोटेक्शन सिस्टम लगा है। कहने का मतलब ये है कि रासायनिक हमले से बचाव और डिकंटेमिनेशन में भारत बहुत मजबूत है। और जो पाकिस्तान भारत को आए दिन आतंकवादी गतिबिधियों से परेशान करता रहता है और भारत के सब्र की परीक्षा लेता रहता है, उसे नष्ट करने में भारत को बहुत समय नहीं लगेगा। पाकिस्तान के पास इतने न्यूक्लियर और रासायनिक हथियार नहीं हैं। लेकिन उसकी मदद को अमेरिका और चीन जिस तरह से खड़े हैं, उसकी वजह साफ है कि अमेरिका और चीन को भारत से डर रहता है और वो किसी भी हाल में पाकिस्तान को भौंकने के लिए उकसाते रहते हैं।

भारत में थायोनिल क्लोराइड, फॉस्फोरस ट्राइक्लोराइड, डाइमिथाइल मिथाइलफॉस्फोनेट, पिनाकोलिल अल्कोहल जैसे पूर्ववर्ती रसायन भी हैं। ये सारिन, वीएक्स, ताबुन जैसे नर्व एजेंट बनाने में काम आते हैं। भारत में 12 से अधिक बड़े पैमाने के क्लोरीन और फोसजीन प्लांट हैं। डीआरडीओ ने 1990 के दशक में ही प्रोजेक्ट हिमाद्री के तहत रक्षात्मक उद्देश्य से नर्व एजेंट डिटेक्शन और संश्लेषण का काम किया था। 155 एमएम आर्टिलरी शेल में रासायनिक गोले भरने की तकनीक तो भारत के पास 1997 से पहले से ही मौजूद थी। अमेरिकी खुफिया रिपोर्ट (2019-2023) में भी कहा गया है कि भारत के पास रैपिड ब्रेकाउट कैपाबिलिटी है मतलब बहुत कम समय में स्टॉकपाइल तैयार करने की क्षमता। लेकिन भारत ने आज तक के इतिहास में किसी भी देश पर इसका उपयोग नहीं किया है और न ही किसी देश पर कभी हमला किया है, बल्कि बड़े भाई की तरह हमेशा पड़ोसी देशों के लिए अपनी जमीनें देने का दरियादिल भी दिखाया है। हालांकि भारत की इसी दरियादिली का फायदा सभी पड़ोसी देशों ने उठाया है और भारत की जमीन दबाया है। पाकिस्तान इसमें पीछे नहीं रहा है और पीओके पर उसका अनैतिक कब्जा आज भी है। पाकिस्तान ने भी सीडब्ल्यूसी पर हस्ताक्षर किए हैं, लेकिन उसने कभी अपने स्टॉक की घोषणा नहीं की। वह हमेशा शातिराना चालें चलता रहता है और भारत के सब्र को आजमाता रहता है। अमेरिकी और पश्चिमी खुफिया एजेंसियाँ मानती हैं कि पाकिस्तान के पास अभी भी 2000-4000 टन तक सरसों गैस, सारिन और वीएक्स हो सकता है। लेकिन पाकिस्तान के अधिकांश रासायनिक हथियार 1980-90 के दशक के पुराने हथियार हैं, जिनकी शेल्फ-लाइफ खत्म हो चुकी है। उनके पास आधुनिक बाइनरी शेल की तकनीक नहीं है। पाकिस्तानी सेना में एनबीसी सुरक्षा भी बहुत सीमित है। लेकिन वो अमेरिका और चीन के बल पर कूदता रहता है।

इसलिए अगर सीमित रासायनिक युद्ध हुआ, तो शुरुआती 48-72 घंटे में पाकिस्तान को फायदा हो सकता है, लेकिन उसके बाद भारत की बेहतर रक्षा और प्रतिशोधी क्षमता उसे भारी नुकसान पहुँचा सकती है। हालांकि चीन बहुत धोखेबाज है। क्योंकि उसने सीडब्ल्यूसी में शामिल होने के बावजूद दुनिया में सबसे बड़ा रासायनिक उद्योग लगा रखे हैं और वो आज भी रासायनिक हथियारों पर हर दिन प्रयोग कर रहा है, जो कि सीडब्ल्यूसी के नियमों के खिलाफ है। अमेरिकी रिपोर्टों में उसे नॉन कम्प्लैंट माना जाता है। चीन के पास आधुनिक नर्व एजेंट (नोविचोक जैसे) और बाइनरी हथियार होने की संभावना है। भारत के सामने चीन की रासायनिक क्षमता बहुत बड़ी है, लेकिन भारत की एनबीसी रक्षा और ऊँचाई वाले क्षेत्रों (लद्दाख, अरुणाचल) में विशेष प्रशिक्षण से भारत लंबे समय तक टिका रह सकता है।

ऐसे में अगर अब कोई विश्व युद्ध होता है, तो उसमें परमाणु और रासायनिक हथियारों का प्रयोग निश्चित तौर पर होगा। क्योंकि ये हथियार हर देश के पास युद्ध जीतने और दुश्मन देशों को तबाह करने का अंतिम विकल्प हैं। हालाँकि रासायनिक युद्ध किसी के लिए भी जीत नहीं दिलाएगा, बल्कि हर देश में तबाही ही लाएगा। करोड़ों लोग और अरबों दूसरे प्राणी इससे मरेंगे। शहर ऐसे बीरान हो जाएंगे कि फिर करोड़ों साल या कहें जब तक ईश्वर न चाहे तब तक वहां कोई नहीं रह सकेगा। इसलिए दुनिया के हर देश को भारत की नीति पर चलना होगा कि किसी पर कोई हमला नहीं। और वैसे भी बड़े लोग कह गए हैं और यह बात हम सब जानते हैं कि दुनिया को युद्ध से नहीं बल्कि प्यार से ही जीता जा सकता है।