वायु प्रदूषण के बीच 2026 का स्वागत!

जैसे ही हम 2025 को विदा कह रहे हैं, जो अपने आप में कई चुनौतियों से भरा रहा, वैसे ही 2026 में हमारे सामने एक और अधिक गंभीर संकट खड़ा है, वायु प्रदूषण। यह बढ़ता हुआ खतरा पूरे भारत में सार्वजनिक स्वास्थ्य पर विनाशकारी असर डाल रहा है, लाखों लोगों के रोज़मर्रा के जीवन को प्रभावित कर रहा है और हर स्तर पर नीति-निर्माताओं से त्वरित कार्रवाई की मांग कर रहा है।

हालांकि दिल्ली जैसे शहर रिकॉर्ड प्रदूषण स्तरों के कारण अक्सर सुर्खियों में रहते हैं, लेकिन यह संकट राजधानी तक सीमित नहीं है। हमारी कवर स्टोरी “Air under Siege” (हवा पर हमला) इस बात की पड़ताल करती है कि कैसे वायु संकट दिल्ली की दमघोंटू धुंध से निकलकर छोटे शहरों की धूल-भरी फिज़ाओं तक फैल चुका है, और किस तरह यह रोज़मर्रा की ज़िंदगी के साथ-साथ पर्यावरणीय शासन को लेकर देश की सोच को भी नया रूप दे रहा है।

वायु प्रदूषण का स्तर लगातार खतरनाक सीमाओं को पार कर रहा है और सर्दियों के महीनों में यह अक्सर “गंभीर” श्रेणी में पहुंच जाता है। वाहनों से निकलने वाला धुआं, औद्योगिक उत्सर्जन, निर्माण कार्यों से उड़ती धूल और आसपास के राज्यों में पराली जलाने की मौसमी समस्या , यह सभी मिलकर प्रदूषकों का एक जानलेवा मिश्रण तैयार करते हैं, जिससे पीएम2.5 का स्तर अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा मानकों से कहीं अधिक हो जाता है। हालांकि सुर्खियों में अक्सर दिल्ली की स्मॉग छाई रहती है, लेकिन समस्या राजधानी तक सीमित नहीं है। लखनऊ, कानपुर, पटना, पंचकूला और वाराणसी जैसे छोटे शहर भी जहरीली हवा से जूझ रहे हैं।

इस प्रदूषण का सार्वजनिक स्वास्थ्य पर प्रभाव गंभीर और निर्विवाद है। शोध बताते हैं कि उच्च स्तर के वायु प्रदूषण के संपर्क में आने से सांस और हृदय से जुड़ी कई बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है,जैसे अस्थमा, ब्रोंकाइटिस, हार्ट अटैक और स्ट्रोक। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, दुनिया के सबसे प्रदूषित शहरों में भारत के कई शहर शामिल हैं, और हर साल वायु प्रदूषण से होने वाली मौतों की संख्या बेहद चिंताजनक है। बच्चे, बुज़ुर्ग और पहले से बीमार लोग इस संकट के सबसे अधिक शिकार हैं।

इस संकट को और भी गंभीर बनाता है इसका व्यापक सामाजिक असर। प्रदूषण से सबसे ज्यादा प्रभावित शहरों में लोगों का रोज़मर्रा का जीवन लगातार संघर्ष बन चुका है। लोग मास्क पहनने को मजबूर हैं, बाहर निकलने का समय सीमित कर रहे हैं और एयर प्यूरीफायर पर निर्भर हो गए हैं। शिक्षा व्यवस्था भी प्रभावित हो रही है, क्योंकि प्रदूषण खतरनाक स्तर पर पहुंचते ही स्कूल बंद करने पड़ते हैं। कुछ इलाकों में स्थिति इतनी खराब है कि स्थानीय अर्थव्यवस्था पर भी असर पड़ रहा है और उद्योगों को उत्पादन घटाना पड़ रहा है।

केंद्र सरकार ने स्वच्छ ईंधन को बढ़ावा देने, इलेक्ट्रिक वाहनों के प्रचार और उद्योगों के लिए कड़े उत्सर्जन मानक लागू करने जैसे कई कदम उठाए हैं, लेकिन इन नीतियों का ज़मीनी स्तर पर पालन कमजोर बना हुआ है। वहीं, राज्य सरकारें अक्सर आर्थिक विकास और पर्यावरणीय चिंताओं के बीच संतुलन बनाने में जूझती नजर आती हैं, जिसके कारण अलग-अलग क्षेत्रों में नीतियों का क्रियान्वयन असंगत रहता है।

राष्ट्रीय वायु गुणवत्ता सूचकांक को और सख्ती से लागू करने, क्षेत्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों को मजबूत करने जैसे प्रभावी प्रवर्तन तंत्र उद्योगों और नागरिकों—दोनों को जवाबदेह बना सकते हैं। इसके साथ ही स्वच्छ तकनीकों, हरित बुनियादी ढांचे और सार्वजनिक परिवहन प्रणालियों में अधिक निवेश करना देशभर में उत्सर्जन कम करने के लिए बेहद ज़रूरी है।

हमारी खोजी रिपोर्ट “SIR, Detention Centres and Elections”, जिसे स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम (SIT) ने तैयार किया है, में हम गुरुग्राम में चलाए गए पुलिस सत्यापन अभियानों की पड़ताल करते हैं। अवैध बांग्लादेशी प्रवासियों की पहचान के नाम पर चलाए गए इन अभियानों में बांग्ला भाषी कामगारों को हिरासत और उत्पीड़न का सामना करना पड़ा, लेकिन इसके बावजूद उनकी राजनीतिक निष्ठा पर कोई असर नहीं पड़ा।

नए साल के अवसर पर, हम 2026 के लिए तहलका के सभी पाठकों को हार्दिक शुभकामनाएं देते हैं।