हीलियम संकट से बदला गेम: कतर का खेल खत्म? रूस तेजी से बना नई ताकत

संकट के बीच मेडिकल टेक्नोलॉजी कंपनियां भी नए विकल्प तलाश रही हैं। कुछ कंपनियां ‘हीलियम-फ्री’ MRI मशीनें विकसित कर रही हैं, जो इस गैस पर निर्भर नहीं होंगी। हालांकि, इन मशीनों को पूरी तरह अपनाने में अभी समय लगेगा।

ग्लोबल हीलियम क्राइसिस से बढ़ी टेंशन! क्या रूस तय करेगा इलाज की कीमत?
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नई दिल्ली: दुनियाभर में हीलियम गैस को लेकर बड़ा संकट खड़ा हो गया है और इसका असर अब सीधे भारत के हेल्थ सेक्टर पर दिखने लगा है। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के चलते सप्लाई चेन प्रभावित हुई है, जिससे Qatar से आने वाली हीलियम की आपूर्ति कम हो गई है। भारत काफी हद तक इसी पर निर्भर रहा है, ऐसे में अब अस्पतालों और डायग्नोस्टिक सेंटर्स में परेशानी बढ़ने लगी है।

हीलियम कोई आम गैस नहीं है। इसका सबसे अहम इस्तेमाल MRI मशीनों में होता है, जहां यह मैग्नेट को ठंडा रखने के लिए जरूरी होती है। सप्लाई कम होने की वजह से अब MRI स्कैन महंगा होने की आशंका बढ़ गई है। कई जगहों पर अस्पतालों के पास बैकअप स्टॉक भी कम होने लगा है, जिससे आने वाले समय में मेडिकल सेवाओं पर असर पड़ सकता है।

इस बीच Russia एक बड़े खिलाड़ी के तौर पर उभर रहा है। रूसी वैज्ञानिकों का दावा है कि 2030 तक रूस दुनिया की कुल हीलियम डिमांड का 35 से 45 प्रतिशत तक हिस्सा पूरा कर सकता है। साइबेरिया और अन्य इलाकों में हीलियम के बड़े भंडार मिलने से रूस तेजी से इस सेक्टर में अपनी पकड़ मजबूत कर रहा है।

विशेषज्ञों का मानना है कि अगर हालात जल्द नहीं सुधरे, तो इसका असर सिर्फ अस्पतालों तक सीमित नहीं रहेगा। दवाओं, मेडिकल उपकरणों और इलाज की लागत भी बढ़ सकती है, जिससे आम लोगों की जेब पर सीधा असर पड़ेगा।