तहलका की पड़ताल: झाड़-फूंक से इलाज या धोखा?

सहारनपुर में झाड़-फूंक करने वाले चमत्कारी चिकित्सा का करते हैं दावा। तहलका एसआईटी की रिपोर्ट ः-

सहारनपुर के कई गांवों में झाड़-फूंक करने वाले रहते हैं, जो मरीजों को ठीक करने वाले चमत्कारी चिकित्सक भी बने हुए हैं। ये झाड़-फूंक करने वाले अक्सर पवित्र जल, नीम की टहनियों और काले धागों से न सिर्फ मरीजों का इलाज करते हैं, बल्कि अन्य कई चमत्कारों का दावा भी करते हैं। ये लोग न सिर्फ बहुत लोगों की आस्था के केंद्र वाले बाबा और चिकित्सक हैं, बल्कि लोगों की बीमारी और समस्याओं का निदान करने के नाम पर बिना डिग्री के चिकित्सक बने हुए हैं, जो आधुनिक चिकित्सा को चुनौती देने के साथ-साथ खुद के सफल इलाज करने वाला और भूत-प्रेत जैसी समस्याएं दूर करने वाला बताते हैं। तहलका एसआईटी की रिपोर्ट ः-


‘हमारे पास कैंसर सहित किसी भी असाध्य रोग को ठीक करने के तीन तरीके हैं। पहला तरीका रोगी को कुरान की आयतें पढ़कर और उस पर फूंक मारकर पानी पिलाना; दूसरा तरीका है- बुरी आत्माओं को दूर करने के लिए रोगी के शरीर पर नीम की पत्तियां फेरना और तीसरा तरीका है- कुरान की आयतें पढ़कर और उन पर फूंक मारकर गर्दन और कमर के चारों ओर काला धागा बांधकर परेशानियां दूर करना।’ -उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले के गाड़ा गांव के मोहम्मद अकरम ने तहलका के रिपोर्टर को ग्राहक समझकर बताया।
‘मेरे अब्बा मरीजों का इलाज इसी तरह करते थे। उन्होंने भारत भर में हजारों ऐसे मरीजों का इलाज किया जो कैंसर, शुगर और थायराइड संबंधी विकारों जैसी लाइलाज बीमारियों से पीड़ित थे। मेरे अब्बा को मरीजों का इलाज करने की यह दिव्य शक्ति उनके गुरु से मिली थी, जो पास के ही एक गांव के संत थे और उन्हें ईश्वर द्वारा नि:शुल्क दिव्य शक्तियों के माध्यम से मरीजों का इलाज करने के लिए वरदान प्राप्त थे। मेरे अब्बा के गुरु ने अपनी मृत्यु से पहले अपनी दिव्य शक्तियां मेरे अब्बा को प्रदान की थीं। मेरे अब्बा का भी पिछले साल 112 साल की उम्र में निधन हुआ।’ -अकरम ने आगे कहा।
‘मेरे अब्बा की मौत के बाद मैं मरीजों के इलाज की उनकी विरासत को आगे बढ़ा रहा हूं, लेकिन मैंने उन तीन तरीकों में कुछ आयुर्वेदिक दवाएं भी शामिल की हैं, जिनके जरिए मेरे अब्बा मरीजों का इलाज करते थे। लेकिन हमारा इलाज अल्लाह की मर्जी पर निर्भर करता है। यदि अल्लाह चाहेगा, तो रोगी ठीक हो जाएगा, वर्ना नहीं। मैंने कोई कोर्स नहीं किया है और मैं केवल दवाओं की लागत ही वसूलता हूं। बाकी सब मरीज की इच्छा पर निर्भर करता है, जो हमारे लिए एक हदिया (तोहफा) होगा।’ -अकरम ने तहलका रिपोर्टर से कहा।


‘मैंने मरीजों के पित्ताशय से 14 से 29 मिमी तक की पथरी निकाली है, जो चिकित्सा विज्ञान में असंभव है। चिकित्सा विज्ञान में पित्ताशय की पथरी के लिए सर्जरी की आवश्यकता होती है। मैं किसी भी तरह से चिकित्सा विज्ञान को चुनौती देने की कोशिश नहीं कर रहा हूं। मैं वही कर रहा हूँ, जो अल्लाह मुझे करने के लिए मार्गदर्शन दे रहा है।’ -अकरम ने कहा।
‘मेरे द्वारा इलाज किए जाने के बाद शुगर के मरीजों की एलोपैथिक दवाओं पर निर्भरता लगभग समाप्त हो जाती है। यदि कोई मरीज दिन में दो एंटी-शुगर गोलियां ले रहा है, तो मेरी दवा शुरू करने के बाद यह संख्या घटकर दिन में एक गोली रह जाती है। कुछ समय तक हमारे इलाज को जारी रखने के बाद मरीजों को किसी भी प्रकार की एंटी-शुगर दवा लेने की आवश्यकता नहीं होती है।’ -अकरम ने दावा किया।
‘मेरे इलाज से शुगर का स्थायी इलाज हो सकता है। इसका इलाज पांच मिनट से 10 मिनट में हो सकता है या इसमें तीन महीने भी लग सकते हैं। यह सब व्यक्ति विशेष पर और अल्लाह की इच्छा पर निर्भर करता है।’ -अकरम ने कहा।
‘हिंदुओं को कुरान की आयतें पढ़ने के बाद इलाज के लिए दिए गए पवित्र जल को पीने में कोई आपत्ति नहीं है। हम उनके सामने पानी को आयतें पढ़कर फूंकते हैं। दरअसल मेरे गांव के हिंदू लोग अपने खेतों में बैंगन उगाने से पहले इस पानी को मांगने आते हैं, ताकि फसल को कीटों के हमले से बचाया जा सके। हिंदू लोग कुरान का बहुत सम्मान करते हैं।’ -अकरम ने कहा।
‘जब मेरा शुगर लेवल 600 था। तब मैंने 2019 में अकरम के पिता, दिवंगत सूफी मोहम्मद इस्लाम से मधुमेह का इलाज कराया था। उन्होंने मुझे चार रसगुल्ले खाने और उनकी मीठी चाशनी पीने के लिए कहा। उसके बाद उन्होंने मुझे पवित्र जल पीने के लिए दिया, फिर मेरे शरीर पर नीम की पत्तियां मलीं और मुझे गले और कमर में पहनने के लिए दो काले धागे दिए और मुझे एक घंटे इंतजार करने के लिए कहा। एक घंटे बाद मेरा शुगर लेवल 600 से घटकर 250 हो गया। यह कोविड से पहले की 2019 की बात है। आज तक मेरा शुगर लेवल नियंत्रित है और मैंने तब से कोई भी शुगर कम करने वाली गोली नहीं ली है।’ -नोएडा के रहने वाले अल्ताफ नामक एक व्यक्ति ने बताया।
‘जब मेरी हालत बिगड़ने लगी, तो मैं और चार अन्य लोग शुगर के इलाज के लिए सहारनपुर गए। मेरा शुगर लेवल इतना ज्यादा था कि मेरी आंखों की रोशनी काफी कम हो गई थी और मैं चीजों को ठीक से देख नहीं पा रहा था। किसी ने मुझे सूफी मोहम्मद इस्लाम के बारे में बताया था, जिनका अब निधन हो चुका है। इसलिए मैं और मेरे साथ चार अन्य शुगर के मरीज 2019 में उनसे मिलने गए थे। तबसे हम चारों का शुगर लेवल नियंत्रण में है और हममें से किसी ने भी शुगर कम करने वाली कोई गोली नहीं ली है। नोएडा में मेरे इलाके के कई लोगों को इस्लाम के उपचार से लाभ हुआ है।’ -अल्ताफ ने आगे कहा।
‘मेरी शादी मोहम्मद अकरम से पिछले 20 साल पहले हुई थी और मैं इस बात की प्रत्यक्षदर्शी हूं कि उन्होंने मेरे ससुर के साथ मिलकर पूरे भारत से इलाज के लिए आए हजारों मरीजों को ठीक किया है। हाल ही में उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर से एक कैंसर रोगी मेरे पति को स्ट्रेचर पर देखने आया था। लेकिन कुछ महीनों के इलाज के बाद वह खुद चलकर वापस लौटा।’ -मोहम्मद अकरम की पत्नी सूफिया ने कहा।
यह कहानी उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले के गाड़ा गांव के एक पिता-पुत्र की है, जो कैंसर, शुगर और थायराइड से लेकर दूसरी सभी प्रकार की असाध्य बीमारियों से पीड़ित मरीजों का तीन तरीकों से इलाज करने का दावा करते हैं। पहला तरीका है- मरीज को कुरान की आयतें पढ़कर पानी पिलाना; दूसरा तरीका है- कुरान की आयतें पढ़कर गर्दन और कमर में काला धागा बांधना और तीसरा तरीका है- मरीज के शरीर पर नीम की पत्तियां फेरना, ताकि यदि कोई बुरी आत्मा मौजूद, हो तो उसे दूर किया जा सके। तहलका रिपोर्टर को जानकारी मिली कि सूफी हकीम मोहम्मद इस्लाम ने अपने जीवन में भारत भर में कई मरीजों का इलाज किया, जिनमें नोएडा, उत्तर प्रदेश के कुछ लोग भी शामिल हैं। उनके बेटे सूफी मुहम्मद अकरम के अनुसार, सूफी इस्लाम का पिछले साल 112 वर्ष की आयु में निधन हो गया और अब वह (अकरम) उनकी विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं। अकरम के अनुसार, उनके अब्बा को ये दिव्य उपचार शक्तियां उनके गुरु से प्राप्त हुई थीं, जो पास के एक गांव में रहने वाले एक संत थे और जिनके बारे में कहा जाता था कि उनके पास भी अनेक दिव्य शक्तियां थीं। अकरम का कहना है कि गुरु ने अपनी मृत्यु से पहले वे शक्तियां उनके पिता को प्रदान कीं और उनके अब्बा ने बाद में मुझे ये शक्तियां प्रदान कीं।
तहलका रिपोर्टर ने दिल्ली में मोहम्मद अकरम से मिलने का समय तय किया और ओखला विहार में एक मरीज के घर पर उनसे मुलाकात की। रिपोर्टर ने मरीज का करीबी बनकर अकरम से कहा कि हमारे मरीज को शुगर है और उसे इलाज की जरूरत है। अकरम ने रिपोर्टर से कहा कि उसके पास इलाज के तीन तरीके हैं, पहला- कुरान की आयतों का पाठ करते हुए पानी का उपयोग करना; दूसरा- कुरान की आयतों का पाठ करने के बाद गर्दन और कमर के चारों ओर काले धागे पहनना और तीसरा- यदि कोई बुरी आत्माएं हों, तो उन्हें दूर करने के लिए रोगी के शरीर पर नीम की पत्तियां रगड़ना। यानी अकरम हर मरीज का अलग-अलग तरीके से इलाज करने का दावा करता है।

रिपोर्टर : तो आपके इलाज के 3 तरीके हैं- पानी, झाड़ा और गंडा?

अकरम : हां, 2 गंडे बांधते हैं, एक पेट पर बंधेगा और एक गले पर।

रिपोर्टर : चाहे कोई भी बीमारी हो?

अकरम : बीमारी कोई सी हो, मगर सबका अलग-अलग गंडा है।

रिपोर्टर : और पानी भी अलग?

अकरम : जी।

रिपोर्टर : और कैंसर का?

अकरम : उसका अलग प्रोसीजर है। उसका पानी भी अलग पढ़ा जाता है, उसको कोई भी नहीं पी सकता उसके अलावा। हां, उसकी पलटन से काट करनी होती है, जो वो रोज सुबह सूरज निकलने से पहले, शाम को ग़ुरूब होने से पहले, उसके टाइम का हिसाब है।

रिपोर्टर : मतलब सारी बीमारियों का अलग-अलग इलाज है, कोई भी हो, गंडा भी।

अकरम : जी।

अकरम ने बताया कि पिछले साल गुजर चुके उनके अब्बा सूफी मोहम्मद इस्लाम ने अपने गुरु, जो पास के एक गांव में रहने वाले एक संत थे; से मरीजों के इलाज के लिए दैवीय शक्तियां प्राप्त की थीं। उनके गुरु के कई पुत्र और पोते थे, लेकिन उन्होंने ये शक्तियां विशेष रूप से अकरम के पिता को प्रदान कीं। इन शक्तियों का उपयोग करके उनके पिता ने कई असाध्य रोगों से पीड़ित मरीजों का इलाज किया।
रिपोर्टर : तो वालिद साहेब क्या शुरू से…?
अकरम : जी बहुत पहले से…।
रिपोर्टर : उनको क्या खुदा की तरफ से ये चीज मिली हुई थी, या कोई कोर्स किया था?
अकरम : नहीं, उनके जो ऊपर थे, हमारे यहां सिरसारी है गांव पास में, वहां के थे वो। बहुत तकदीर वाले इंसान थे वो।
रिपोर्टर : वो भी ये ही करते थे?
अकरम : करते नहीं थे, वो बस अल्लाह वाले थे, वो कपड़े भी ऐसे पहनते थे, वो कभी नजरें ऊपर उठाकर नहीं देखते थे, 35 साल इमाम रहे वो गांव में, वालिद साहेब से उनका संपर्क था।
रिपोर्टर : वालिद साहेब को बख्श गए वो?
अकरम : जी हां, उनके ये समझ लो पोते भी हैं, लड़के भी हैं, लेकिन वो वालिद साहेब को दे गए।

इसके बाद अकरम ने तहलका रिपोर्टर से कहा कि वह हर तरह की लाइलाज बीमारियों का इलाज करते हैं, लेकिन वह इस सबके पीछे अल्लाह की मर्जी मानते हैं। वह आधुनिक चिकित्सा पर भी सवाल उठाते हैं, खासकर शुगर जैसी लंबी बीमारियों के लिए और इसके दुष्प्रभावों की ओर इशारा करते हैं। रिपोर्टर ने अकरम से लगातार यह पूछा है कि उनका इलाज वास्तव में किस हद तक चल रहा है?
रिपोर्टर : अकरम साहिब, किस-किस चीजों का इलाज है?
अकरम : देखो जी, हमारे यहां इलाज जो है, सभी मायने में कोई भी बीमारी हो, लाइलाज भी, कैंसर भी हो, उसका भी झाड़ा लगाते हैं हम लोग, अल्हम्दुलिल्लाह का अगर हमको उसमें होता है, तो शिफा भी होती है उसमें।
रिपोर्टर : 100 परसेंट?
अकरम : बस समझ लो आप मेरी बात को मैं खुले लफ्जों में कहने वाला आदमी हूं, न कि दिखावा न कि एडवर्टाइजमेंट। हम तो अल्लाह से मांगेंगे और अल्लाह ही करने वाला है।
रिपोर्टर : लेकिन मरीज ठीक तो हो रहे हैं ना आपसे?
अकरम : मैं ये कह रहा हूं, अल्लाह कर रहा है ना, अब कितनों को अल्लाह ने लिख दिया होगा कि उनका बुलावा आने वाला है, तो उसमें तो अल्लाह कुछ कर सकता है, न ही डॉक्टर। …समझ लो मेरी बात को और जिसका अल्लाह ने लिख दिया आखिरी सांस है, और अगर जिन्दगी है, तो मिलेगी।
रिपोर्टर : लेकिन इलाज सारी बीमारी का है आपके पास ,चाहे कोई भी बीमारी हो?
अकरम : हां जी, अल्लाह का शुक्र है चाहे पाइल्स हो, बवासीर हो, भगंदर हो इट्स (इत्यादि), सबका झाड़ा लगता है।
रिपोर्टर : जैसे शुगर, थायराइड हो गई, मेडिकल साइंस कहता है ये ठीक नहीं हो सकती, दवा खानी है परमानेंट..?
अकरम : मेरे कहने का मतलब है- मेडिकल तो ये कह रहा है आप दवा खाओगे जब तक आपको जिंदा रहना है, लेकिन एक मेडिकल के अंदर ये भी है शुगर की आप एक गोली खा रहे हो, वो आपकी शुगर को डाउन और नॉर्मल भी कर रहा है और एक परसेंट है कि नहीं भी कर रहा। लेकिन और चीजों को इफेक्ट भी कर रहा है, वो जैसे लीवर खराब, किडनी खराब।
रिपोर्टर : आप अगर शुगर का इलाज करेंगे?
अकरम : हम तो दवाई देंगे उसकी।



अकरम ने हमारे रिपोर्टर से बात करते हुए दावा किया कि वह जिन शुगर मरीजों का इलाज करते हैं, उन्हें नियमित रूप से एंटी-शुगर गोलियां नहीं लेनी पड़तीं, बल्कि समय के साथ गोलियों को पूरी तरह से बंद किया जा सकता है और शुगर को ठीक किया जा सकता है।
रिपोर्टर : हमें एलोपैथी छोड़नी पड़ेगी?
अकरम : हां, मतलब अगर ज्यादा शुगर हो, हाई लेवल पर पहुंचा हुआ हो, या गोली जो 2-3 टाइम ले रहे हैं, उसका तरीका ये होता है कि उसको डेली काउंट करनी पड़ती है और जिसको जो एक ही टाइम गोली खा रहा है, उसको एक दिन, दो दिन छोड़कर बाकी हमारी जो दवाई होगी, वो चलनी-चलनी है। उसके बाद इंशाअल्लाह वो ठीक हो जाएगी।
रिपोर्टर : जो इंसुलिन ले रहा है?
अकरम : इन्सुलिन का ये है कि अगर 2 टाइम या 3 टाइम की इन्सुलिन है, तो कम कर देते हैं, उसको एक टाइम लेना होता है।
रिपोर्टर : और धीरे-धीरे बंद कर देते हैं?
अकरम : इंशाल्लाह बंद होगी, अल्लाह के हुकुम पर है।
रिपोर्टर : और अगर एक गोली खा रहा है, तो वो चलती रहेगी आपके इलाज के साथ, या बंद हो जाएगी?
अकरम : वो गोली एक दिन छोड़कर खानी होती है, और अगर एक गोली खा रहा है, तो वो बंद भी हो जीती है। 2 या 3 टाइम दवा पी लो हमारी।
रिपोर्टर : अच्छा, शुगर की जो गोली है, वो परमानेंट बंद हो हो जाएगी?
अकरम : हां, परमानेंट बंद हो जाएगी।

अकरम के अनुसार, उनके शुगर के इलाज में आमतौर पर लगभग तीन महीने लगते हैं, लेकिन यह हर व्यक्ति के लिए अलग-अलग होता है। कुछ मामलों में यह 5-10 मिनट में काम कर सकता है, जैसे कि जब उनके वालिद ने नोएडा के एक मरीज अल्ताफ का इलाज किया था, तो उसका शुगर लेवल कुरान की आयतों का पाठ किए गए पानी को पीने के एक घंटे के भीतर गिर गया था।
रिपोर्टर : अगर किसी को शुगर है, आपकी दवा है, खाने के बाद गंडा बांधने के बाद कितने दिन में ठीक हो जाएगी?
अकरम : जब अल्लाह का हुकुम होगा, भाई कम से कम 3 महीने का टाइम होगा।
रिपोर्टर : वो मुझे बता रहे थे आरिफ साहिब, आपके वालिद साहिब ने शीरा खिलाया चार रसगुल्ले खिलाए, पानी पिलाए और उसके एक घंटे के बाद शुगर ठीक हो गई उनकी।
अकरम : देखिए, आपका और इनका सबका बॉडी का सर्कुलर अलग-अलग होता है, और आपको 5 मिनट्स में भी ठीक कर सकता है और इनको 10 मिनट में भी।
रिपोर्टर : और पांच महीने में भी नहीं?
अकरम : जब अल्लाह का हुकुम नहीं होगा, तो कैसे हो जाएगा, आप बताओ?

अब अकरम ने रिपोर्टर को बताया कि वह अपने पवित्र जल और झाड़-फूंक (भूत-प्रेत भगाने) के माध्यम से 14 से 29 मिमी आकार की पित्ताशय की पथरी को निकाल चुके हैं, जो कि सर्जरी के बिना संभव नहीं है। अपने मरीजों के सफल इलाज का श्रेय अल्लाह को देते हुए उन्होंने यह दावा किया कि पथरी की कोई दवा नहीं दी गई थी, और पूरी तरह से उनकी धार्मिक प्रथाओं पर इलाज निर्भर था।
रिपोर्टर : 14 एमएम की, 29 एमएम की पथरी निकाली आपने?
अकरम : मैंने नहीं, अल्लाह ने। गुर्दे में अगर पथरी है, उसकी तो मैं दवाई भी देता हूं।
रिपोर्टर : सिर्फ पानी से निकाली आपने?
अकरम : पानी और झाड़ और पढ़ने को जो बताया वो पढ़ते रहिए।
रिपोर्टर : और दवा नहीं दी?
अकरम : दवा नहीं दी।

अकरम के अनुसार, उनके यहां इलाज के लिए आने वाले हिंदू भी कुरान की आयतों से तैयार किया गया पवित्र जल पीते हैं और उन्हें इस पर कोई आपत्ति नहीं है। उन्होंने कहा कि वह उनके सामने आयतें पढ़ते हैं और पानी पर फूंक मारते हैं और वे (लोग) उसे औषधि के रूप में ग्रहण करते हैं। चूंकि हिंदू खुद कुरान का पाठ नहीं कर सकते, इसलिए मैं उनकी ओर से ऐसा करता हूं। अकरम ने यह भी बताया कि ग्रामीण अक्सर बैंगन की कटाई से पहले अपनी फसलों को कीड़ों से बचाने के लिए पवित्र जल मांगते हैं।
रिपोर्टर : अच्छा, जो हिंदू आते हैं आपके पास, वो तो कुरान की आयतें नहीं पढ़ पाते, उनको कैसे ट्रीट करते हो आप?
अकरम : कोई बात नहीं, उन्हें तो बस पानी पीना होता है।
रिपोर्टर : पी लेते हैं वो पानी?
अकरम : क्यूं नहीं पीएंगे, बिसलेरी की पानी की बोलत रखी थी मेरे पास वहां।
रिपोर्टर : तो उनके सामने पढ़ के फूंकते हो आप?
अकरम : हां, उनके सामने पढ़कर, क्या दिक्कत है। वो तो और आते हैं पानी मांगने मेरे से, खेती के लिए भी।
रिपोर्टर : गांव में?
अकरम : हां, बैंगन जो लगा रखे हैं, उसमें कीड़ा न लगें, पानी दो फटाफट।

अब अकरम ने खुलासा किया है कि उनके इलाज के जरिए निसंतान दंपतियों को बच्चे हुए हैं। उन्होंने तीन साल पहले शादी करने वाले एक ऐसे दंपत्ति के बारे में बताया, जो संतान उत्पन्न करने में असमर्थ थे। अकरम ने बताया कि दंपति ने उनसे संपर्क किया और उनकी दवा के माध्यम से वे एक बच्चे को जन्म देने में सक्षम हुए। इस चर्चा में उनके उपचारों से होने वाले प्रजनन संबंधी लाभों पर प्रकाश डाला गया है।
रिपोर्टर : और अगर किसी के औलाद न हो?
अकरम : उसका इलाज भी होता है, स्पेशल होता है मेरे यहां अल्हम्दुलिल्लाह! अभी मैं बता रहा हूं आपको, एक बच्ची मेरे पास 3 महीने पहले आई थी, 3 साल हो गए थे उनकी शादी को, बस इलाज करा-कराके, सिस्ट बनी हुई थी रसोली में उसकी, स्पेशल दवाई है मेरे पास अल्हमदुलिल्लाह उसका अल्ट्रासाउंड देखा, उसके हिसाब दवाई दूंगा, उसके बाद में कटेगी, उसके बाद जोशांदा दिया जाएगा, चटनी बना के देंगे, फिर दोनों के लिए शौहर और बीवी दोनों के लिए दवाई चलती है इसमें।
रिपोर्टर : बच्चा हो जाएगा?
अकरम : अल्हम्दुलिल्लाह!
रिपोर्टर : ऐसे हैं लोग?

अकरम के अनुसार, वह जादू-टोना (तंत्र-मंत्र) के मामलों का भी इलाज करते हैं। अकरम बताते हैं कि उनके अनुसार, बीमारियां तंत्र-मंत्र, जिन्न या बुरी नजर के कारण हो सकती हैं। वह इन तीनों के बीच अंतर स्पष्ट करते हुए कहते हैं कि ये चीजें प्रत्येक शरीर को अलग-अलग तरह से प्रभावित करती हैं। अकरम यह भी दावा करते हैं कि उनके पास आध्यात्मिक और शारीरिक दोनों प्रकार की सभी समस्याओं का समाधान है।
रिपोर्टर : अच्छा, इससे भी बीमारी आती है, हसद से?
अकरम : जी, ये कहा है एक तरफ जादू किया, एक तरफ जिन्नात आया, एक तरफ नजर आई, तीनों में अल्लाह ने फरक दिया। इस बात को समझना जो मैं कह रहा हूं, अगर जादू आप पर किसी ने किया, जो चीटी के माफिक चलता है बॉडी के अंदर धीरे-धीरे, जिन्नात आया आपको झटका दिया और चला गया। नजर आई, मैंने यहां से गोली मारी तीर के माफिक ये लगी और आप गिरे, और इंसान की नजर इतनी खतरनाक नहीं होती, जितनी जिन्नात की होती है।
अकरम (आगे) : दो चीजें होती हैं, रूहानी और जिस्मानी।
रिपोर्टर : जादू-टोना हो किसी पर?
अकरम : जो भी होगा, अल्लाह ने हमें वो खज़ाने दिए हैं, ईमान वालों को कहने का मतलब सभी को, तो हम क्यूं मायूस हों। इम्तिहान के अंदर आएगा और अल्लाह अपने बंदों की आजमाइश लेता है, शुक्र अदा करो, और नाशुक्री कर दी। तो पीछे डाल देगा।

अकरम ने कहा कि मरीजों की मांग के आधार पर वह उनका इलाज करने के लिए शहर-शहर यात्रा करते हैं। उनका कहना है कि वे किसी एक शहर तक सीमित नहीं हैं और मरीज जहां भी उन्हें बुलाते हैं, वे वहां जाते हैं। वह यह भी स्पष्ट करते हैं कि विभिन्न समुदायों के लोग उनके पास आते हैं।
रिपोर्टर : आप सिर्फ दिल्ली आते हैं या पूरे देश में?
अकरम : मैं तो पूरे देश मैं जाता हूं, नोएडा में भी जाता हूं, वहां सैनी गांव है, वहां भी हैं।
रिपोर्टर : मतलब, मुस्लिम, गैर-मुस्लिम, सब हैं?
अकरम : जी।

केवल पवित्र जल और काले धागों से मरीजों का इलाज करने वाले अपने मृतक वालिद के विपरीत अकरम ने विरासत में मिली तीन पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों में आयुर्वेदिक दवाओं को भी शामिल कर लिया है। उनके पास कोई मेडिकल डिग्री नहीं है, फिर भी वह मरीजों को दवाइयां देते हैं और कहते हैं कि ये दवाइयां केवल उसके पास ही उपलब्ध हैं, बाजार में नहीं।
अकरम : अब मेरी दवाई है, मैं नाम नहीं बताऊंगा, मेरी शीशी 400 रुपए की है, ये 380 की है, तो उसको मैं कहूंगा, आप अलग समझकर मुझे दे हैं।
रिपोर्टर : आपकी दवाई एक बार लेनी है या बार-बार?
अकरम : दवाई तो लेनी है।
रिपोर्टर : अल्ताफ ये कह रहे थे एक ही बार पानी लिया था वालिद साहेब से, और कहा था फिर आने की जरूरत नहीं है।
अकरम : देखिए, मैं आपको फिर कहूंगा, कोई भी चीज एक जैसी नहीं होती। मैं आ दवाई देकर जा रहा हूं, मैं तो ये दुआ करूंगा आपको दवा की जरूरत ही न पड़े।
अकरम (आगे) : सिरप चलेगी बस।
रिपोर्टर : आपका सिरप चलेगा?
अकरम : जी, वो आयुर्वेद का होता है, और वो यहां भी नहीं मिलेगा।
रिपोर्टर : फिर कहां से मिलेगा?
अकरम : वो तो बाहर से आती है, ट्रांसपोर्ट से, इंदौर वगैरह से।
रिपोर्टर : वहां से मंगवाते हैं आप?
अकरम : हां।

जब अकरम से कहा गया कि उनके इलाज के तरीके चिकित्सा विज्ञान के खिलाफ हैं, तो वह अपने इलाज और दावों की जिम्मेदारी लेने के बजाय इसे अल्लाह की मर्जी पर डाल देते हैं। जवाब संक्षिप्त है, लेकिन इससे पता चलता है कि वह हर परिणाम को किस तरह से देखते हैं। वह हर परिणाम- सफलता या असफलता को अल्लाह की मर्जी के रूप में पेश करते हैं, न कि खुद को जिम्मेदार मानकर।
रिपोर्टर : वैसे मेडिकल साइंस को चैलेंज कर दिया आपने?
अकरम : अल्लाह ने! अल्लाह करने वाला है।

रिपोर्टर से बात करने के बाद अकरम ने उस शुगर मरीज का इलाज शुरू कर दिया, जिसे रिपोर्टर अकरम के इलाज की सच्चाई जानने के लिए अपने साथ लेकर गए थे। सबसे पहले अकरम ने दो काले धागों पर कुरान की आयतें पढ़ीं- एक गले में पहनने के लिए और दूसरा कमर के चारों ओर लपेटने के लिए, और मरीज को उन्हें पहनने के लिए कहा। इसके बाद अकरम ने नीम की पत्तियां लीं और मरीज के शरीर पर रगड़ीं, ताकि कोई भी बुरी आत्मा शरीर से निकल जाए। इसके बाद उन्होंने एक बिसलेरी पानी की बोतल ली, पानी के ऊपर कुरान की आयतें पढ़ीं और उसमें फूंक मारी। अकरम ने पानी देते हुए हुए मरीज से कहा कि वह दिन में तीन से चार बार यह पानी पीए और सलाह दी कि वह इसमें सामान्य पानी मिलाकर पिए, ताकि बोतल खाली न हो जाए।
इन तीन पारंपरिक तरीकों के बाद अकरम ने रिपोर्टर के साथ गए मरीज को शुगर को नियंत्रित करने के लिए कुछ आयुर्वेदिक दवाएं भी दीं, जिसके लिए उन्होंने 2,000 रुपए लिए। लेकिन कुल मिलाकर अकरम ने इस दवा और झाड़-फूंक के 4,000 रुपए लिए, बाकी रकम हदिया (तोहफे) के रूप में कहकर ली।
इससे पहले जब रिपोर्टर अकरम से मिलने सहारनपुर गए थे और वह वहां नहीं मिला, तो रिपोर्टर की मुलाकात उसकी पत्नी सूफिया से हुई थी। सूफिया ने रिपोर्टर को बताया कि उसकी शादी अकरम से 20 साल पहले हुई थी। सूफिया ने बताया कि उसने अपने ससुर और पति के इलाज से हजारों मरीजों को ठीक होते देखा है। उसने बताया कि उसके ससुर का एक साल पहले 112 साल की उम्र में इंतकाल हो गया था। उसने यह भी बताया कि उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर से एक कैंसर रोगी को हाल ही में स्ट्रेचर पर लाया गया था, लेकिन कुछ महीनों के इलाज के बाद वह खुद चलकर वापस अपने घऱ गया।
सूफिया के अनुसार, उसके पति और ससुर के पास इलाज के तीन तरीके हैं- पवित्र जल, काले धागे और झाड़-फूंक (तंत्र-मंत्र), जिनके माध्यम से उन्होंने हजारों मरीजों का इलाज किया है। उसने दावा किया कि ऐसी कोई बीमारी नहीं है, जिसका उनके पास इलाज न हो।
अकरम और उनके दिवंगत पिता से जुड़े उपचार दावों की सत्यता की जांच करने के लिए सहारनपुर जाने से पहले रिपोर्टर ने उन मरीजों की तलाश की, जिनका इलाज अतीत में मोहम्मद अकरम और उनके वालिद सूफी मोहम्मद इस्लाम ने किया था। इस कड़ी में रिपोर्टर की मुलाकात उत्तर प्रदेश के नोएडा के सेक्टर-81 के रहने वाले अल्ताफ से हुई, जिन्होंने कोरोना से पहले 2019 में अकरम के पिता से शुगर का इलाज कराया था। तब वह जिंदा थे। अल्ताफ के साथ रिपोर्टर की यह मुलाकात अकरम से मिलने से पहले हुई थी।
अल्ताफ ने रिपोर्टर को बताया कि 2019 में उनका शुगर लेवल इतना बढ़ गया था कि उनकी आंखों की रोशनी लगभग चली गई थी और उन्हें कुछ भी देखने में कठिनाई हो रही थी। उन्होंने बताया कि वह अपने कमरे से वॉशरूम तक भी नहीं जा सकते थे। उन्होंने कहा कि उनके दामाद उन्हें एक नेत्र विशेषज्ञ के पास ले गए, जिन्होंने उनकी आंखों की जांच की और उन्हें ठीक बताया, फिर भी उनकी दृष्टि धुंधली ही रही। उन्हें ठीक से दिखाई नहीं देता था।
अल्ताफ ने बताया कि उनके दामाद उन्हें दूसरे अस्पताल ले गए, जहां डॉक्टरों ने उनके शुगर लेवल की जांच की और बताया कि यह इतना अधिक है कि उनकी जान जा सकती है। लेकिन सूफी मोहम्मद इस्लाम ने उन्हें ठीक कर दिया और अब वह अल्लाह के करम से अभी भी जीवित हैं। आगे की कहानी में अल्ताफ ने बताया है कि अकरम के अब्बा के पास पहुंचने से पहले ही उनकी सेहत कैसे बिगड़ गई थी।
अल्ताफ : लॉकडाउन से पहले मैं अंधो हो गए शुगर में।
रिपोर्टर : अंधे हो गए?
अल्ताफ : हां, दीखना बंद हो गया।
अल्ताफ (आगे) : शुगर मेरी बढ़ गई बहुत ज्यादा, आंखों से दिखना बंद हो गए।
रिपोर्टर : उससे पहले शुगर चेक नहीं कराई थी?
अल्ताफ : न, कराई थी, 200, 250, 270 तक पहुंच जाए, अब जब दीखना बंद हो गया, मैं कह रहा ये झूमरे से दिखाई दे रहे हैं, मैं अंधों हो गए बिल्कुल। मुझसे दरवाजे से न निकला जाए।
अल्ताफ (आगे) : जब अंधो हो गए बिल्कुल, तो जमाई मेरा वो मुझे ले गए आंख वाले के पास। अब आंख चेक कराई मशीन में तो क्लीयर आवे, के जी आंख में तो गड़बड़ है न कुछ। और वैसे दिखाई न दे। दूसरे जगह गए, वहां भी यही हाल हुआ। फिर ले गए जेपी (हॉस्पिटल) में, वहां जमाई का जान-पहचान का था डॉक्टर, वहां देखते ही बोला उसने इनकी शुगर नापो, तो शुगर फेल।
रिपोर्टर : शुगर फेल मतलब?
अल्ताफ : मतलब, डॉक्टर बोला अल्लाह की कोई मेहरबानी है जो तुम जी रहे हो, नहीं तुम तो खतम थे।
अल्ताफ (आगे) : उन्होंने फिर गोली दी, लिटाया, पहले खिलमिली सी आंख में आई, मैंने बोला क्लीयर नहीं है, बोले जामुन खाओ, जामुन उस टाइम पर न मिल रहे, मैंने मंडी में फोन करवायो, वो आजादपुर से फिर जामुन लाए।



अल्ताफ ने बताया कि एक महीने के एलोपैथिक इलाज के बाद उनकी दृष्टि फिर से धुंधली हो गई। उनके अनुसार, एक दिन वह अपने गांव में सतीश नाम के एक डॉक्टर सहित तीन अन्य लोगों के साथ बैठे थे। वे चारों भी शुगर के मरीज थे और अपने बढ़ते शुगर लेवल को लेकर काफी चिंतित थे। अल्ताफ ने बताया कि तभी सतीश ने उन्हें बताया कि वह सहारनपुर के गाड़ा गांव में एक ऐसे व्यक्ति को जानता है, जो गारंटी के साथ मधुमेह का इलाज करता है। यह सुनकर वे चारों इलाज के लिए उस व्यक्ति से मिलने सहारनपुर गए।
आगे की बातचीत में अल्ताफ बताते हैं कि नियमित दवा लेने के बावजूद उनकी आंखों की रोशनी फिर से कमजोर होने लगी। उन्हें गांव में हुई एक अनौपचारिक सभा याद आती है, जहां चार मधुमेह रोगी अपनी चिंताओं को साझा कर रहे थे। वहीं पर समूह के एक डॉक्टर ने गाडा गांव में गारंटी के इलाज का जिक्र किया। उस सुझाव ने उनके रुख को बदल दिया।
अल्ताफ : महीने पीछे फिर झिलमिली सी होने लगी।
रिपोर्टर : एक महीने बाद?
अल्ताफ : जबकि दवा मैं ठीक से खा रहा हूं।
रिपोर्टर : डॉक्टर की?
अल्ताफ : फिर ऐसे ही जैसे हम-तुम बैठे हैं, ऐसे ही बैठ जाए गांव में लोग, आग जलाए शाम को और सुबह बैठ जाए 4-6 आदमी। तो एक डॉक्टर था सतीश, एक मैं था, एक ड्राइवर इलियास, मतलब ऐसे 4-6 लोग बैठे थे, …तो सतीश कह रहा शुगर बहुत ज्यादा है क्या करें, मैंने कहा शुगर हमारे भी बढ़ रहा है हम क्या करें? बोला चलो उधर चल रहे हैं सहारनपुर में बताया गाड़े गांव के जोहरे।
रिपोर्टर : गाड़ा गांव?
अल्ताफ : मैंने कहा चलो, हम 4-5 लोग ऐसे ही चल दिए।

अल्ताफ ने बताया कि छः साल पहले जब वे चारों सहारनपुर गए थे, तब अकरम के अब्बा सूफी हकीम मुहम्मद इस्लाम जिंदा थे। उनके तीनों साथियों को पहले नीम की पत्तियों से झाड़ना पड़ा। उसके बाद सूफी हकीम मोहम्मद इस्लाम ने अल्ताफ को बुलाया और उन्हें एक थाली में रखे चार रसगुल्ले खिलाए। अल्ताफ ने कहा कि उन्होंने कुछ हिचकिचाहट के बाद मिठाई खाई और चाशनी पी, क्योंकि उनका शुगर लेवल बहुत अधिक था। इसके बाद हकीम इस्लाम ने उन्हें पढ़ा हुआ पानी पिलाया, उनके गले और कमर में काले धागे बांधे और किसी भी बुरी आत्मा को दूर करने के लिए उनके शरीर पर नीम की पत्तियां मलीं। इन तीनों उपचार विधियों के बाद उन्हें एक या दो घंटे के लिए लेटने के लिए कहा। अल्ताफ ने बताया कि एक घंटे बाद जब उन्होंने अपना शुगर लेवल चेक कराया, तो वह यह देखकर हैरान रह गए कि शुगर लेवल 600 से घटकर लगभग 250 रह गया था। उन्होंने बताया कि हकीम इस्लाम ने उनसे कहा कि वे जो चाहें खा सकते हैं और उन्हें एंटी-शुगर की गोलियां न लेने की सलाह दी।
रिपोर्टर : 6 साल पहले?
अल्ताफ : हां जी, अब इन तीनों को तो झाड़ा, हम चारों एक साथ घुसे, बैठ गए। बोले कि इसे बुलाओ, मेरे लिए, इतनी बड़ी प्याली थी, उसमें 4 रसगुल्ले मीठे, बोले खा लो, मैंने कहा मारेगा क्या, हम इलाज को आए हैं या मरने को मरवाने को!
अल्ताफ : फिर बोले, खाना है। आवाज बहुत कड़क, मैंने भीच-भीच के ऐसे सारा निकाल के खा लिया। अब मैंने खा तो लिए, फिर कह रहे इसे पीओ, मैंने कहा ये क्या बदतमीजी है, पर मैंने पी लिया।
रिपोर्टर : पहले रसगुल्ले खा लिए, फिर शीरा पिलवा दिया?
अल्ताफ : पीने के बाद मुझे बोले, घूमने कहीं नहीं जाओगे, चलो लेटो। सीधे लेटो। …हां, वहां से उठा के झाड़ लगा दिया और फिर पानी पिला दिया।
रिपोर्टर : झाड़ा किससे?
अल्ताफ : नीम की टहनी से।
रिपोर्टर : आपके जो साथ थे, उनको भी झाड़ा दिया?
अल्ताफ : हां, उसके बाद घंटा एक पीछे चेक करी तो 260…।
रिपोर्टर : 260? 600 की 260 हो गई एक घंटे बाद?
अल्ताफ : मेरे मुंह से ये निकल गई, ये हैं भी या यूं ही, बोले- इंशाअल्लाह इतनी ही रहेगी, मगर मेरे परहेज होंगे न तुमसे?
रिपोर्टर : मतलब, जो मैं परहेज बताऊंगा, तुम नहीं पाओगे?

अल्ताफ : मैंने कहा, मरते क्या न करते, कर लेंगे। बोले- हां अब कर लेगा। मैंने कहा इंशाअल्लाह तआला, बोलिए, कुछ भी खा लिओ, कुछ भी पी लिओ, लेकिन शुगर की दवा न लिओ।

अल्ताफ ने कहा कि सूफी हकीम मोहम्मद इस्लाम ने उन सभी को केवल पवित्र जल पीने के लिए दिया और दो काले धागे पहनने के लिए दिए, एक गले में और एक कमर में और कोई दवा नहीं दी। अल्ताफ के अनुसार, उन्हें कहा गया था कि दिक्कत होने पर ही दोबारा आएं अन्यथा दोबारा आने की कोई जरूरत नहीं।
रिपोर्टर : दवा कुछ नहीं दी, उन्होंने सिर्फ पानी और कमर में बांधने को…?
अल्ताफ : हां।
रिपोर्टर : चारों को दी?
अल्ताफ : हां, सबको।
रिपोर्टर : उनकी शुगर कितनी थी?
अल्ताफ : वो तो डॉक्टर साहिब हैं, दुकान कर रखी है बड़ी, उनके तो गांठें पड़ जाती थीं यहां।
रिपोर्टर : इतनी शुगर?
अल्ताफ : हां, कुछ भी न हुआ उन्हें।
रिपोर्टर : वो भी खा रहे हैं दवा?
अल्ताफ : न, देखो जी, हमें तो यकीन न, अल्लाह ने कर दिया आराम।
अल्ताफ (आगे) : आराम करना न करना अल्लाह के हाथ में है।
रिपोर्टर : बस उसके बाद कुछ नहीं?
अल्ताफ : न जी, उन्होंने कहा था ज्यादा मजबूरी है तो आ जाओ और न तो कुछ नहीं।

अल्ताफ ने कहा कि उन्होंने दिवंगत हकीम इस्लाम से शुगर का इलाज 6 साल पहले कराया था और तब से वह और उनके साथ गए तीन अन्य लोग ठीक हैं। उनके अनुसार, उन्होंने पिछले 6 साल शुगर का कोई चेकअप नहीं कराया है, क्योंकि उन्हें इसकी कोई जरूरत महसूस नहीं होती है। उन्होंने कहा कि उनकी नजर भी ठीक है, उनके पैरों में भी दर्द नहीं होता है और उनमें बीमारी से संबंधित कोई अन्य लक्षण भी नहीं हैं। उन्होंने यह भी कहा कि वह मिठाई और मीठी चीजें भी खाते हैं।
रिपोर्टर : अब शुगर चेक कराते हो आप?
अल्ताफ : न, मैंने कराई न।
रिपोर्टर : कब से?
अल्ताफ : तभी से, पहले मेरे पैरों में दर्द हो जाए, आंखों से तो कम दिखाई दे, सर में दर्द होना, मेरे को तो अब कुछ भी नहीं, ..अल्लाह का शुक्र है।
रिपोर्टर : 6 साल से शुगर टेस्ट ही नहीं कराई?
अल्ताफ : न, जिस चीज की मुझे जरूरत ही न, क्यूं टेस्ट कराऊं?
रिपोर्टर : चाय मीठी पीते हो?
अल्ताफ : हां, ये तो कम (शुगर की) आपकी वजह से आई है, वर्ना और मीठी पीता हूं।
रिपोर्टर : और मीठा भी खा रहे हो?
अल्ताफ : हां, जो भी मीठा है, सब खा रहा हूं।
रिपोर्टर : और जो आपके साथ तीन साथई गए थे?
अल्ताफ : सब खा रहे हैं।

अल्ताफ के अनुसार, नोएडा के उनके गांव ककराला के कई लोग बाद में विभिन्न बीमारियों के इलाज के लिए सूफी हकीम इस्लाम के पास गए और किसी ने भी कभी उनके बारे में शिकायत नहीं की। उन्होंने कहा कि हकीम इस्लाम कोई निश्चित शुल्क नहीं लेते थे, लोग अपनी इच्छा अनुसार हदीया (तोहफे) के रूप में कुछ भी दे आते थे।
रिपोर्टर : किसी की नहीं आई शिकायत?
अल्ताफ : भाई अभी तक तो आई न, उसके बाद तो बीसियों आदमी चले गए हमारे गांव से उनके पास।
रिपोर्टर : कौन-सा गांव है ये?
अल्ताफ : ककराला।
रिपोर्टर : बीसियों आदमी चले गए यहां से?
अल्ताफ : अच्छा, 3 चीजें थीं, एक चीज मैं भी भूल रहा हूं, शुगर, थायराइड और एक चीज और पता नहीं क्या बताई झाड़ा लगाते हैं वो।
रिपोर्टर : खतम कर देते हैं?
अल्ताफ : हां।
रिपोर्टर : पैसे लेते हैं?
अल्ताफ : नहीं, जो मर्जी हो एक पेटी रखी है वहां, उसमें गेर आओ, जिसकी जितनी खुशी हो, 100, 200, 500 या एक रुपया।
रिपोर्टर : भीड़ लगी रहती होगी उनके पास?

अल्ताफ : बहुत लोग आए, हम तो यहीं उनके मकान के पीछे से आ रहे, राजस्थान से, पता नहीं कहां-कहां से लोग आ रहे।

 चिकित्सा विज्ञान के अनुसार, न तो थायरॉइड कोई बड़ी समस्या और न ही मधुमेह, आमतौर पर इन बीमारियों का इलाज है। हालांकि इन दोनों ही बीमारियों का इलाज अमूमन लंबा चलता रहता है, जिसमें ज्यादातर मरीजों का इलाज जिंदगी भर चलता रहता है। कैंसर जैसी अन्य गंभीर बीमारियां आमतौर पर आधुनिक चिकित्सा में महंगे इलाज की मांग करती हैं और जल्दी ठीक नहीं हो पातीं। कैंसर आदि ठीक करने के लिए काफी हद तक समय पर इलाज महत्वपूर्ण है। फिर भी सूफी मोहम्मद हकीम इस्लाम इन गंभीर बीमारियों का इलाज करने का दावा करते थे और कई मरीज, जो अब ठीक हो चुके हैं, उनके इलाज की प्रशंसा करते हैं और अब उनकी मौत के बाद उनके बेटे सूफी मोहम्मद हकीम अकरम भी ऐसी बीमारियों के इलाज कर रहे हैं। अकरम चिकित्सा विज्ञान के द्वारा लाइलाज मानी जाने वाली बीमारियों को ठीक करने का दावा करते हैं।

भारत में धार्मिक तरीके से झाड़-फूंक आदि के माध्यम से इलाज करना व्यापक रूप से प्रचलित है और यह कोई अपराध नहीं है। पूजा-पाठ, प्रार्थना, पवित्र जल और आस्था से उपचार करने वालों जैसी प्रथाओं के माध्यम से लंबे समय से शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का समाधान किया जाता रहा है। हालांकि भारत में नकली इलाज को बढ़ावा देना या प्रदान करना एक गंभीर अपराध है, जिस पर कई कानूनों के तहत मुकदमा चलाया जा सकता है। वैध डिग्री और चिकित्सा पंजीकरण के बिना मरीजों का इलाज करना या डॉक्टरी अभ्यास करना भी एक अपराध ही है। तहलका की पड़ताल में सूफी हकीम मोहम्मद अकरम के मरीजों को आयुर्वेदिक दवाएं देते हुए पकड़ा गया है और उनकी खुद की स्वीकारोक्ति के अनुसार, उनके पास कोई वैध योग्यता नहीं है, जो कानून का स्पष्ट उल्लंघन है। उनके दावों से उम्मीद तो जगती है, लेकिन ये दावे अनियमित चिकित्सा के जोखिमों और सतर्कता की जरूरत को भी रेखांकित करते हैं।