किसानों को चाहिए चौधरी चरण सिंह जैसा नेतृत्व

वर्तमान का किसान और श्रमिक वर्ग प्राकृतिक न होकर धाॢमक पाखण्डवाद और अन्धविश्वास की गिरफ्त में है। यही वजह है कि धाॢमक दंगों में किसान और श्रमिक वर्ग आगे रहता है। जो किसान और श्रमिक वर्ग कभी अपने हक-हुकूक की लड़ाई लड़ता था, वह आज हिन्दू-मुस्लिम की लड़ाई लड़ रहा है। किसानों में सबसे बड़ी संख्या में जाट समुदाय कभी धाॢमक कट्टरता का पक्षधर नहीं रहा, लेकिन आज के दौर में अगर देखा जाए तो इस समुदाय में सबसे अधिक धाॢमक कट्टरवाद और पाखण्डवाद दिखाई देता है। अगर फिलहाल की बात करें, तो इस मौसम में हरिद्वार से काँवड़ लाने वालों में सबसे अधिक जाट समुदाय या अन्य ओबीसी समुदाय के युवा होते हैं। इससे साफ ज़ाहिर होता है कि किसान और किसान के साथ जुडऩे वाली अन्य जातियाँ किस प्रकार से धाॢमक कट्टरता और पाखण्डवाद में जकड़ी हुई हैं। जिन किसानों और श्रमिक वर्ग के पूर्वज चौधरी छोटूराम मुस्लिमों के गढ़ में चुनाव जीतते थे; अनुसूचित जातियों से दीनबन्धु की उपाधि प्राप्त करते थे; मुस्लिम समुदाय ने जिसको रहबर-ए-आज़म के खिताब से नवाज़ा था। उन सर छोटूराम के वशंज आज राजनीतिक चक्रव्यूह में फँसकर और मण्डी-फण्डी (मण्डी के दलालों) के बहकावे में आकर मुस्लिमों एवं अनुसूचित जातियों से दूर हो गये हैं। यह एक प्रकार से किसानों और श्रमिक वर्ग के राजनीतिक पतन का कारण है। सर्वविदित है कि देश के एकमात्र किसान नेता चौधरी चरण सिंह के मुख्यमंत्री से लेकर प्रधानमंत्री बनने तक सबसे ज़्यादा सहयोग करने वाले यही मुसलमान, अनुसूचित जाति के किसान और कामगार लोग थे।

एक समय में चौधरी चरण सिंह का यह रुतबा था कि उनकी धाक थी। सन् 1979 की बात है, जब वह प्रधानमंत्री थे। शाम के 6 बजे वह मैला-कुचैला कुर्ता पहनकर एक गरीब किसान की वेशभूषा में इटावा ज़िले के ऊसराहार थाने पहुँचे और वहाँ के थानेदार से अपने बैल चोरी होने की रिपोर्ट लिखने को कहा। वहाँ के दारोगा ने पुलिसिया अंदाज़ में पहले तो उनसे चार-पाँच टेढ़े-मेढ़े सवाल पूछे, फिर फटकारकर भगा दिया। जब प्रधानमंत्री (चौधरी चरण सिंह) थाने से जाने लगे, तो पीछे से एक सिपाही आकर बोला- ‘थोड़ा खर्चा-पानी दे, तो रपट लिख जाएगी।’ किसान के रूप में चौधरी चरण सिंह ने रिश्वत देने की हामी भर दी और 35 रुपये की रिश्वत पर रिपोर्ट लिखने की बात तय हो गयी। रिपोर्ट लिखकर थाने के मुंशी ने उनसे पूछा- ‘बाबा! दस्तखत करोगे या अँगूठा लगाओगे?’ उन्होंने दस्तखत करने को कहकर स्याही का स्टैंप पैड (अँगूठा / मुहर लगाने वाला सियाहीदान) उठाया, तो मुंशी चक्कर में पड़ गया कि दस्तखत करने की बात कहकर वह (किसान) स्टैंप पैड क्यों उठा रहा है? वह हँसने लगा। उसे लगा कि इस किसान को शायद दस्तखत का मतलब नहीं मालूम होगा। तब तक उन्होंने चौधरी चरण सिंह नाम से दस्तखत कर दिये और अपने मैले-कुचैले कुर्ते से मुहर, जिस पर प्राइम मिनिस्टर ऑफ इंडिया लिखा था; निकालकर वहाँ लगा दी। इतना देखते ही पूरे थाने में हड़कम्प मच गया। सभी के होश फाख्ता हो गये। इसके बाद ऊसराहार का पूरा थाना बर्खास्त कर दिया गया।

आज किसानों के हित में सोचने वाले ऐसे ही नेताओं की ज़रूरत है; ताकि किसानों की दशा और दिशा बदल सके। लेकिन आज की राजनीति में किसान वर्ग के नेता की कमी साफ झलकती है। मेरा मानना है कि आज के राजनीति हालात में किसानों की नज़रें एक अदद किसान नेता को तलाशती नज़र आती हैं। आज भारतीय राजनीति में किसान नेताओं का टोटा साफ दिखायी देता है। दरअसल कुछ राजनीतिक दलों के चालाक िकस्म नेताओं ने किसानों और श्रमिकों में फूट डालने के लिए भयंकर षड्यंत्र रचने का काम किया है; यह उसी का नतीजा है। नेताओं द्वारा सबसे पहले किसानों को जाति और धर्म के आधार पर बाँटा गया, फिर किसानों और श्रमिकों के बीच एक भेद पैदा किया गया, साथ ही श्रमिकों को भी जाति और धर्म के आधार पर बाँटा गया। इसका किसानों को यह नुकसान हुआ कि उसके आवाज़ उठाने के लिए सरकार में कोई नेता ही नहीं बचा। नतीजतन किसान कमज़ोर होने लगे। अब तो हद ही हो गयी है। राजनीतिक दलों के नेताओं ने किसान को पूरी तरह बर्बाद करने के लिए अब किसानों को फसलों के नाम पर बाँटने की मुहिम चला रखी है। जैसे यह गन्ना किसान, आलू का किसान, धान का किसान और कपास का किसान, बड़ा किसान, छोटा किसान आदि कहकर उन्हें बाँटा जा रहा है। किसान भी लालच में आकर कहीं-न-कहीं नेताओं की इस मुहिम का हिस्सा बन जाता है; क्योंकि लगभग हर साल चुनाव सिर पर रहते हैं; कभी ग्राम पंचायत, कभी विधानसभा, कभी लोकसभा चुनाव, तो कभी अन्य चुनाव। इन चुनावों में अन्य लोगों के साथ किसान भी बँट जाते हैं; और किसानों की इसी आपसी फूट का राजनीतिक दल भरपूर राजनीतिक फायदा उठाकर अपनी राजनीतिक फसलों को लहलहाने का काम कर रहे हैं। जबकि किसानों को ठगे जाने का एहसास तक नहीं होता और वे मूर्ख बनकर लगातार लुटते-पिटते जा रहे हैं। कभी कुदरत उन्हें सताती है, तो कभी सरकार और आये दिन मण्डियों में बैठे दलाल, आला-अफसर उनको लूटते-सताते रहते हैं।

दरअसल आज देश में पीढ़ी-दर-पीढ़ी राजनीतिक सामंत पैदा हो गये हैं, जो दिल्ली और लखनऊ की सत्ता की अधीनता में ऐशो-आराम एवं दलाली बट्टा कर रहे हैं। ज़ाहिर है कि दलित-पिछड़े वर्ग की हालत पहले से ही बहुत दयनीय हैं। किसानों की आज़ादी की पहली पंक्ति के नेताओं ने जो मार्गदर्शन दिया और किसानों के हित में जो कानून बनाये, उससे एकबारगी लगा कि किसान सँभल जाएँगे। अगर पीछे मुड़कर देखें, तो 1980-90 के दशक में किसानों का जो नेतृत्व दिल्ली की तरफ बढ़ा था, वो भले ही केंद्र सरकार को लम्बे समय तक अपने कब्ज़े में न ले सका हो, मगर उसकी बदौलत कई राज्यों में उसने सरकारें बनाने कामयाबी हासिल अवश्य की थी। सन् 1990 के बाद राजनीतिक दलों और मण्डी-फण्डी को लगा कि किसान कहीं सत्ता पर कब्ज़ा न कर लें; इसलिए इन्होंने बड़े शातिराना अंदाज़ में समाजवाद को लात मारते हुए पूँजीवाद के चरणों में गिरना मुनासिब समझा। अब विदेशी कम्पनियों के गुलाम बनकर, देशी-विदेशी लालाओं के पैसों के बल पर किसानों से सस्ते दामों पर अपनी मन-मर्ज़ी के मुताबिक दलाल अनाज, सब्ज़ियाँ और दालें खरीदने लग गये हैं। सरकारें और नेता भी दलाल पक्ष में खड़े दिखते हैं। यही वजह है कि असली किसानों नेतृत्व गायब हो चुका है और जो किसान बचे हैं, वे बिखर चुके हैं। जो सरेआम हो रही लूटपाट और अत्याचार से तंग आ जाते हैं या इस सबके चलते पोर-पोर कर्ज़ में डूब जाते हैं, वे आत्महत्या कर लेते हैं।

आज़ादी से पूर्व चौधरी सर छोटूराम किसान और श्रमिक वर्ग की राजनीति का केंद्र हुआ करते थे। उनके द्वारा किये गये किसान और श्रमिक वर्ग हित के कार्यों से लगभग सभी किसान और श्रमिक भलीभाँति परिचित हैं। सर छोटूराम इतने बड़े ओजस्वी नेता थे कि उनके आगे अंग्रेजी हुकूमत भी नतमस्तक थी। सर छोटूराम द्वारा बनाये गये किसान और श्रमिक वर्ग के हितैषी कानून अंग्रेजी हुकूमत इस प्रकार से लागू करती थी कि मानों सर छोटूराम उस हुकूमत के पार्टनर हों। इस प्रकार हमें आभास होता है कि आज़ादी से पूर्व किसानों और श्रमिकों की राजनीतिक स्थिति बहुत-ही समृद्ध एवं प्रभावशाली थी।

आज़ादी के बाद अगर किसानों की राजनीतिक स्थिति का विश्लेषण किया जाए, तो स्वतंत्र भारत में किसानों और श्रमिक वर्ग की राजनीति करने वाले सबसे बड़े नेता का नाम चौधरी चरण सिंह आता है। चौधरी चरण सिंह आज़ादी के बाद किसान और श्रमिक वर्ग की राजनीति का केंद्र हुआ करते थे। चरण सिंह उस महानतम् शिख्सयत का नाम है, जिनकी एक आवाज़ से किसानों और श्रमिक वर्ग का जनसैलाब दिल्ली की तरफ अपना रुख किया करता था। कहते हैं कि चौधरी चरण सिंह राजनीतिक रूप से इतने प्रभावशाली नेता थे कि उनके घर तक तत्कालीन बड़े-बड़े राष्ट्रीय नेताओं को मुलाकात के लिए उनके घर तक आना ही पड़ता था। वह जब तक राजनीति में रहे, तब तक उन्होंने किसानों और श्रमिक वर्ग की उन्नति के लिए अनेक कार्य किये। इसका सबसे बड़ा उदाहरण उनके द्वारा भारत के सबसे बड़े राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड) की स्थापना करना है। चौधरी चरण सिंह के उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री, ग्रह मंत्री, वित्त मंत्री और भारत के उप प्रधानमंत्री एवं प्रधानमंत्री तक बड़े पदों पर विराजमान हुए थे। इस प्रकार से हम कह सकते हैं कि आज़ादी के बाद भी 80 के दशक तक किसानों का केंद्रीय राजनीति में भी डंका बजता रहा था।

चौधरी चरण सिंह के बाद केंद्रीय राजनीति में ख्याति प्राप्त करने वालों में से उनके विशेष सिपहसालार एवं जगत ताऊ चौधरी देवीलाल प्रमुख स्थान रखते थे। उनको देश की राजनीति में ङ्क्षकगमेकर के नाम से भी जाना जाता हैं। हरियाणा का मुख्यमंत्री रहते हुए उन्होंने किसानों और कामगारों के लिए बुढ़ापा पेंशन, बिजली बिल और किसान वर्ग की कर्ज़-माफी जैसे अनेक जनकल्याण कार्य किये। चौधरी देवीलाल के किसानों के हित में किये गये इन कामों का नतीजा यह हुआ कि उसके बाद बनने वाली सभी सरकारों को उनकी योजनाओं को आगे बढ़ाने पर मजबूर होना पड़ा।

वहीं दूसरी ओर अगर देश की राजनीति की बात की जाए, तो वहाँ भी किसान नेताओं का दबदबा साफ दिखायी पड़ता है। गौरतलब है कि 01 दिसंबर, 1989 को आम चुनाव के बाद संयुक्त मोर्चा संसदीय दल की बैठक हुई। उस बैठक में चौधरी देवीलाल को संसदीय दल का नेता बनाया गया। चौधरी देवीलाल धन्यवाद देने के लिए खड़े हुए, लेकिन उन्होंने अपने प्रधानमंत्री के ताज को विश्वनाथ प्रताप सिंह को सौंप दिया। इस प्रकार से उन्होंने प्रधानमंत्री का पद त्यागकर भारतीय राजनीति में ङ्क्षकगमेकर की भूमिका निभायी, जिससे उन्हें ङ्क्षकगमेकर के नाम से जाना जाने लगा। चौधरी देवीलाल मुख्यमंत्री से लेकर उप प्रधानमंत्री तक बने, इस प्रकार से हम कह सकते हैं कि उस समय तक भारतीय राजनीति किसानों और श्रमिक वर्ग की राजनीति चौ. देवी लाल इर्द-गिर्द घूमती थी। हरियाणा में बिना किसान नेता के कोई भी राजनीतिक पार्टी तब तक अधूरी थी, जब तक उसमें कोई किसान नेता न हो। ज़ाहिर है कि आज हरियाणा जैसे कृषि प्रधान राज्य में भी किसान नेताओं का टोटा साफतौर पर दिखायी देता है।

आज की स्थिति में किसानों पर हालात पर गौर किया जाए, तो आज हालात ऐसे हो गये हैं कि कोई भी किसान अपने बच्चों को खेती में नहीं डालना चाहता। यही वजह है कि किसानों जो बच्चे पढऩे-लिखने शहर चले जाते हैं, उनमें 95 फीसदी पढ़-लिखकर वहीं के होकर रह जाते हैं। यहाँ तक कि इनमें अधिकतर को अपने गाँव में रहने वाले अपने भाई से भी पसीने की बदबू आती है। शहर जाने के बाद उसके पीछे से खेती-किसानी को सँभालने वाला उसका भाई उसे गँवार लगने लगता है। उसका जुड़ाव खेती से वैसा नहीं रहता, जैसा खेती करने वाले उसके भाई का रहता है। इसीलिए वह अपने पुरखों की पुश्तैनी ज़मीन को बार-बार बेचने की बात भी करता है। मैं मानता हूँ कि यह किसानों और उनके शहर जाने वाले बच्चों, दोनों के लिए ही यह दुर्भाग्यपूर्ण है।

अगर देखा जाए शहर में तमाम सुख-सुविधाओं में रहने वाला किसान का बेटा आज की तारीख में खेती करने वाले किसान का सबसे बड़ा दुश्मन बना बैठा है। वह बात तो किसान की करता है, परन्तु उसकी नज़र पुश्तैनी ज़मीन पर रहती है। इसलिए मेरा मानना है कि किसानों और श्रमिकों को खुद को अकेला मानकर संगठित होना पड़ेगा और अपनी लड़ाई खुद ही लडऩी पड़ेगी। राजनीतिक लोगों पर भरोसा करने से कोई फायदा नहीं, ये किसानों, श्रमिकों को कहीं का नहीं छोड़ेंगे। आज किसानों, श्रमिकों को होश सँभालकर खड़ा होने और अपनी लड़ाई खुद लडऩे के लिए अपनी शक्ति को पहचानना होगा। अपनी किसान-श्रमिक एकता, किसान एकता को प्रबल करना होगा। किसानों को समझना होगा कि ज़मीन उनकी माँ है और माँ को वे किसी गैर के हाथों में कैसे जाने दे सकते हैं?

कुल मिलाकर आज के हालात में हम कह सकते हैं कि हिन्दु-मुसलमान की राजनीति ने किसानों और श्रमिक वर्ग की राजनीति को निगल लिया है। आज के दौर में किसानों और श्रमिक वर्ग की राजनीति मरणासन्न अवस्था में है, तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। हालाँकि मेरा मानना है कि अब भी किसानों और श्रमिक वर्ग के पास समय है। इनको चाहिए कि जिनका साथ इनके पूर्वज लिया करते थे उन्हीं का साथ लीजिए अन्यथा तुम्हारे किसान और कमेरे वर्ग के लोगों के मुख्यमंत्री व प्रधानमंत्री बनने के ख्वाब मात्र ख्वाब ही बनकर रह जाएँगे। आज देश का पिछड़ा वर्ग और अल्पसंख्यक समुदाय किसानों की और देख रहा है। मगर आज किसान नेतृत्व है ही नहीं। इसलिए किसान खुद लखनऊ-दिल्ली की सल्तनत के दलालों के बीच फँसकर पिस रहे हैं। जब बच्चे उच्च शिक्षा हासिल नहीं कर पाते हैं, तो खेती से परे विकल्प खत्म हो जाते हैं। अन्त में ज़मीन बेचने के अलावा कोई विकल्प बचता नहीं है। ज़मीन किसान की माँ होती है। इसलिए इसको बेचने के बजाय आत्महत्या का रास्ता चुनता है या फिर बच्चे नशाखोरी-अपराध की दुनिया में कदम रख देते हैं। आज भारत की जेलों में बन्द कैदियों के आँकड़े जारी किये जाएँ, तो समझ में आयेगा कि अधिकतर कैदी किसान वर्ग के हैं।

(लेखक दैनिक भास्कर के

राजनीतिक सम्पादक हैं।)