नई दिल्ली: अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी ने एक बार फिर भारत की ऊर्जा सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ा दी है। विशेषज्ञों का मानना है कि तेल की कीमतों में अचानक उछाल और आपूर्ति में रुकावट से यह साफ हो जाता है कि भारत अभी भी आयातित कच्चे तेल पर काफी हद तक निर्भर है। ऐसे में देश को धीरे-धीरे ऐसे विकल्पों की ओर बढ़ना होगा जिससे इस निर्भरता को कम किया जा सके।
ऊर्जा और पर्यावरण से जुड़े विशेषज्ञ कार्तिक गणेसन, जो काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वॉटर (CEEW) में फेलो और डायरेक्टर – स्ट्रैटेजिक पार्टनरशिप हैं, का कहना है कि कच्चे तेल के दाम बढ़ने की स्थिति भारत के लिए एक चेतावनी की तरह है। उनका मानना है कि यह समय है जब देश को आयातित तेल पर अपनी निर्भरता कम करने के लिए ठोस कदम उठाने चाहिए।
उनके अनुसार भारत की बड़ी चुनौती यह है कि परिवहन और घरेलू जरूरतों के लिए बड़ी मात्रा में तेल आधारित ईंधन का इस्तेमाल होता है। खासकर निजी वाहनों की बढ़ती संख्या के कारण पेट्रोल और डीजल की मांग लगातार बढ़ रही है। यदि इस मांग को संतुलित करने के लिए सही मूल्य निर्धारण और नीतिगत कदम उठाए जाएं तो तेल की खपत को धीरे-धीरे कम किया जा सकता है।
ऊर्जा क्षेत्र के जानकारों के मुताबिक, भारत जैसे बड़े देश के लिए ऊर्जा की मांग लगातार बढ़ना स्वाभाविक है। इसलिए सरकार और नीति-निर्माताओं के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वे ऊर्जा सुरक्षा बनाए रखते हुए आयात पर निर्भरता को कम करने के रास्ते तलाशें।
विशेषज्ञों का कहना है कि अगर अभी से नीतिगत बदलाव और वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों पर ध्यान दिया जाए, तो आने वाले समय में भारत तेल की कीमतों में होने वाले उतार-चढ़ाव के असर से काफी हद तक खुद को बचा सकता है।




