‘मैं भी मुंह में जुबां रखता हूं, काश पूछो कि मुद्दा क्या है’

”आह को चाहिए एक उम्र असर होने तक’’। ‘आह को असर के लिए उम्र चाहिए और आह यही कि उम्र बीते जाती है और असर होता ही नहीं।’ मिजऱ्ा नौशा अका ग़ालिब को गुजरे जमाना हुआ और ज़माने ने बड़ी आसानी से उसे भुला दिया। 1869में ग़ालिब की मृत्यु हुई। इस लिहाज से मिजऱ्ा ग़ालिब को गए इस बरस 150 साल से ऊपर हो चुके हैं। दुनिया भर की खुशमस्ती और एक दूसरी ही खाम-ख्याली में डूबा समाज अपने समय के बड़े मौजू कलाकार को भूला बैठा है। ग़ालिब का जीवन संघर्ष से भरा रहा पर संघर्षों के बीच मुस्कराने की कला कोई ग़ालिब से सीखे। हर कदम पर किस्मत से लेकर आस-पास के लोगों से मिले धोखे ने ग़ालिब को कमजोर नहीं बनाया, बल्कि मज़बूत ही किया। पर बड़ा बेदर्द है ज़माना जाने के बाद की हकदारी तो बहुत ज़्यादा रही और रहते-रहते की कैफियत किसी ने ली ही नहीं। डिक्री कर दी गई अपने ही घर में नजऱबंद हो गए पेंशन के लिए धक्के खाते रहे, कलकत्ते में रहते और तकलीफ पाते ग़ालिब हर कदम पर कष्ट पाते रहे और अपने कलाम को धार देते रहे।

ग़लिब के कलाम का अनेक भाषाओं में अनुवाद हुआ, इस कलाम के अशआर आज भी उतने ही मौजंू हैं और हमें राह दिखाने में उनकी स्तादी का कोई जोड़ नहीं।

‘बना कर फकीरों का हम भेस ग़ालिब/ तमाशा-ऐ-अहले करम देखते हैं’ शायद इसीलिए ग़ालिब जैसा और कोई नहीं हो सका। ”हंै और भी दुनिया में सुखनवर बहुत अच्छे/ कहते है कि ग़ालिब का है अंदाज-ए-बयां और!

वरिष्ठ आलोचक रशीद अहमद सिद्दीकी कहते हैं ”अगर मुझसे पूछा जाए कि हिन्दुस्तान को मुगलिया सल्तनत ने क्या दिया तो मैं बेतकल्लुफ तीन नाम लूंगा- ग़ालिब, उर्दू और ताजमहल’’।

ग़ालिब के पिता मिर्जा अब्दुल्लाह बेग खान योद्धा थे। पिता के देहांत के बाद चाचा ने लाड-प्यार से इनका पालन किया। अपने पुरखों के पेशे की ओर न जाकर कलम के मुरीद बने – ग़ालिब। हिंदुस्तान की सरजमीं को आज गर्व है ग़ालिब के होने पर, लेकिन ग़ालिब का जीवन बहुत कष्टकर रहा। उनकी रचनाओं में ग़म और खुशी दोनों एक साथ मिलती है, दोनों को अलग करके देखना संभव नहीं। अली सरदार जाफरी लिखते हैं-

ग़ालिब ने निश्चय ही इस विश्वास से एक बड़ा आशावादी दृष्टिकोण अपनाया जो उनके काव्य में बाग-ओ-बहार की तरह दौड़ रहा है। दुख और संताप आनन्द के नवीनीकरण की बुनियाद है। इसीलिए इनसे विमुख रहना मृत्यु और खेलना जीवन की दलील है। स्वंय मृत्यु जीवन का आनन्द बढ़ा देती है और कार्य-आनन्द का साहस प्रदान करती है। ग़ालिब ने अपने एक फारसी कसीदे में कहा है कि मेरा जूनुन मुझे बेकार नहीं बैठने देता, आग जितनी तेज है, उतनी ही मैं उसे और हवा दे रहा हूं। मौत से लड़ता हंू और नंगी तलवारों पर अपने शरीर को फेंकता हूं, तलवार और कटार से खेलता हूं और तीरों को चूमता हूं।’’(दीवान-ए- ग़ालिब, अली सरदार जाफरी, पृष्ठ 10)

ग़ालिब के दादा-ए-परिवार समरकंद से हिंदुस्तान आए जहां उनका संबंध पंजाब गवर्नर मुगलिया शहंशाह शाह आलम और जयपुर के महाराज से रहा। खुद ग़ालिब के पिता भी उसी क्षेत्र से जुड़े रहे।

ग़ालिब की उम्र चार बरस भी नहीं रही होगी जब उनके पिता का इंतकाल हो गया। ग़ालिब की शुरूआती जि़ंदगी अपने ननिहाल में ही गुजऱी। यह ग़ालिब के जीवन के सबसे खूबसूरत लम्हे थे जिन्हें याद करके उन्होंने कई अशआर भी लिखे और खत भी, जहां रोमानियत ज़्यादा है और अहसास-ए- बन्दिगी भी।

ग़ालिब भाषा के मुआमले में साफ जुबान के हकदार थे। पर्शियन भाषा की नुमाइंदगी करते थे और जब उर्दू में लिखने लगे तो शुरू में तो उसे नौकरी ही मानकर लिख पाए। हकीर को खत में लिखते हुए कहते हैं ‘दोस्त तुम मेरी गज़लों की तारीफ करते हो पर मैं शर्मसार हूं क्योंकि ये गज़ल नहीं सिर्फ रोज़ी का ज़रिया है। मुझे सुकूं तो फारसी में लिखने से मिलता है पर हजार हैफ उसे को कोई पसंद नहीं करता। पर यह भी सच है कि उर्दू आम-फहम जबान होने के कारण जनता के सीधे दिल तक पहुंचने में कामयाब थी और ग़ालिब ने दिलों में घर इसी भाषा के मार्फत किया। गुलज़ार लिखते हैं, ग़ालिब अपने समय के गर्वीले लेखक थे और अपने बारे में अहं करने के हकदार भी थे। वे जनता की आम जबान में लिख रहे थे और बाकी शायर फारसी में। ग़ालिब को इस बात का गर्व था कि वे जनता की जबान में लिख रहे थे।

ग़ालिब को अपने समय में वह इज्जत-सम्मान नहीं मिला जिसके वे हकदार थे। ग़ालिब इस बात को जानते भी थे कि उनकी शायरी का स्तर सचमुच ऊँचा है। अपने समय के शायरों के साथ उनके कुछ तीखे कुछ खट्टे अनुभव हुए जिसका जिक्र उनके अशआरों में भी मिलता है।पर इससे बढ़कर बात यह थी कि ग़ालिब की शायरी की परख इतनी बेहतरीन थी कि अगर किसी का शेर पसंद आ जाए तो उसके बदले अपनी शायरी को एक तरफ रख देने की ताकत भी रखते थे। इस संबंध में दो किस्से कहे जाते हैं- पहला ज़ौक के साथ उनके संबंधों के बारे में और दूसरा मोमिन के संबंध में। टीएनराज इन किस्सों का जिक्र करते हैं-

किसी के शेर की तब तक दाद नहीं देते थे जब तक वह दिल में चुभ न जाए। चुनांचे जब उन्होंने मोमिन का यह शेर सुना – तुम मेरे पास होते हो, गोया/ जब कोई दूसरा नहीं नहीं होता। तो बहुत तारीफ की और कहा, काश! मोमिन मेरा सारा दीवान मुझसे ले लेता और यह शेर मुझ को दे देता। मुंशी गुलाम अली खान मर्हूम ने किसी को सुनाने के लिए ज़ौक का यह शेर पढ़ा, ”अब तो घबरा के कहते हैं कि मर जाएंगे/मर के भी चैन न पाया तो किधर जाएंगे’’। मुझसे बार-बार पढ़वाते थे और सर धुनते थे। तनातनी के बावजूद अपने ही समकालीनों के लिए ग़ालिब का यह अंदाज उनके कद को कुछ और बड़ा कर देता है। अपने समकालीनों के बीच ग़ालिब को कभी माकूल जगह नहीं मिली, उनकी शायरी को हमेशा कठिन कहकर खारिज किया गया । यहां तक कि ग़ालिब ने भी एक समय के बाद यह मानना शुरू कर दिया कि उनके शुरूआती अशआर कठिन थे। सुरेन्द्र वर्मा के कैद-ए-हयात(नाटक) में इसक विस्तृत उल्लेख है।

यासीन: तुम लफ्ज़ों का ऐसा इस्तेमाल क्यों करते हो कि उनका मानी खेंचतानकर निकालना पड़े? जैसे तुम्हारी एक गज़ल वो भी है, रदीफ वे वाली।

 मिजऱ्ा: कोई फनकार रिवायत को तोड़ता भी है। चूंकि जमाम लफ्ज एक ही माने में लगातार इस्तेमाल से घिस चुके होते हैं। दूसरी बात यह कि यों तो एक ही मतलब को जाहिर करने वाले कई लफ्ज़ होते हैं, फिर भी उसमें मानी के जरा -से किसी नामालूस साए का फर्क होता है। फनकार अपने इजिहार के खायियत के लिहाज से और अपने काबिलियत के मुताबिक उसमें नए मानी पैदा करता है।

यासीन: बला से पल्ले ख़ाक न पड़े। (कैद-ए-हयात, पृष्ठ29)

ग़ालिब की रचनाएं लफ्ज़ों के नए इस्तेमाल और मानी खोज ढूंढने की मिसाल कायम करती हैं। शायद इसीलिए ग़ालिब कहते हैं कि गज़ल में कसीदे का रंग जोड़कर उन्होंने ऐसी नई शैली ईज़ाद की है जिसके अनुकरण के लिए वे शायर दोस्तों को बुलावा देते हैं-

अदा-ए-ख़ास से ग़ालिब हुआ है नुक्ता सरा/सला-ए-आम है, याराने-नुक्तादां के लिए।

ग़ालिब का दीवान तो जग-प्रसिद्ध है ही इसके अलावा उनकी कृतियां हैं -ऊदे-हिन्दी, उर्दू-ए-मुअल्ला, कुल्लियात-ए-नज्म-फारसी, कुल्लियात-ए-नस्र फारसी (इसमें पंज आहंग, महरे नीमरोज, दस्तम्बू शामिल हैं), दुआ-ए-सबाह, कातिए बुर्हान, दुरफ्श कावियानी। मिजऱ्ा शुरू में असद नाम से ही शेर लिखते थे बाद में ग़ालिब उपनाम उसमें जुड़ गया।

परिवार के स्तर पर भी मिजऱ्ा का संघर्ष कम नही रहा। संतानों की मृत्यु होने के कारण उनके और उमराव के बीच संबंध तीखे और उदासीन ही रहे। अंत में उमराव की आपा ने अपने बड़े बेटे जैनुल को इन्हें सौंप दिया। जैनुल की मृत्यु के बाद उसके बच्चों की जिम्मेदारी मिजऱ्ा ग़ालिब ने ली पर इस घटना ने उनके मन को बहुत ठेस पहुंचाई। ग़ालिब के कलाम में शायद इसीलिए दर्द का हद से गुजरना है,दवा हो जाना’।

दिल्ली के शाहजहांबाद में बल्लीमारान की हवेली ग़ालिब का घर कभी दिल्ली की शान रहा। आज भी दिल्ली के दिल की शान है वो कूचे और गलियां जहां कभी ग़ालिब के कदम पड़े। ग़ालिब ने अपने शेरों में दिल्ली का जि़क्र बड़ी शान से किया है ‘ दिल्ली के रहने वालों असद को सताओ मत। बेचारा चंद रोज़ का यो मेहमान है।’ इस लिहाज से अगर पूछा जाए तो दिल्ली आज ग़ालिब को याद करती है या नहीं? अगर हां तब कैसे और नहीं तो क्यों। दिल्ली में ग़ालिब की उपस्थिति एक ऐतिहासिक तथ्य है और उनकी मृत्यु भी। क्योंकि आखिर उनका मकबरा निज़ामुद्दीन में ही है। नई दिल्ली के अंग्रेजों की राजधानी बनने से पहले ही ग़ालिब इस दुनिया -ए-फानी को अलविदा कह गए। शायद यही कारण है कि वे आज नयी दिल्ली की कहानी से गायब हैं।

ग़ालिब के खत भी इतने माकूल और मज़बूत हैं कि अगर वे शायर न होते तो भी उनके अफसानों और खतों से उनकी वही शख्सियत बनी होती जो शायरी के बल-बूते है। वे शहर में किसी बीमारी का जि़क्र करते हैं और इतनी तकलीफ से करते है कि सचमुच इतने लोग मर गए शायद हमारे जाने के बाद रोने को कोई रहेगा ही नहीं। ग़ालिब अपने समय की परेशानियों से सीधा ताल्लुक रखत थे, इसीलिए बीमारी (दवा) के समय, उससे मुंह मोड़कर बैठे नहीं, बल्कि अपने खतों में इसका सल्लेख भी किया।

पांच लश्कर का हमला पै दर पै इस शहर पर हुआ। पहला बागियों का लश्कर उसने शहर का एतबार लुटा। दूसरा लश्कर खा़कियों का उसमें जान-ओ-माल-नामूस व मकान व मकीन व आसमान व ज़मीन व आसार-ए-हस्ती सरासर लुट गए। तीसरा लश्कर का, उसमें हज़ारों आदमी भूखे मरे। चौथा लश्कर हैज़े का उसमें बहुत-से पेट भरे मरे। पांचवां लश्कर तप का, उसमें ताब व ताकत अमूमन लुट गई। मरे आदमी कम, लेकिन जिसको तप आई, उसने फिर आज़ा में ताकत न पाई। अब तक इस लश्कर ने शहर से कूच नहीं किया।

उनकी शायरी के कुछ नमूने पेश हैं-

न गुले-नग्मा हूं, न पर्दा-ए-साज़/मैं हूं अपनी, शिकस्त की आवाज़।

मौत का एक दिन मुएय्यन है/नींद क्यों रात भर नहीं आती।

हस्ती के मत फेर में आ जाइयो ‘असद’/आलम तमाम, हल्का-ए-दामे-खय़ाल है।

दरिया-ए-म्यासी, तुनुक-आबी से हुआ खुश्क/ मेरा सरे-दामन भी अभी, तर न हुआ था।

अगले वक्तों के है ये लोग, इन्हें कुछ न कहो/ जो मै-ओ-नग्मा को, अंदोह रुबा कहते हैं।

ग़ालिब की शायरी के इन नमूनों में दुनिया के धोखे से सावधान रहने की सीख भी है और दुनिया को माया समझने के प्रति चेतावनी भी। शराब और नग्मों से ग़म में होने वाले इजाफे का जि़क्र भी है और शराब न छोड़ पाने के बावजूद उससे मुंह मोडऩे की कोशिश भी। ग़ालिब मानते थे कि शराब पीने की लत अच्छी नहीं और बार-बार सागरे-जा़म से जामे-सिफाल को बेहतर भी बताते हैं। पर साथ ही ज़ाम की तारीफ भी छोड़ नहीं पाते जां फिज़ा है बादा, जिसके हाथ में जाम आ गया ग़ालिब की शायरी में हर अंदाज है और अपने युग की आवाज़ भी। पर आज समय बदल गया है गा़लिब को भी लोग तभी याद करेंगे जब उन पर सेमिनार और चर्चा की बाग़-ओ-बहार होगी। अब समय कला का नहीं कला-बाजारी का है और होड़ में है जमानाद्य अब लोग रश्क नहीं, हसद करते हैं। ग़ालिब होते तो यही कहते-

हम को उन से वफा की है उम्मीद/ जो नहीं जानते वफा क्या है

तब तक ग़ालिब के अकेलेपन को सलाम।