तहलका की पड़ताल: मण्डावा में बॉलीवुड और अंदर की हकीकत

फिल्म जगत ने राजस्थान के एक उपेक्षित कस्बे मण्डावा की किस्मत तो बदल दी

राजस्थान का मण्डावा कस्बा फिल्मों की शूटिंग के लिए बॉलीवुड जगत की लगातार पसंद बना हुआ है। बॉलीवुड की लगातार उपस्थिति ने मण्डावा में रोजगार का सृजन करने के साथसाथ पर्यटन को भी बढ़ावा दिया है, जिससे इस कस्बे की ऐतिहासिक हवेलियों ने लोगों का नए सिरे से ध्यान आकर्षित किया है। लेकिन इस विकास के पीछे एक गुप्त नेटवर्क मौजूद है, जो स्थानों, लॉजिस्टिक्स और क्लीयरेंस का प्रबंधन करता है और चुपचाप शहर की अर्थव्यवस्था और प्रासंगिकता को नया आकार दे रहा है। तहलका एसआईटी की रिपोर्ट :-

राजस्थान के मण्डावा की रंगीन हवेलियों के पीछे एक ऐसी अनजानी दुनिया छिपी है, जिसे बॉलीवुड के लगातार दौरों ने आकार दिया है। कई वर्षों से फिल्म क्रू इस शांत ऐतिहासिक शहर में रहते, काम करते और अपनी छाप छोड़ते आए हैं। लेकिन चकाचौंध और आर्थिक हलचल से परे स्थानीय लोग फिल्म सितारों की निजी आदतों, विशेष व्यवस्थाओं और गुप्त लेन-देन के बारे में बात करते हैं, जो शायद ही कभी जनता की नजरों में आते हैं। तहलका की पड़ताल इन प्रत्यक्ष वृत्तांतों को एक साथ जोड़कर यह उजागर करती है कि बॉलीवुड की उपस्थिति ने वास्तव में मण्डावा को प्रत्यक्ष रूप से भी और बंद दरवाजों के पीछे किस प्रकार नया रूप दिया है।

‘अभिनेता सलमान खान का खाना रेड वाइन में पकाया जाता था और मैं इस बात की पुष्टि कर सकता हूं, क्योंकि मैं बार से सलमान के रसोइए को रेड वाइन दिया करता था, जो उनके साथ मुंबई से आया था। उनका रसोइया उनके लिए मटन और चिकन को तेल में पकाकर तैयार करता था और पानी के बजाय उसमें लाल शराब मिलाई जाती थी।’ -राजस्थान की एक ऐतिहासिक हवेली में बार मैनेजर पूरन सिंह ने तहलका के गुप्त रिपोर्टर से कहा।

‘दिन भर की शूटिंग पूरी करने के बाद सलमान खान जिम जाते थे और उसके बाद लगभग हर दिन शाम 7 बजे वह निर्देशक कबीर खान, अपने अंगरक्षक शेरा और अन्य लोगों के साथ हवेली की छत पर बैठकर बकार्डी व्हाइट रम पीते थे। वे लोग रात के 2 बजे तक शराब पीते थे और मैं ही उनके लिए पेग बनाता था। यह सर्दियों का मौसम था। इसलिए वे गैस हीटरों के साथ छत पर बैठे रहते थे और सलमान इतनी अधिक शराब पीता था कि शराब पीने के बाद वह ठीक से चल भी नहीं पाता था।’ -पूरन ने आगे बताया।

‘मैंने अपनी हवेली में अभिनेता आमिर खान की भी सेवा की है। जब भी वह शूटिंग से लौटता था, तो वह ताजा जूस मांगता था। वह दाल और चावल हाथ से खाता था और उंगलियां चाटता था। वह कभी चम्मच का इस्तेमाल नहीं करता था। आमिर एक अच्छा आदमी है। वह अभिनेता संजय दत्त, अभिनेत्री अनुष्का शर्मा और निर्देशक राजकुमार हिरानी के साथ हमारी हवेली में ठहरे थे।’ -पूरन ने कहा।

‘मुझे अभिनेता अजय देवगन भी पसंद हैं। वह अपने कमरे के अंदर शराब पीता था और अक्सर मुझसे बीड़ी मांगता था, जिसे वह पीता था। एक बार जब बीड़ी का इंतजाम नहीं हो सका, लेकिन वह बीड़ी पीने पर अड़ा रहा, तो मैंने उसे बताया कि हवेली का चौकीदार बीड़ी पीता है। वह चौकीदार के पास गया और उसके साथ बीड़ी पी।’ -पूरन ने कहा।

‘पहले यहां सिर्फ विदेशी ही आते थे। अब, जब से बॉलीवुड ने यहां शूटिंग शुरू की है, यह भारतीयों के बीच भी लोकप्रिय हो गया है।’ -पूरन ने जोड़ा।

‘यह जगह डेस्टिनेशन वेडिंग के लिए भी मशहूर है। न केवल भारतीयों के बीच, बल्कि विदेशी नागरिकों के बीच भी। मेरी हवेली में हुई पिछली 12 डेस्टिनेशन शादियों में दूल्हा या दुल्हन में से कोई एक विदेशी था।’ -पूरन ने कहा।

‘इस जगह पर अब तक मेरी मुलाकात विजय वर्मा और अन्य लगभग 50 फिल्म सितारों से हो चुकी है। मुझे उनके सारे नाम भी ठीक से याद नहीं हैं। हाल ही में मेरी मुलाकात अभिनेता सैफ अली खान से हुई, जो यहां अपनी फिल्म ‘जम्हूरियत’ की शूटिंग कर रहे थे।’ -एक ऐतिहासिक हवेली के कर्मचारी दीपक ने कहा।

‘बॉलीवुड को शूटिंग के लिए यह जगह पसंद है और इसे मिनी मुंबई कहा जाता है, क्योंकि यह ऐतिहासिक हवेलियों से भरी हुई है। फिल्म की शूटिंग के कारण इस क्षेत्र के लोगों को रोजगार भी मिल रहा है। एक फिल्म की शूटिंग में विभिन्न उद्देश्यों के लिए लगभग 1,000 लोगों की आवश्यकता होती है और ये सभी लोग स्थानीय क्षेत्र से आते हैं, जिससे उन्हें रोजगार मिलता है।’ -दीपक ने जोड़ा।

‘मेरे ऊंट का इस्तेमाल यहां शूट हुई पांच से सात फिल्मों में किया गया है। यह जगह बॉलीवुड की पसंदीदा शूटिंग लोकेशन बन गई है, जिसके चलते यहां कई फिल्मों की शूटिंग होती है और स्थानीय लोगों के लिए रोजगार के अवसर पैदा होते हैं। उन्हें सिर्फ मेरे ऊंट की ही जरूरत नहीं होती, बल्कि कभी-कभी उन्हें बैलगाड़ी, घोड़े और वाहनों के अलावा और भी बहुत कुछ चाहिए होता है। इन सबसे स्थानीय लोगों के लिए रोजगार के अवसर पैदा होते हैं।’ -एक ऊंट गाड़ी के मालिक गोपाल सिंह ने कहा।

‘पिछले 20 वर्षों से मैं इस क्षेत्र में फिल्म निर्माण के व्यवसाय में हूं और लगभग 20-22 फिल्मों पर काम कर चुका हूं। पीके, बजरंगी भाईजान, जब वी मेट, लव आज कल, शुद्ध देसी रोमांस और अन्य जैसी ब्लॉकबस्टर फिल्मों की शूटिंग मेरी लॉजिस्टिक्स सहायता से यहीं की गई थी। मुंबई और दिल्ली के फिल्म निर्माता हवेली की बुकिंग और व्यवस्था के लिए मुझसे तीन महीने पहले ही संपर्क करते हैं। मैं स्थानीय प्रशासन से अनुमति प्राप्त करने सहित सभी व्यवस्थाएं करता हूं।’ -सरकार द्वारा अनुमोदित टूर गाइड संदीप सिंह ने कहा।

‘बॉलीवुड को यहां शूटिंग करना बहुत पसंद है, क्योंकि हवेलियों की वास्तुकला पाकिस्तान की वास्तुकला से मिलती-जुलती है। इसलिए पाकिस्तान पर आधारित फिल्मों की शूटिंग यहां की जाती है, ताकि वैसा ही माहौल बनाया जा सके। यहां दूसरी सभी श्रेणियों की हवेलियां भी आसानी से उपलब्ध हैं। फिल्म की शूटिंग से इस क्षेत्र में रोजगार के अवसर भी पैदा हुए हैं।’ -संदीप ने आगे जोड़ा।

‘फिल्म की शूटिंग की अनुमति लेने के लिए मैं अक्सर स्थानीय अधिकारियों को गुपचुप तरीके से पैसे देता हूं।’ -संदीप ने दावा किया।

उपरोक्त अंश राजस्थान के झुंझुनू जिले के शेखावाटी क्षेत्र में स्थित एक ऐतिहासिक कस्बा मंडावा के निवासियों के वृत्तांत हैं। ठाकुर नवल सिंह द्वारा 1755 में स्थापित मंडावा को मीडिया में व्यापक रूप से एक ‘खुली हवा वाली कला दीर्घा’ के रूप में दिखाया जाता है, जो अपनी चित्रित हवेलियों के लिए प्रसिद्ध है और बॉलीवुड फिल्मों की शूटिंग के लिए एक प्रमुख स्थान है। यह कैसल मण्डावा सहित अपने विरासत होटलों के लिए भी जाना जाता है। कभी ऐतिहासिक व्यापार मार्गों पर एक महत्वपूर्ण पड़ाव रहा यह शहर धनी व्यापारियों को आकर्षित करता था, जिन्होंने भव्य घर बनवाए, जिससे यह वास्तुकला, कला और फिल्म शूटिंग के लिए जाना जाने वाला एक प्रमुख पर्यटन स्थल बन गया। स्थानीय निवासियों को अपनी सांस्कृतिक विरासत पर बहुत गर्व है।

मण्डावा की हवेलियों का निर्माण मुख्य रूप से 18वीं और 20वीं शताब्दी के बीच गोयनका, चोखाना और लाडिया जैसे धनी मारवाड़ी व्यापारी परिवारों द्वारा किया गया था। कारवां व्यापार से समृद्ध हुए इन व्यापारियों ने प्रतिष्ठा के प्रतीक और पारिवारिक आवास के रूप में भव्य भित्तिचित्रों से सजे महलों का निर्माण किया। ‘ऐ दिल है मुश्किल’ और ‘मिमी’ सहित कई बॉलीवुड फिल्मों की शूटिंग भी यहां हुई थी। मण्डावा मारवाड़ी समुदाय से गहराई से जुड़ा हुआ है। हालांकि बाद में कई लोग कोलकाता, मुंबई और अहमदाबाद जैसे शहरों में चले गए, फिर भी यह शहर एक सांस्कृतिक केंद्र के रूप में अपनी भूमिका निभाता रहा है।

अपनी समृद्ध विरासत और फिल्म निर्माण स्थल के रूप में लोकप्रियता के बावजूद मंडावा को वह निरंतर राष्ट्रीय ध्यान नहीं मिला है, जिसका वह हकदार है। कई मायनों में यह एक भुला हुआ शहर बन गया है, जबकि बड़ी-बड़ी फिल्मों की शूटिंग अभी भी वहां होती रहती है। हाल ही में सैफ अली खान ने शहर में एक फिल्म की शूटिंग पूरी की।

तहलका रिपोर्टर ने मण्डावा की यात्रा की और कई स्थानीय लोगों से मुलाकात की, जिन्होंने यहाँ फिल्म की शूटिंग के लिए आने वाले बॉलीवुड सितारों की अनसुनी कहानियां सुनाईं। इस दौरान तहलका रिपोर्टर की मुलाकात एक बार मैनेजर पूरन सिंह से हुई, जो वर्तमान में विवाना कल्चर होटल में कार्यरत हैं।

नीचे दिए गए संवाद में पूरन 2015 की एक घटना का वर्णन करते हैं, जब बॉलीवुड स्टार सलमान खान अपनी फिल्म बजरंगी भाईजान की शूटिंग के लिए मंडावा गए थे। उस समय पूरन ऐतिहासिक हवेली कैसल मंडावा में काम कर रहे थे, जहां सलमान खान और उनकी फिल्म यूनिट ठहरी हुई थी। पूरन सिंह के अनुसार, सलमान के भोजन को मुंबई से उनके साथ आए रसोइयों द्वारा तैयार किया जाता था, जिनमें रेड वाइन का इस्तेमाल होता था और जिन्हें रसोई में एक अलग जगह दी गई थी। पूरन ने कहा कि वह इस बात की पुष्टि कर सकते हैं, क्योंकि उन्होंने खुद सलमान के रसोइए को मटन और चिकन बनाने के लिए होटल के बार से रेड वाइन दी थी।

रिपोर्टर : सलमान खान खाना क्या खाता था?

पूरन : खाना उसका खुद ही आया था बनाने वाला।

रिपोर्टर : खाना बनाने वाला साथ आया था मुंबई से?

पूरन : हां, उनको किचन का एक पार्ट दे रखा था…, वहीं बनाते थे वो।

रिपोर्टर : क्या-क्या बनाते थे?

पूरन : वो पता नहीं क्या बनाते थे, रेड वाइन में बनता था, इतना पता है।

रिपोर्टर : रेड वाइन में?

पूरन : हां मटन, चिकन सब रेड वाइन में बनता था।

रिपोर्टर : मतलब तेल, घी में तो मैंने सुना है… मगर रेड वाइन में?

पूरन : हां, मतलब तेल में तो जैसे बना दिया, पानी की जगह रेड वाइन डालना है।

रिपोर्टर : अच्छा, ये आपने सामने, …आपने खुद देखा है?

पूरन : हां।

रिपोर्टर : आपके सामने?

पूरन : अरे हां हां, …मैंने ही तो इश्यू किया था उनके लिए रेड वाइन बार से।

रिपोर्टर : अच्छा बार भी है होटल के अंदर?

पूरन : हां, बार से सर।

अब पूरन सिंह ने अभिनेता सलमान खान के बारे में एक और किस्सा साझा किया, जो 2015 में बजरंग भाईजान की शूटिंग के लिए मंडावा में थे। पूरन के अनुसार, दिन भर की शूटिंग पूरी करने के बाद, सलमान खान जिम जाते थे और फिर लगभग हर दिन शाम 7 बजे, निर्देशक कबीर खान, उनके अंगरक्षक शेरा और अन्य लोगों के साथ हवेली की छत पर बैठकर बकार्डी व्हाइट रम पीते थे। पूरन ने बताया कि वे लोग सुबह करीब 2:30 बजे तक शराब पीते थे और वही उनके लिए पेग बनाता था। पूरन ने आगे बताया कि सर्दी का मौसम था, इसलिए वे गैस हीटरों के साथ छत पर बैठे रहते थे, और सलमान खान खूब शराब पीते थे, और रात के अंत तक, वह ठीक से चल भी नहीं पाते थे। पूरन ने तहलका को यह भी बताया कि सलमान खान के ठहरने के दौरान उन्हें शराब परोसने वाला वही व्यक्ति था।

पूरन : और जो बजरंगी भाईजान है सलमान खान, वो सब वहां रुके थे कैसल (किले) मण्डावा में…।

रिपोर्टर : आपके सामने?

पूरन : मैं ही सर्विस करता था सलमान को दारू का…।

रिपोर्टर : अरे नहीं… क्या नाम है आपका?

पूरन : पूरन सिंह।

रिपोर्टर : तो सलमान कैसल मण्डावा में रुके थे?

पूरन : हां 26 दिन रुका था वो कास्टल मण्डावा में…

रिपोर्टर : कौन सी दारू पीता था?

पूरन : बकार्डी वाइन।

रिपोर्टर : बकार्डी रम?

पूरन : हां जी, सर्दी थी न उस समय, पूरी बोतल खीचता था वो, …खड़ा भी नहीं हो पाता था, इतनी पी लेता था।

रिपोर्टर : क्या दिन में पी लेता था?

पूरन : नहीं, शाम को 7 बजे से, छत पर।

रिपोर्टर : छत पर खुले में?

पूरन : नहीं, वो हीटर लगे रहते थे गैस के…।

रिपोर्टर : अकेला पीता था या सबके साथ?

पूरन : नहीं, कबीर खान के साथ, डायरेक्टर के साथ, एक उसका वो था… क्या नाम है, ….शेरा…।

रिपोर्टर : उसका जो बॉडीगार्ड है?

पूरन : हां।

रिपोर्टर : मतलब खुले आसमान के नीचे गैस हीटर लगाकर?

पूरन : हां, ढाई बजे जाता था वो कमरे में।

रिपोर्टर : इतनी पी लेता था?

पूरन : पूरी बोतल अकेले पी जाता था, …बकार्डी वाइट रम…।

रिपोर्टर : आप ही सर्व करते थे?

पूरन : हां।

रिपोर्टर : आपको टिप दिया था?

पूरन : दिया था जाते समय…. साड़े सात हज़ार (7.5के) …।

रिपोर्टर : आपको काम नहीं लगा?

पूरन : उसने नहीं दिया, …उसके साथ जो था, उसको बोला ‘इनको टिप दे दो।’

इसके बाद पूरन ने बॉलीवुड सुपरस्टार आमिर खान से जुड़ा एक और किस्सा सुनाया, जो बजरंगी भाईजान से पहले फिल्माई गई फिल्म पीके की शूटिंग के लिए मण्डावा आए थे। पूरन ने बताया कि आमिर खान अपनी यूनिट के साथ कैसल मण्डावा में भी रुके थे, जहां वह खुद कार्यरत थे। उन्होंने कहा कि आमिर खान के प्रवास के दौरान उन्होंने व्यक्तिगत रूप से उनकी सेवा की थी। पूरन के अनुसार, आमिर जब भी शूटिंग से लौटता था, तो वे ताजा जूस मांगता था। उन्होंने बताया कि आमिर दाल और चावल हाथ से खाता था और अपनी उंगलियां चाटता था, वह कभी चम्मच का इस्तेमाल नहीं करता था। पूरन ने कहा- ‘आमिर एक अच्छे इंसान हैं। वह अभिनेता संजय दत्त, अभिनेत्री अनुष्का शर्मा और निर्देशक राजकुमार हिरानी के साथ हमारी हवेली में रुके थे।’

पूरन : और उसकी शूटिंग भी हुई थी पीके की, वो बहुत सीधा था।

रिपोर्टर : आमिर खान आया था?

पूरन : वो दारू नहीं पीता, वो फ्रेश जूस पीता था।

रिपोर्टर : वो कहां रुका था?

पूरन : कैसल मण्डावा में, …उसकी ड्यूटी भी मैंने ही की थी।

रिपोर्टर : अच्छा?

पूरन : वो तो दाल चावल भी ऐसे उंगली से चाटता था।

रिपोर्टर : अच्छा, मतलब चम्मच यूज नहीं करता था?

पूरन : हां।

रिपोर्टर : वो कैसे आदमी था?

पूरन : अच्छा, आदमी था; जब भी आता था- ‘फ्रेश जूस दे दो।’

रिपोर्टर : कितने लोग रहते थे उसके साथ?

पूरन : उसके साथ पूरी टीम रहती थी…. संजय दत्त…।

रिपोर्टर : राजकुमार हिरानी, अनुष्का…?

पूरन : हां।

रिपोर्टर : वो कितने दिन रुके थे?

पूरन : वो भी 15-20 दिन रुके, फिर वहां से वो शिफ्ट हुए डिजर्ट रिजॉर्ट में, जो कैसल मंडावा वालों का ही है।

रिपोर्टर : डिजर्ट रिजॉर्ट कहां है?

पूरन : वहीं मण्डावा में, ….वो पैलेस है, उसमें 93 रूम्स हैं…।

जब हम पूरन से बात कर रहे थे, तो उन्होंने उन बॉलीवुड सितारों के बारे में किस्से सुनाना जारी रखा, जो फिल्म की शूटिंग के लिए मण्डावा आए थे। इस बार उन्होंने अभिनेता अजय देवगन के बारे में बात की। पूरन ने कहा कि उन्हें अजय देवगन पसंद थे और उन्होंने दावा किया कि अभिनेता अजय देवगन उनके कमरे में शराब पीते थे और अक्सर उनसे पीने के लिए बीड़ी मांगते थे। पूरन ने आगे बताया कि एक बार जब बीड़ी उपलब्ध नहीं थी, तो उन्होंने अजय देवगन से कहा कि हवेली का चौकीदार बीड़ी पीता है। इसके बाद अभिनेता अजय देवगन चौकीदार के पास जाकर बैठ गए और एक बीड़ी पीने लगे। पूरन यह भी कहते हैं कि उन्होंने वहां 11 साल तक काम किया और कई बड़े अभिनेताओं को देखा। उन्होंने ‘शुद्ध देसी रोमांस’ की शूटिंग के दौरान ऋषि कपूर, सुशांत सिंह राजपूत और परिणीति चोपड़ा के आने का जिक्र किया।

रिपोर्टर : आपको कौन  अच्छा लगा?

पूरन : मुझको सबसे अच्छा लगा अजय देवगन, उसको बीड़ी चाहिए होती है।

रिपोर्टर : उसको कहां देख लिया?

पूरन : ‘कच्चे धागे’ की शूटिंग हुई थी।

रिपोर्टर : कैसल मण्डावा में, तब भी आप वहीं थे?

पूरन : हां।

रिपोर्टर : कितने साल रहे आप कैसल मण्डावा में?

पूरन : मैं रहा 11 साल।

रिपोर्टर : 11 साल में 3 सुपरस्टार को देख लिया आपने?

पूरन : ऋषि कपूर को भी देखा, वो आए थे, ‘शुद्ध देसी रोमांस’ के लिए, सुशांत राजपूत और परिणीति चोपड़ा भी थे।

रिपोर्टर : अजय देवगन को कैसे देखा आपने, …वो दारू नहीं पीता?

पूरन : वो तो रूम से ही पीकर आता था खाना खाने, फिर बोलता था बीड़ी ले आ मेरे लिए।

रिपोर्टर : आपसे बोलता था?

पूरन : मैं बोला, इस समय तो मिलेगी नहीं, मार्केट बंद हो गया। बोला- ‘कहीं से लेकर आ।’ मैंने बोला, चौकीदार पीता है शायद। बोला- चौकीदार पीता है। ठीक है मैं चला जाता हूं, …फिर उसके साथ बैठकर बीड़ी पी उसने…।

फिल्म की शूटिंग के लिए बॉलीवुड राजस्थान के एक छोटे से शहर मण्डावा क्यों आ रहा है? इसके जवाब में पूरन ने कहा कि मंडावा को बॉलीवुड के लिए भाग्यशाली माना जाता है और यहां फिल्माई गई अधिकांश फिल्में ब्लॉकबस्टर साबित हुई हैं। उन्होंने बताया कि सैफ अली खान अपनी फिल्म ‘जम्हूरियत’ की शूटिंग के लिए 2025 में एक महीने से अधिक समय तक वहां रुका था। पूरन यह भी कहते हैं कि बजरंगी भाईजान में पाकिस्तान के रूप में दिखाए गए कई दृश्य वास्तव में मण्डावा और आसपास के स्थानों में फिल्माए गए थे।

रिपोर्टर :ऐसा क्यूं है बॉलीवुड मण्डावा-राजस्थान में ज्यादा शूटिंग करता है?

पूरन : बोलते हैं जो मंडावा में शूट होती है, वो फिल्म सुपरहिट होती है।

पूरन : अभी सैफ अली खान भी रहकर गया पीछे, उस समय गर्मी थी, अगस्त का महीना था।

रिपोर्टर : किस फिल्म के लिए?

पूरन : जम्हूरियत।

रिपोर्टर : जम्हूरियत?…. जम्हूरियत की शूटिंग कब हुई है?

पूरन : अगस्त-सितंबर में हुई थी।

रिपोर्टर : 2025 में? कितने दिन रहा वो?

पूरन : एक महीने से ज्यादा।

पूरन : आपने बजरंगी भाईजान फिल्म देखी? उसमें पाकिस्तान पार्ट है, वो पूरा मण्डावा है, लड़की को छोड़ने जाता है, वो पूरा जैसलमेर है, जो ओम पूरी मस्जिद से आता है, सलमान बुरका पहनकर साइकिल चलाता है… वो पूरा मण्डावा है…।

अब पूरन ने मण्डावा की अर्थव्यवस्था के बारे में बात की। उन्होंने कहा कि पहले यहां सिर्फ विदेशी पर्यटक ही आते थे, लेकिन बॉलीवुड द्वारा यहां फिल्मों की शूटिंग शुरू करने के बाद यह भारतीय पर्यटकों के बीच भी लोकप्रिय हो गया। उन्होंने आगे कहा कि होटल भरने लगे, जिससे बदले में स्थानीय लोगों के लिए रोजगार के अधिक अवसर पैदा हुए।

पूरन : पहले मण्डावा में सिर्फ फॉरनर आते थे। जबसे शूटिंग हुई है, तबसे लोग और आने लगे।

रिपोर्टर : शूटिंग के बाद इंडियंस आने लगे?

पूरन : हां।

रिपोर्टर : यहां फिल्म की शूटिंग इतनी हुई है, तो रोजी-रोजगार भी बड़ा है मण्डावा का?

पूरन : हां, होटल फुल होने लग गए। उसके बाद बहुत टूरिस्ट बड़ा है फिल्म की शूटिंग से।

अब पूरन ने हमें बताया कि कैसे मण्डावा बॉलीवुड फिल्मों की शूटिंग के साथ-साथ शादियों के लिए एक लोकप्रिय स्थान बनता जा रहा है, जिसके परिणामस्वरूप स्थानीय लोगों के लिए रोजगार के अधिक अवसर पैदा हो रहे हैं। पूरन ने कहा कि मण्डावा न केवल भारतीयों, बल्कि विदेशी नागरिकों के बीच भी डेस्टिनेशन वेडिंग के लिए लोकप्रियता हासिल कर रहा है। उन्होंने आगे कहा कि उनकी हवेली में हुई पिछली 12 डेस्टिनेशन शादियों में से या तो दूल्हा या दुल्हन विदेशी थे।

रिपोर्टर : यहां शादियां भी बहुत होती हैं?

पूरन : अभी हमने दिसंबर में करवाई 6 शादी…।

रिपोर्टर : इसी विवाना कल्चर में?

पूरन : नवंबर में 3, जनवरी में 1, फरवरी में 1 करवा दी… एक और है।

रिपोर्टर : बाहर के लोग आकर शादियां करते हैं?

पूरन : अभी तक 12 शादी हुई हैं यहां, …या तो लड़का फॉरनर था या लड़की फॉरनर थी, …दोनों इंडियन नहीं थे, कोई भी शादी में।

पूरन के बाद तहलका रिपोर्टर की मुलाकात दीपक से हुई, जो विवाना कल्चर होटल में सर्विस स्टाफ के रूप में काम करता है। दीपक ने तहलका रिपोर्टर को बताया कि मण्डावा में होटल उद्योग में अपने करियर के दौरान वह लगभग पचास फिल्म सितारों से मिल चुके हैं। उन्होंने बताया कि हाल ही में उनकी मुलाकात सैफ अली खान से हुई, जो वहां अपनी फिल्म ‘जम्हूरियत’ की शूटिंग कर रहे थे। दीपक ने आगे बताया कि उन्होंने पूरन के साथ मिलकर सलमान खान की भी सेवा की थी, जब वह कैसल मण्डावा में काम करते थे। उन्होंने मण्डावा को ‘मिनी मुंबई’ बताते हुए कहा कि बॉलीवुड को यहां की ऐतिहासिक हवेलियों के कारण शूटिंग करना बहुत पसंद है। दीपक ने यह भी कहा कि फिल्म शूटिंग ने स्थानीय लोगों के लिए रोजगार के कई अवसर पैदा किए हैं।

रिपोर्टर : तो आप किससे मिले दीपक?

दीपक : मैं करीब 50 (फिल्म एक्टर) से मिल चुका।

रिपोर्टर : 50 स्टार्स, …कौन-कौन हैं?

दीपक : विजय वर्मा हैं, और बहुत से हैं इनके तो नाम भी याद नहीं।

रिपोर्टर : हाल में फिलहाल किससे मिले हो?

दीपक : सैफ अली खान से।

रिपोर्टर : कौन-सी फिल्म की शूटिंग चल रही है?

दीपक : जम्हूरियत की। इससे पहले 120 बहादुर की।

रिपोर्टर : तुम इतने स्टार से मिल लिए, …सबसे अच्छा कौन लगा?

दीपक : आमिर खान।

रिपोर्टर : इतनी फिल्मों की शूटिंग क्यूं होती है दीपक मण्डावा में?

दीपक : स्मॉल मुंबई है, … मिनी बॉम्बे।

रिपोर्टर : क्यूं आते हैं सब इतना?

दीपक : क्यूंकि जगह अच्छी है, हवेलियां हैं।

रिपोर्टर : जनता को कैसे फायदा हुआ है, लोकल आदमी को?

दीपक : जनता को, …जैसे लोकर क्राउड चाहिए होता है, सिक्युरिटी चाहिए होता है, परचून दुकान सब, टेंट है, सब चीज तो लेकर आ नहीं सकते शूटिंग में…., एक शूटिंग में कम से कम 1,000 लोग चाहिए होते हैं। 1,000 तो चल नहीं सकते, वो करीब 300 आदमी चलते हैं, फिर 700 आदमी इधर के लोकर ही चाहिए होते हैं ना, जैसे गाड़ियां हैं।

रिपोर्टर : फिल्म की शूटिंग से रोजगार बड़ा है इसका मतलब?

रिपोर्टर : बजरंगी भाईजान में आप ही थे?

दीपक : हां।

पूरन : इसकी और मेरी ड्यूटी थी सलमान के साथ।

रिपोर्टर : दारू पीता था वो क्यूं दीपक?

दीपक : हां।

पूरन : और वो सलाद भी नहीं लेता था दारू के साथ, …सिगरेट पीता था, दारू पीता था।

पूरन सिंह और दीपक के बाद तहलका रिपोर्टर की मुलाकात गोपाल सिंह से हुई, जो एक ऊंट गाड़ी के मालिक हैं और अपने ऊंट का इस्तेमाल व्यावसायिक उद्देश्यों के लिए करते हैं। उन्होंने तहलका के रिपोर्टर को बताया कि जब से बॉलीवुड ने मंडावा में शूटिंग शुरू की है, स्थानीय लोगों के लिए रोजगार के कई अवसर पैदा हुए हैं। उनका कहना है कि फिल्म निर्माता आस-पास के लोगों से वाहन, ऊंट, बैलगाड़ी और घोड़े किराए पर लेते हैं। गोपाल आगे कहते हैं कि जब भी इस तरह के काम की जरूरत होती है, होटल मालिक उन्हें सूचित कर देते हैं।

रिपोर्टर : फिल्म इंडस्ट्री जबसे मण्डावा में आई शूटिंग करने, तो यहां लोगों को रोजगार भी मिला?

गोपाल : हां, मिला है, गाड़ियां भी बुलवाते हैं, कैमल भी, बैलगाड़ी भी बुलवाते हैं, अलग-अलग सब, घोड़े भी।

रिपोर्टर : आपको कैसे पता चलता है शूटिंग का?

गोपाल : मण्डावा में होटल वाले हैं उनसे कॉन्टेक्ट है मेरा। जब उनको जरूरत होती है, वो होटल वालों को बोलते हैं, होटल वाला हमको बुला लेता है।

गोपाल सिंह के साथ संक्षिप्त बातचीत से पता चलता है कि मण्डावा की फिल्म संबंधी गतिविधियों की सूचनाएं उन जैसे आम मजदूरों तक कैसे पहुंचती हैं। उन्होंने इस बात की पुष्टि की कि मुंबई के फिल्म निर्माता नियमित रूप से यहां आते हैं और इस शहर को फिल्म शहर के रूप में देखा जाता है। हालांकि गोपाल बताते हैं कि वह खुद अभिनय नहीं करते, लेकिन शूटिंग के लिए उनके ऊंट को किराए पर लिया जाता है और वह उसके साथ चले जाते हैं। वह कई फिल्मों में अपने ऊंट की भूमिका को याद करते हैं और हाल ही में हुई एक शूटिंग का जिक्र करते हैं। हालांकि उन्हें उसका नाम याद नहीं है। इससे पता चलता है कि कैसे फिल्म का काम चुपचाप मण्डावा के लोगों के रोजमर्रा के जीवन में प्रवेश कर गया है।

रिपोर्टर : अच्छा, मुंबई से बहुत सारे फिल्म मेकर्स यहां आते हैं मंडावा में?

गोपाल : हां, आते हैं।

रिपोर्टर : मण्डावा को कहते हैं फिल्म सिटी?

गोपाल : हां, फिल्म सिटी।

रिपोर्टर : बजरंगी भाईजान, पीके..।

गोपाल : कच्चे धागे।

रिपोर्टर : हां, तो कितनी फिल्मों में आपने काम किया है?

गोपाल : लगभग 5-7 फिल्मों में काम किया है।

रिपोर्टर : आपने?

गोपाल : हां, मेरा कैमल जाता है।

रिपोर्टर : आप जाते हो या कैमल?

गोपाल : कैमल के साथ मैं भी जाता हूं ना सर!

रिपोर्टर : कौन-कौन सी फिल्म में आपके कैमल ने काम किया है?

गोपाल : बजरंगी भाईजान में किया है, पिछले महीने भी किया है।

रिपोर्टर : कौन सी फिल्म?

गोपाल : पंजाब की आई थी, नाम तो याद नहीं है मुझे।

अब तहलका रिपोर्टर ने मण्डावा के एक सरकारी मान्यता प्राप्त और जाने-माने टूर गाइड संदीप सिंह से मुलाकात की, जिन्होंने बताया कि वह लंबे समय से फिल्म निर्माण में भी शामिल हैं। उन्होंने तहलका रिपोर्टर को बताया कि मण्डावा में शूटिंग के लिए आने से पहले, बॉलीवुड फिल्म निर्माता और निर्देशक लगभग तीन महीने पहले उन्हें फोन करते हैं और उन्हें उन स्थानों के बारे में सूचित करते हैं, जिनकी उन्हें आवश्यकता होती है। संदीप ने बताया कि वह उनकी जरूरतों के अनुसार उनके लिए उन स्थानों की व्यवस्था करता है।

रिपोर्टर : कौन कौन सी फिल्मों की शूटिंग हुई है यहां?

संदीप : पीके की, बजरंगी भाईजान, मिमी की, जब वी मेट, लव आजकल, की हुई है। शुद्ध देसी रोमांस, मिर्जिया की हुई है। ये सब तो मैंने करवा रखी हैं।

रिपोर्टर : मतलब?

संदीप : मण्डावा में काम करता हूं फिल्म प्रोडक्शन का, जब भी उन्हें जरूरत पड़ती है, बॉम्बे से आ रहे हैं, दिल्ली से आ रहे हैं, करीबन 2-3 महीने पहले हमारा काम शुरू हो जाता है, पहले हमको उन्हें लोकेशन भिजवानी पड़ी है, हम इमेज भेजते हैं, कैसे मकान वगैरह पूरा पेज बना रखा है हमने, फिर वो आकर यहां देखते हैं, कौन सा उन्हें पसंद आया, फिर उसके मालिक से बात करनी होती है, वो सब हम करते हैं। फिर जब क्लियर हो जाता है मामला, तब कलेक्टर से परमिशन लेते हैं, फिल्म शुरू करते हैं, कितना बड़ा सेलिब्रिटी आ रहा है, उसके लिए कितनी सिक्योरिटी चाहिए, वो करते हैं।

इस बातचीत में संदीप सिंह बताते हैं कि मण्डावा में फिल्म की शूटिंग के लिए आधिकारिक अनुमति कैसे प्राप्त की जाती है। उनका कहना है कि वे कलेक्टर और अन्य अधिकारियों से संबंधित सभी कागजी कार्रवाई और मंजूरी का काम संभालते हैं। हालांकि उन्होंने यह भी संकेत दिया कि यह प्रक्रिया सीधी नहीं है और बॉलीवुड फिल्मों की शूटिंग के लिए अनुमति प्राप्त करने और अन्य व्यवस्थाएं पूरी करने के लिए स्थानीय प्रशासन को रिश्वत देनी पड़ती है।

रिपोर्टर : तो ये सारी परमीशन डीएम से, कलेक्टर से?

संदीप :  सब मैं ही करवाता हूं।

रिपोर्टर : सब आसानी से हो जाती है क्या?

संदीप : लगता है उसमें कुछ, …पूरा पेपर वर्क होता है। आसानी से नहीं, टेबल के नीचे से…।

रिपोर्टर : अच्छा, पैसा-वैसा देना पड़ता है?

संदीप : हां, हम सब देख लेते हैं।

संदीप ने बताया कि वह पिछले 20 वर्षों से फिल्म निर्माण से जुड़े हुए हैं। उन्होंने खुलासा किया कि उन्होंने पिछले दो दशकों में मण्डावा में लगभग 20-22 फिल्म शूट की व्यवस्था करने में मदद की है। उन्होंने तहलका रिपोर्टर को यह भी बताया कि बॉलीवुड से उनका पहली बार संपर्क कैसे हुआ। वह बताते हैं कि फिल्म उद्योग से उनका जुड़ाव 1999 में शुरू हुआ, जब फिल्म निर्माता पास में ही ठहरते थे और फोन करने के लिए उनकी दुकान में स्थित एसटीडी-पीसीओ बूथ का इस्तेमाल करते थे। इन नियमित संपर्कों के माध्यम से उन्होंने धीरे-धीरे विश्वास और संबंध स्थापित किए। एक छोटे से सेवा केंद्र के रूप में शुरू हुआ और यह सफर उनके लिए फिल्म निर्माण के क्षेत्र में प्रवेश का जरिया बन गया। समय के साथ वह शूटिंग की व्यवस्था करने वाले एक महत्वपूर्ण स्थानीय व्यक्ति बन गए।

रिपोर्टर : कितनी शूटिंग हो चुकी मण्डावा में?

संदीप : करीब 20-22 हम करवा चुके हैं।

रिपोर्टर : आपने ये पकड़ कैसे बनाई बॉलीवुड में?

संदीप : करीब 20 साल से कर रहा हूं।

रिपोर्टर : शुरुआत कैसे हुई?

संदीप : जब कच्चे धागे फिल्म बनी अजय देवगन की, उस टाइम क्या था कम्युनिकेशन की ये सेलफोन नहीं थे, और मेरी ये शॉप है हैंडीक्राफ्ट की, इस टाइम यहां पर एसटीडी-पीसीओ लगा रहता था…. रियलिटी बता रहा हूं मैं आपको।

रिपोर्टर : ये 1998-99 की बात है?

संदीप : ये 1999 की बात है। तो जो भी डायरेक्टर, और लोग… तो ये सामने कैसल मण्डावा में ही होटल है, उसी में वो सब रुके थे। जब उनको कोई फोन करना होता था, वो यहां आते थे। तो वो लोग बातचीत करते थे, जैसे हमें ये चीज चाहिए, वो चीज चाहिए…।

रिपोर्टर : मतलब एसटीडी-पीसीओ बूथ ने आपको फिल्म इंडस्ट्री से जोड़ दिया!

इस बातचीत में संदीप बताते हैं कि फिल्म निर्माता बार-बार अपनी शूटिंग के लिए मण्डावा को क्यों चुनते हैं? उनका कहना है कि शहर की हवेली वास्तुकला सीमा पार देखी जाने वाली मुगल-युग की इमारतों से काफी मिलती-जुलती है, जिससे इसे स्क्रीन पर आसानी से पाकिस्तान के रूप में दिखाया जा सकता है। उन्होंने मण्डावा और उसके आसपास उपलब्ध होटलों की विस्तृत श्रृंखला की ओर भी इशारा किया। इससे फिल्म की पूरी यूनिट के लिए बिना किसी झंझट के आसपास रहना आसान हो जाता है।

रिपोर्टर : फिल्म इंडस्ट्री के लोग मण्डावा क्यूं पसंद करते हैं शूटिंग के लिए?

संदीप : उसका सबसे बड़ा रीजन जो है, यो हमारी मण्डावा में जो हवेलियां हैं, उनका जो आर्किटेक्चर है प्लस पाकिस्तान में जो हवेलियां हैं उनका आर्किटेक्चर- मुगल आर्किटेक्चर, वो सिमिलर है। मोस्टली फिल्मों में जो पाकिस्तान का सीन दिखाना होता है, वो सब मण्डावा में है।

संदीप : दूसरा रीजन ये है कि यहां हर कैटेगरी के होटल अवेलेबल हैं, तो उनका जो यूनिट के रुकने का है, वो सब यहां इजीली अवेलेबल है। कई बार उनको जैसे लोकेशन पसंद आ गई, लेकिन 20-30 किमी तक रुकने की व्यवस्था नहीं है, तो यहां क्या है हर कैटेगरी के होटल हैं….।

इस बातचीत में संदीप बताते हैं कि कैसे फिल्म की शूटिंग से मण्डावा के स्थानीय लोगों को लगातार काम मिलता है। उनका कहना है कि फिल्म निर्माताओं को दृश्यों में स्थानीय लोगों की आवश्यकता होती है, जिनमें महिलाएं, पुरुष और बच्चे शामिल हैं। वह उनका इंतजाम करता है और यह सुनिश्चित करता है कि उन्हें उनकी भूमिकाओं के लिए भुगतान किया जाए। उन्होंने आगे कहा कि हवेली मालिकों को उनकी संपत्तियों के उपयोग से भी आय होती है। उनके विवरण से पता चलता है कि फिल्म संबंधी गतिविधियां पूरे शहर में आय का वितरण कैसे करती हैं।

रिपोर्टर : यहां रोजगार अच्छा मिलता होगा लोगों को?

संदीप : हां, रोजगार अच्छा मिलता है। पहले तो ये है कि जैसे शूटिंग हो रही है, उनको लोकल क्राउड चाहिए, तो जैसे 50 औरतें, 20 आदमी, बच्चे, वो सब मैं अरेंज करता हूं। सबको पैसे मिलते हैं। मेरे को मिलते हैं। मेरे थ्रू उनको मिलते हैं। जब हवेली में कोई शूट होता है, तो उनके ऑनर को पैसा मिलता है।

हमारी बातचीत समाप्त होने से पहले संदीप सिंह ने कहा कि वह और उनका छोटा भाई मण्डावा प्रोडक्शन नामक कंपनी चलाता है, जो फिल्म की शूटिंग के लिए सुरक्षा, खानपान और अन्य जमीनी सहायता सहित संपूर्ण व्यवस्था संभालती है।

रिपोर्टर : बाउंसर्स सभी के आते हैं?

संदीप : हां, वैसे वो भी हम प्रोवाइड करवाते हैं। जयपुर में मेरा दोस्त है, जितने बाउंसर्स चाहिए, मिल जाते हैं। उन्हें लोकल में जो कुछ चाहिए होता है, इवन कैटरिंग एट्च. भी करवाते हैं हम। मेरा मण्डावा प्रोडक्शन हाउस है, मैं हूं मेरा छोटा भाई है।

रिपोर्टर : मण्डावा प्रोडक्शन हाउस से कंपनी बनाई हुई है?

संदीप के अनुसार, वह ग्राहकों की मांग पर सब कुछ उपलब्ध कराते हैं, यहां तक कि ड्रग्स भी। जब वे उन चीजों को मांगते हैं, चाहे वे यूरोपीय हों या भारतीय। मंडावा दिल्ली से सड़क मार्ग से मात्र छः घंटे की दूरी पर स्थित एक शांत कस्बा है और इसने व्यवसायीकरण से दूर रहकर अपनी मौलिकता को बरकरार रखा है। संदीप ने बताया कि शेखावाटी क्षेत्र में 3,000 से अधिक विरासती हवेलियां हैं, जिनमें मंडावा भी शामिल है। उन्होंने कहा कि इन हवेलियों को अभी तक यूनेस्को द्वारा विरासत घोषित नहीं किया गया है, लेकिन यह प्रमाणन प्राप्त करने के प्रयास जारी हैं।

संदीप ने आगे कहा कि नब्बे प्रतिशत हवेलियां मारवाड़ी बनिया परिवारों की हैं, जो अन्यत्र चले गए, लेकिन उन्होंने संपत्तियों की देखभाल के लिए रखवाले नियुक्त किए हुए हैं। 10 प्रतिशत हवेलियां धनी स्थानीय लोगों या दिल्ली और अन्य शहरों के व्यापारियों को बेच दी गई हैं और अब उन्हें हेरिटेज होटलों में परिवर्तित किया जा रहा है। जो हवेलियां बिक नहीं पातीं, उन्हें फिल्म की शूटिंग के लिए किराए पर दिया जाता है, जिसकी कीमत उनकी स्थिति के आधार पर एक लाख रुपए प्रति दिन या उससे अधिक होती है। इससे यह भी पता चलता है कि मंडावा की संरक्षित बाहरी दिखावे के पीछे अनौपचारिक नेटवर्क चुपचाप इसकी बढ़ती फिल्म-संबंधी अर्थव्यवस्था को बनाए रख रहे हैं।