ओम बिरला ने इस पूरे मामले पर खुद बड़ा फैसला लिया है। उन्होंने कहा है कि जब तक अविश्वास प्रस्ताव पर कोई अंतिम निर्णय नहीं हो जाता, तब तक वह लोकसभा अध्यक्ष की कुर्सी पर नहीं बैठेंगे और कार्यवाही का संचालन नहीं करेंगे। उन्होंने लोकसभा महासचिव को निर्देश दिया है कि विपक्ष की ओर से दिए गए नोटिस की जांच कर नियमानुसार कार्रवाई की जाए।
हालांकि संसदीय नियमों में ऐसा कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं है कि अविश्वास प्रस्ताव आने के बाद अध्यक्ष को तुरंत अपनी कुर्सी छोड़नी पड़े, लेकिन ओम बिरला ने खुद नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए यह कदम उठाया है। उनका कहना है कि इस मामले का निष्पक्ष और पारदर्शी समाधान जरूरी है, ताकि संसद की गरिमा बनी रहे।
विपक्ष का आरोप है कि लोकसभा अध्यक्ष ने उन्हें सदन में अपनी बात रखने का पूरा मौका नहीं दिया। उनका कहना है कि कई बार जनहित से जुड़े अहम मुद्दों को उठाने से उन्हें रोका गया और कार्यवाही को एकतरफा तरीके से चलाया गया। इसी कारण उन्होंने अविश्वास प्रस्ताव लाने का फैसला किया।
इस घटनाक्रम के बाद संसद का माहौल और ज्यादा तनावपूर्ण हो गया है। सत्ता पक्ष इसे विपक्ष की राजनीतिक रणनीति बता रहा है, जबकि विपक्ष का कहना है कि यह लोकतांत्रिक अधिकार का हिस्सा है। दोनों पक्षों के बीच टकराव अब खुलकर सामने आ गया है।
अब सभी की निगाहें 9 मार्च पर टिकी हैं, जब बजट सत्र के दूसरे चरण की शुरुआत होगी। उसी दिन यह तय हो सकता है कि अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा कैसे आगे बढ़ेगी और उसका नतीजा क्या होगा। यह भी देखा जाएगा कि संसद में इस मुद्दे पर किस तरह की बहस होती है और क्या विपक्ष अपने आरोपों को साबित कर पाता है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह मामला सिर्फ एक पद का नहीं, बल्कि संसद की कार्यशैली और लोकतांत्रिक मर्यादाओं से जुड़ा है। आने वाले दिनों में यह साफ हो जाएगा कि ओम बिरला दोबारा अध्यक्ष की कुर्सी संभालेंगे या इस अविश्वास प्रस्ताव से कोई नया राजनीतिक मोड़ आएगा।




