खनन महकमे की खाक उड़ी

खनन के पीछे कितने षड्यंत्र और घोटाले छिपे होते हैं? इसकी फैलती-पसरती मुश्क ही अफसरों के दरवाज़ों के पीछे मुसीबतों की दस्तक देती रहती है। सवाल है कि क्यों इन्हें अपशकुनों के संकेत दिखाई नहीं देते और क्यों ये अपनी हरकतों से बाज़ नहीं आते? लेकिन क्या घूस के परनालों पर ढक्कन लगाने की बजाय विभागीय मंत्री प्रमोद भाया का औपचारिकता से सना जवाब जायज़ है कि ‘जो जैसा करेगा, वैसा भरेगा!’ राजस्थान के खनन मंत्री प्रमोद भाया कहते हैं- ‘भाजपा सरकार में खनन महकमा बुरी तरह बदहाल था। लेकिन जब से मैंने कमान सँभाली महकमे को पटरी पर लाने की कोशिश कर रहा हूँ।’

लेकिन महकमे को पटरी पर लाने का उनका पहला कदम तो तभी लडख़ड़ा गया, जब महकमे के संयुक्त सचिव बी.डी. कुमावत ही भ्रष्टाचार के आरोपों में धर लिये गये। कोई महकमा सरकार के आठ महीनों के कार्यकाल में ही घूसखोरी की कालिख पुतवाकर कुख्याति का लबादा ओढ़ ले तो शुचिता का दावा करने वाले दरोगा कहाँ मुँह छिपाएँगे? क्या लोगों को इस बात का मलाल नहीं होना चाहिए कि जिस दिन मुख्यमंत्री अशोक गहलोत माफिया मुक्त प्रदेश का दावा कर रहे थे, ठीक उसी दिन बेइमानी की खदान से मालामाल सरकारी नगीना पन्नालाल निकला। भ्रष्टाचार निरोधक दस्ते ने जब घूसखोरी में पकड़े गये अधीक्षण अभियंता पन्नालाल मीणा का घरवार खंगाला, तो जैसे कुबेर का खजाना फट पड़ा। करोड़ों की नकदी, बेशकीमती भूखण्डों के दस्तोवज़ तो निकले ही, साथ ही गैस एजेंसी, स्टोन फैक्ट्री और गाय-भैसों के तबेले तक निकल पड़े। पन्नालाल के तार एसीबी के हत्थे चढ़ चुके खनन विभाग के संयुक्त सचिव बी.डी. कुमावत से भी जुड़े पाये गये। हालाँकि, इस काली कमाई की बदोलत अपार सम्पदा जुटाने वाले पन्नालाल कितने बड़े कुबेर हैं? इसका पूरा ब्यौरा जुटाने के लिए एसीबी अभी तक उसकी दबी दौलत के परदे नोचने में लगी है। अब सवाल यह है कि पन्नालाल की काली कमाई की इस सुरंग को खोदने में एसीबी कितनी कामयाब हो पाती है? उधर तबादलों के खेल में 20 से 25 लाख के नज़राने को लेकर पहले ही मीडिया के निशाने पर चल रहे खनन मंत्री प्रमोद भाया सौंगध लेने में बेशक पीछे नहीं रहते, कि लानत है, जो एक पायी भी ली हो; लेकिन इस सवाल पर भाया क्यों मिमियाने लगते हैं। क्यों शिकायतों के कुंड में सिर से पाँव तक सने हुए अधीक्षक अभियंता पन्नालाल मीणा को मौज़ूदा जगह से नहीं हटाया जा रहा था? इसके विपरीत उसे अतिरिक्तमुख्य अभियंता का चार्ज भी क्यों सौंप दिया गया? उसे गुनाह के घेरे में लाने की बजाय कद्दावर पद का अतिरिक्त प्रभार देकर इनाम-इकराम से क्यों नवाज़ दिया गया? यह हकीकत मंत्री के कसमों, वादों का मखौल उड़ाने के लिए काफी नहीं है क्या? दिलचस्प बात है कि पन्नालाल घूसखोरी से उलीचती दौलत के परनालों का रुख अपने कुनबे की तरफ मोड़ता रहा। यहाँ तक कि फर्ज़ी कम्पनियाँ बनाता रहा। लेकिन मंत्री सिर्फ यह कहकर रह गये कि खनन महकमे में राजनीतिक दबाव भी तो रहता ही है।

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि तो क्या घोटालों का संस्करण गढऩे वाले पन्नालाल मीणा की जड़ें कोटा में जमाये रखने के पीछे कोई राजनीतिक दबाव था? जानकार सूत्रों की मानें, तो मीणा की जड़ें कोटा में ही जमाये रखने को लेकर महकमे के आला अफसरों में जमकर जुगाड़बाज़ी और विवाद चला था। यह विवाद इस कदर बढ़ गया था कि मुख्यमंत्री तक को दखलंदाज़ी करनी पड़ी। सूत्रों की मानें तो पन्नालाल मीणा की पहुँच का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है  कि जयपुर तक विवाद पहुँचने के बावजूद उसे हिलाने की किसी की ज़ुर्रत नहीं हुई। पुख्ता सूत्रों की मानें तो बजरी खनन की लीज और अवैध खनन की काली कमाई के बंदरबाँट को लेकर खनन महकमे में ‘गैंगवार’ सरीखे हालात पैदा हो गये। फिर भी सरकार ने इस मामले को अनसुना कर दिया। खनन का गोरखधंधा पूरी तरह ‘बीपीएल’ की मुट्ठी में बन्द रहता है। बीपीएल का ज़िक्र छिड़ते ही ज़ेहन में गरीबी रेखा से नीचे जीवनयापन करने वालों की तस्वीर खिंच जाती होगी? लेकिन खनन महकमे में बीपीएल का मतलब है- ‘सबसे ज़्यादा भ्रष्ट अफसरों का ऐसा गिरोह, जो पट्टे दिलाने से लेकर अवैध खनन तक कराने के लिए खुली छूट देने को तैयार खड़ा रहता है।’ यहाँ ‘बी’ का मतलब बंशीधर यानी बी.डी. गुप्ता,  ‘पी’ का मतलब पन्नालाल और ‘एल’ का मतलब लेखराज से है। सूत्रों का कहना है कि ‘बंशीधर के बाद पन्नालाल को निशाने पर लेने के पीछे बीपीएल विरोधी गैंग की कारस्तानी है। पन्नालाल को गिरफ्त में लाने का बीड़ा उठाने वाले परिवादी राजेन्द्र शर्मा उसे बेहद सनकी और संगदिल िकस्म का इंसान बताते हैं।

राजेन्द्र कहते हैं- ‘मैंने यह कहते हुए दो लाख की बजाय 50 हज़ार देने की पेशकश की कि मेरे पास ज़्यादा पैसा नहीं है। बेटी की शादी की है, उसमें सारा पैसा खर्च हो गया है।’ इस पर पन्नालाल ने मुस्कुराते हुए कहा- ‘यह मान लेना कि मेरी बेटी का कन्यादान कर रहे हो? राजेन्द्र शर्मा की पीड़ा को समझें तो, पिछले छ: महीनों से वो 19 लाख की धरोहर राशि को रिलीज करवाने के लिए खनन महकमे के चक्कर लगा रहा था। लेकिन बात घूस की मुँह माँगी रकम को लेकर फँसी हुई थी। लाख मनुहार के बाद भी पन्नालाल नहीं माना, तो राजेन्द्र शर्मा को उसे सबक सिखाना ही बेहतर लगा। एक बड़े राजनेता ने अपना नाम प्रकाशित नहीं करने की शर्त पर कहा कि मौज़ूदा राजनीतिक माहौल में तबादले सबसे बड़ा उद्योग बन चुके हैं। इस उद्योग में सिर्फ चाँदी के जूते की आवाज़ ही सुनाई देती है। अब इस खनक में खनन मंत्री प्रमोद भाया दावा करें कि ‘तबादले राजनीतिक और प्रशासनिक दबाव से होते हैं, पैसों से नहीं; तो इससे बड़ा मज़ाक क्या हो सकता है? राजनेता का कहना था- ‘पिछली गहलोत सरकार में प्रमोद भाया को विवादों के कारण ही अपना पद गँवाना पड़ा था। इस बार फिर विवादों मे फँसते नज़र आ रहे हें?’ लेकिन प्रमोद भाया ने विवादों की बात को साफ नकारते हुए कहा कि पिछली बार संगठन को लगा होगा कि कैबिनेट में मेरी ज़रूरत नहीं है।’ इसलिए बदलाव हुआ। लेकिन असल में न तो पिछली बार कोई विवाद था और न ही इस बार कोई विवाद है। भ्रष्टाचार की अखण्ड गाथा की व्यास गद्दी पर बैठे हुए अफसरों ने काली कमाई के रंग को अमावस की रात से भी गाढ़ा कर दिया है कि सच तो आँखें गढ़ाने के बावजूद दिखाई नहीं देता। इस महकमे में कड़ी से कड़ी जोडऩे का एक ऐसा तंत्र बन गया है कि उसे तोडऩे तो दरकिनार ताडऩा ही मुश्किल है। पन्नालाल की गिरफ्तारी से कोई एक महीने पहले एक बड़ा घडिय़ाल माइनिंग इंजीनियर गोपाल बच्छ एसीबी के जाल में फँस चुका था। लेकिन पन्नालाल ने उससेे सबक तक नहीं लिया। इसे अवसरों और शक्तियों के केन्द्रीकरण की संज्ञा दी जानी चाहिए कि गोपाल बच्छ की वसुंधरा सरकार के दौरान 2015 में हुए चर्चित घूसकांड के मास्टर माइंड अशोक सिंघवी से आज भी नज़दीकी बनी हुई है। दिलचस्प बात है कि बच्छ ने अपने कारोबार में कई बड़े नेताओं, पुलिस और वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारियों के नाम गिनाये हैं। एसीबी की बेचैन निगाहें बच्छ पर अभी भी पूरी तरह टिकी हुई हैं। एसीबी ने खनन महकमे को लेकर अपने दाँत पूरी तरह बन्द नहीं किये हैं। लिहाज़ा जल्दी ही कुछ और बड़े खुलासों का इंतज़ार तो बेकरारी के साथ रहेगा ही। खनन महकमे में पैठ बनाये हुए बीपीएल से दिलजले भी तो इसी िफराक में होंगे? खनन मंत्री प्रमोद भाया बेशक ‘मेरा दामन सबसे सफेद’ का नारा लगाते रहे। लेकिन खनन महकमे का बुनियादी चरित्र तो नहीं बदल सके।

अपहरण में भी रंगे हाथ!

घूसखोरी के खेल में गले-गले तक डूबा पन्नालाल अपहरण और रंगदारी के खेल में भी लिप्त था। खान महकमे के वरिष्ठ लिपिक योगेश भट्ट की पत्नी चंद्रा भट्ट द्वारा थाने में दर्ज करायी गयी रिपोर्ट इस बात की तस्दीक करती है। चंद्रा भट्ट द्वारा पुलिस को दी गयी शिकायत में कहा गया है कि उसके पति पिछली 24 नवंबर से लापता है। उस दिन घर से बाँसवाड़ा जाने को निकले योगेश का आज तक कोई पता नहीं है। योगेश भट्ट लम्बे समय से महकमे में चल रहे भ्रष्टाचार का खुलासा करने में लगा था, उसने  ही पन्नालाल मीणा की अवैध सम्पत्ति की शिकायत की थी। योगेश भट्ट महकमे में फर्ज़ी दस्तावेज़ के ज़रिये 38 साल तक नौकरी करने वाले बाबू लेखराज मीणा की हकीकत का भी खुलासा किया था। योगेश बजरी माफिया के ख्ेाल को भी बेनकाब कर चुका था। इस मामलेे में एक बड़े राजनेता के सुरक्षाकर्मी ने येागेश को मामला रफा-दफा करने को कहा था। लेकिन योगेश ने अनसुनी कर दी। नतीजतन उसे देख लेने की धमकी भी मिल चुकी थी। सूत्रों की मानें तो येागेश भट्ट फेसबुक पर पोस्ट डाल कर पन्नालाल मीणा को चेता चुका था। कि अब तेरी बारी है…., तेरा काउंट डाउन शुरू हो चुका है। उधर अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक दिलीप सैनी का कहना है कि मामले की जाँच की जा रही है। अभी ज़्यादा कुछ नहीं कहा जा सकता?