शी जिनपिंग की चौखट पर Trump : ‘महाचर्चा’ पर टिकी दुनिया की निगाहें

Donald Trump Xi Jinping Meeting in Beijing: बीजिंग में 9 साल बाद मिल रहे ट्रंप और जिनपिंग, बीजिंग की धरती पर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का आगमन केवल एक कूटनीतिक यात्रा नहीं, बल्कि पश्चिम एशिया में गहराते युद्ध के बादलों को छांटने की एक बड़ी कवायद; रुबियो ने शांति के लिए चीन की सक्रियता को बताया अनिवार्य…

ईरान संकट पर ट्रंप का मिशन बीजिंग: क्या रोक पाएंगे युद्ध? Pic Source : AP
ईरान संकट पर ट्रंप का मिशन बीजिंग: क्या रोक पाएंगे युद्ध? Pic Source : AP

तहलका डेस्क।

नई दिल्ली। बीजिंग की धरती पर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का आगमन चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के साथ केवल एक कूटनीतिक वार्ता नहीं, बल्कि पश्चिम एशिया में गहराते युद्ध के बादलों को छांटने की एक बड़ी कवायद है।

अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने इस यात्रा के निहितार्थ स्पष्ट करते हुए संकेत दिया है कि वॉशिंगटन अब ईरान संकट के समाधान के लिए चीन से महज मूकदर्शक बने रहने के बजाय एक ‘सक्रिय भूमिका’ की उम्मीद कर रहा है। रुबियो का मानना है कि ट्रंप और शी चिनफिंग की मुलाकात इस दिशा में एक निर्णायक मोड़ साबित हो सकती है।

इस यात्रा की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि चीन के उपराष्ट्रपति हान झेंग ने खुद हवाई अड्डे पर ट्रंप की अगवानी की, जो सामान्य प्रोटोकॉल से हटकर एक दुर्लभ सम्मान है।

बीजिंग की ओर बढ़ते हुए रुबियो ने स्पष्ट किया कि ईरान का वर्तमान रुख न केवल वैश्विक अस्थिरता का केंद्र है, बल्कि ऊर्जा के लिए समुद्री रास्तों पर निर्भर रहने वाले एशियाई देशों की अर्थव्यवस्था के लिए भी एक बड़ा खतरा है। अमेरिका का तर्क सीधा है: अगर फारस की खाड़ी में अशांति फैलती है, तो इसका सबसे बड़ा खामियाजा चीन जैसे ऊर्जा-आश्रित देशों को भुगतना होगा।

हालांकि, कूटनीति के इस मंच पर विरोधाभास भी साफ दिखे। जहाँ रुबियो चीन को सक्रिय करने की बात कह रहे हैं, वहीं ट्रंप ने अपने चिरपरिचित अंदाज में कहा कि उन्हें ईरान मामले में किसी की मदद की अनिवार्य जरूरत नहीं है और अमेरिका अपनी राह खुद बनाना जानता है।

फिर भी, रुबियो ने चीन को अमेरिका की सबसे बड़ी राजनीतिक चुनौती मानते हुए इस रिश्ते को दुनिया का सबसे महत्वपूर्ण संबंध करार दिया। उन्होंने साफ किया कि अमेरिका चीन के उत्थान का विरोधी नहीं है, बशर्ते वह अमेरिकी हितों की कीमत पर न हो।

अब देखना यह है कि क्या बीजिंग अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर ईरान को पीछे हटने के लिए मजबूर करेगा, या यह शिखर वार्ता महज कूटनीतिक शिष्टाचार तक सीमित रह जाएगी।